घमंडी

 शाम का समय था। आरती बालकनी में बैठी अपने बेटे ध्रुव के साथ खेल रही थी। सामने वाली गली से निधि की ऊँची आवाज़ें आ रही थीं — वही रोज़ की तरह किसी न किसी बात का बखान।

“अरे आरती!” निधि पुकारती हुई आई, “देखो ना, ये साड़ी 5000 की ली है… तुम्हें कैसी लग रही है?”

आरती मुस्कुरा दी, “बहुत सुंदर है निधि।”

“हाँ, पता है मुझे… वैसे तुम भी ना, कुछ खर्च किया करो। अब मैं तुम्हें अपनी बहन मानती हूँ, इसलिए कहती हूँ कि थोड़ा उठाओ अपनी लाइफ का मज़ा।”

आरती बस हँसकर रह गई। ये बातें निधि के रोज़ के ड्रामे का हिस्सा थीं। वो खुद को आरती की बहन कहती, पर हर बार अपने मतलब के लिए ही आती थी।

आरती के घर की रसोई तक का रास्ता उसे उतना ही मालूम था जितना अपने घर का। कभी नमक चाहिए, कभी दही, कभी गैस खत्म… और अगर कहीं घूमने का प्रोग्राम बनता, तो बच्चों को आरती के भरोसे छोड़ जाना उसका नियम था।

पड़ोस में ही गायत्री रहती थी। शांत स्वभाव की, सीधी-सादी और कम बोलने वाली। वह घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी, इसलिए शायद ही कभी किसी मोहल्ले की औरतों की मंडली में शामिल होती। निधि अक्सर कहती,
“वो गायत्री को क्या हुआ है? इतनी घमंडी है कि किसी से बात तक नहीं करती।”

आरती कभी जवाब नहीं देती, बस मुस्कुरा देती। उसे लगता, हर किसी का अपना तरीका होता है जीने का।

एक दिन, आरती के पति सुमित ऑफिस के काम से बाहर गए हुए थे। ध्रुव की तबीयत दोपहर में अचानक बिगड़ गई। उसे तेज़ बुखार और सांस लेने में तकलीफ होने लगी।

आरती घबरा गई। उसने तुरंत निधि को फोन लगाया।

“हैलो निधि, ध्रुव की हालत बहुत खराब है, जल्दी आ जाओ।”

उधर से आवाज़ आई, “अरे आरती, अभी तो मैं किटी पार्टी में हूँ। बस थोड़ी देर में आती हूँ, तुम तब तक घर पर कुछ देखो।”

“पर निधि, वो साँस नहीं ले पा रहा है, मुझे उसे हॉस्पिटल ले जाना है…”

“हाँ-हाँ, आती हूँ थोड़ी देर में…” कहकर फोन कट गया।

आरती ने एक घंटा इंतज़ार किया, लेकिन निधि नहीं आई। उसने बार-बार फोन लगाया, पर अब कॉल रिसीव ही नहीं हो रही थी।

ध्रुव की हालत बिगड़ती जा रही थी। घबराहट में आरती ने उसे गोद में उठाया और बाहर भागी। तभी सामने से गायत्री आती दिखी।

गायत्री ने तुरंत पूछा, “क्या हुआ आरती?”

“ध्रुव को सांस नहीं आ रही, अस्पताल ले जाना है लेकिन कोई नहीं है घर पर।”

“चलो, देर मत करो,” गायत्री ने झट से ऑटो रोका, “बैठो इसमें।”

आरती हड़बड़ी में कुछ कह पाती, उससे पहले ही गायत्री ने खुद ध्रुव को गोद में उठाया और ऑटो में बैठ गई।

अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने उसे ऑक्सीजन दी। समय पर इलाज मिलने से ध्रुव की हालत सुधरने लगी।

आरती ने राहत की साँस ली और गायत्री का हाथ पकड़कर बोली,
“अगर तुम ना होती तो न जाने क्या हो जाता।”

गायत्री मुस्कुरा दी, “ऐसा मत कहो, पड़ोसी तो इसी लिए होते हैं — एक-दूसरे के काम आने के लिए।”

रात के करीब नौ बजे आरती घर लौटी। ध्रुव सो चुका था, उसका चेहरा अब शांत था। तभी दरवाज़े की घंटी बजी।

दरवाज़ा खोला तो निधि खड़ी थी — हाथ में मोबाइल, चेहरे पर बनावटी मुस्कान।
“अरे यार, सॉरी, थोड़ी देर हो गई… वो पार्टी में अटकी रह गई थी। अब कैसा है ध्रुव?”

आरती शांत स्वर में बोली,
“ध्रुव अब ठीक है… और मैं भी।”

“ओह, अच्छा हुआ! मैंने सोचा था, मैं आती ही हूँ तो तुम्हें लेकर जाती…”

आरती ने उसकी बात बीच में काट दी,
“जरूरत नहीं पड़ी, गायत्री साथ थी मेरे। उसी ने ऑटो बुलाया, हॉस्पिटल ले गई, सब संभाल लिया। सच कहूँ निधि, आज समझ में आया कि कौन अपने हैं और कौन बस दिखावे के।”

निधि का चेहरा उतर गया। उसने बनावटी हँसी के साथ कहा,
“हाँ-हाँ, अच्छा किया उसने। अब मैं चलती हूँ, कल बात करते हैं।”

आरती ने सिर झुका लिया और दरवाज़ा बंद कर दिया।

कुछ ही देर बाद दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इस बार गायत्री थी — हाथ में स्टील का टिफिन।
“खिचड़ी बनाई है, तुम भी कुछ खा लो। पूरे दिन तुम्हें वक्त ही नहीं मिला होगा।”

आरती की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा,
“तुम्हें सब कैसे पता चल जाता है?”

गायत्री ने मुस्कुराकर कहा,
“शायद इसलिए कि मैं बाहर कम जाती हूँ, पर आस-पास का दुख देखना नहीं भूलती।”

आरती ने टिफिन लेते हुए कहा,
“तुम्हें लोग घमंडी कहते हैं, लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि सच्ची इंसानियत दिखावे से नहीं, दिल से होती है।”

गायत्री ने बस इतना कहा,
“रिश्ते बातें करने से नहीं, साथ देने से बनते हैं।”

और सच में — उस रात आरती को यह बात भीतर तक महसूस हुई।
जिस मोहल्ले में रोज़ बातें और दिखावे की आवाजें गूंजती थीं, वहाँ पहली बार सच्चे रिश्ते की खामोश चमक दिखाई दी —
जो बिना शोर के, पर दिल से निभाई गई थी।

लेखिका : खुशी 


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