जहाँ बेटियाँ हों, वहाँ अधूरे अरमान कभी नहीं रहते।

 सुबह की हल्की धूप खिड़की से झाँक रही थी। रसोई में रुचि चाय बना रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि कैसे अपने माता-पिता को कुंभ स्नान के लिए लेकर जाए। उनकी उम्र बढ़ रही थी, और माँ महीनों से कह रही थीं — “बेटी, बस एक बार गंगा में डुबकी लगवा दे, जीवन धन्य हो जाएगा।”

रुचि ने धीरे से रोहित से कहा,
“सुनो, मम्मी-पापा का बहुत मन है कुंभ जाने का। मैं ले जाती हूँ उन्हें दो दिन के लिए। तुम यहाँ रहकर अपनी मम्मी-पापा का ध्यान रख लेना।”

रोहित ने अखबार मोड़ते हुए कहा,
“क्या? पागल हो गई हो क्या? यहाँ मेरे मम्मी-पापा का क्या होगा? उनकी दवा, खाना, सब तुम संभालती हो। वैसे भी माँ के पैर में दर्द रहता है। अब तुम उन्हें छोड़कर घूमने निकलोगी? किसी और से भेज दो अपने मम्मी-पापा को।”

रुचि कुछ बोल न सकी। उसकी आँखें भर आईं। धीरे से कमरे में चली गई।

पास ही बैठी उनकी बेटी अनुष्का, जो दसवीं में पढ़ती थी, सब सुन रही थी। वह चुप रही, पर उसके दिल में कुछ चुभ गया था।

रात को जब सब खाना खा रहे थे, तो अनुष्का अचानक बोली,
“पापा, आप और मम्मी अपने सारे अरमान अभी पूरे कर लीजिए।”

रोहित मुस्कुराया, “क्यों बेटा, ऐसा क्यों कह रही हो?”

“क्योंकि पापा,” अनुष्का बोली, “जब आप बूढ़े हो जाओगे तो शायद आपके सारे अरमान अधूरे रह जाएंगे।”

रोहित ने हँसकर कहा, “अरे, अभी तो हम जवान हैं बेटा, जब बूढ़े होंगे तब तू हमें सारे तीर्थ धाम कराएगी। अभी क्या जल्दी है?”

अनुष्का ने बिना मुस्कुराए कहा,
“नहीं पापा, मैं नहीं करा पाऊँगी… क्योंकि मैं बेटी हूँ।”

टेबल पर सन्नाटा छा गया।

रोहित ने हैरानी से पूछा, “क्या मतलब?”

“मतलब पापा,” अनुष्का ने धीमे लेकिन ठोस स्वर में कहा,
“आप तो बेटे हैं, इसलिए हर साल दादा-दादी को तीर्थ यात्रा कराते हैं। लेकिन नाना-नानी कभी कहीं नहीं जा पाते, क्योंकि उनके पास कोई बेटा नहीं है। वो तो सिर्फ़ मम्मी हैं, जो हमेशा चुपचाप रह जाती हैं।"

उसके शब्द जैसे किसी ने पत्थर की तरह फेंक दिए हों।

रुचि के आँसू उसकी थाली में गिर रहे थे।
रोहित ने सिर झुका लिया। एक लंबी चुप्पी के बाद उसने कहा,
“बेटा, तू बहुत बड़ी हो गई है… आज तूने जो कहा, उसने मुझे आईना दिखा दिया।”

उसने रुचि की ओर देखा और बोला,
“रुचि, कल ही गाड़ी बुक कर दूँगा। तुम अपने मम्मी-पापा को लेकर कुंभ जाओ। उनका मन बहुत दिन से है।”

रुचि ने पलभर में सिर उठा लिया, उसकी आँखों में विश्वास नहीं था।
“सच में?”
“हाँ,” रोहित बोला, “अब मैं समझ गया हूँ कि बेटा और बेटी में फर्क सिर्फ़ समाज करता है, प्यार नहीं।”

अगले ही हफ्ते, रुचि अपने माता-पिता को लेकर कुंभ मेले पहुँची। विशाल संगम तट पर लाखों लोगों की भीड़ थी, पर उसके दिल में एक अनोखी शांति थी।

उसकी माँ ने कहा, “बेटा, तूने तो हमारी सारी इच्छाएँ पूरी कर दीं। गंगा मैया की ये डुबकी अब जीवन की सबसे बड़ी सौगात बन गई।”

रुचि ने मुस्कुराकर माँ के पैर छुए।
“माँ, ये तो मेरा फर्ज़ था। आपने भी तो जीवनभर मेरे लिए सब कुछ किया।”

गंगा की लहरें उनके पैरों को छूकर मानो आशीर्वाद दे रही थीं। रुचि ने गंगा की ओर हाथ जोड़कर कहा,
“हे गंगा मैया, जैसे मैंने अपने माता-पिता के सारे अरमान पूरे किए, वैसे मेरी बेटी भी एक दिन मेरे सपनों को साकार करे।”

पास खड़ी अनुष्का ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, मैं वादा करती हूँ… मैं कभी आपको किसी के साए में नहीं रहने दूँगी। मैं आपकी बेटी हूँ, लेकिन आपकी पहचान भी बनूँगी।”

रुचि की आँखों में आँसू थे — मगर इस बार वो आँसू दर्द के नहीं, गर्व के थे।

संगम की लहरें लहराती रहीं, सूरज की रोशनी जल पर नाचती रही।
कहीं दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं, और गंगा मैया जैसे कह रही थीं —
“जहाँ बेटियाँ हों, वहाँ अधूरे अरमान कभी नहीं रहते।”

रंजीता पाण्डेय


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