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हम गरीब लोग हैं, पर एक-दूसरे के दुख बाँटकर ही तो जीते हैं

 रेखा रसोई में दोपहर का भोजन बना रही थी। गैस पर दाल पक रही थी और सामने कटी सब्ज़ियाँ रखी थीं। तभी दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई। उसने एप्रन उतारकर दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी नौकरानी सरिता खड़ी थी — घबराई हुई, चेहरे पर पसीना और आँखों में झिझक।

“क्या हुआ सरिता, तबीयत तो ठीक है?” रेखा ने पूछा।

“दीदी… मुझे थोड़े पैसों की बहुत ज़रूरत है,” सरिता बोली, “अगर आप दस हज़ार रुपये उधार दे दो, तो मैं धीरे-धीरे आपके काम से काट दूँगी।”

रेखा ने हैरानी से कहा, “लेकिन सरिता, अभी तो सात तारीख ही है, और तुम पिछले महीने के पूरे पैसे ले चुकी हो।”

“हाँ दीदी, पर मामला बहुत ज़रूरी है, तभी तो हिम्मत करके आपके पास आई हूँ,” सरिता बोली, उसकी आवाज़ काँप रही थी।

रेखा ने थोड़ा सख़्त स्वर में पूछा, “ऐसा क्या हो गया कि महीने के शुरू में ही पैसे की इतनी जरूरत पड़ गई? पिछली बार भी तुमने एडवांस लिया था।”

सरिता कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “दीदी, मुझे तो नहीं चाहिए पैसे… दरअसल, मेरी बगल में जो किरन रहती है ना, उसे बहुत ज़रूरत है। वही कह रही थी कि अगर मैं कुछ मदद कर सकूँ तो…”

रेखा ने बीच में टोका, “मतलब, ये किसी और के लिए माँग रही हो? और वो भी दस हज़ार रुपये? अरे, सरिता, तुम खुद कितनी मुश्किल से गुज़ारा करती हो! वो अपनी जरूरत खुद पूरी करे।”

“दीदी,” सरिता धीरे से बोली, “वो बहुत परेशानी में है। उसकी बेटी सुमन की शादी तय हुई थी, अगले हफ़्ते की तारीख़ है। सब कुछ तैयार था, लेकिन पिछले महीने उसके पति का एक्सीडेंट हो गया। अब वो काम पर नहीं जा पा रहा। किरन ने सोचा था कि धीरे-धीरे सब खर्च जुटा लेगी, लेकिन अब तो जो थोड़ा बहुत बचाया था, वो भी इलाज में खर्च हो गया। शादी आगे बढ़ाए तो लोग ताने देंगे, और कैंसिल करे तो लड़की की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। वो बहुत रो रही थी, कह रही थी अब क्या करूँ? मैं उसका दर्द नहीं देख पाई, दीदी। इसलिए आपसे माँगने आ गई।”

रेखा कुछ क्षणों तक उसे देखती रही। सरिता के चेहरे पर ईमानदारी और करुणा दोनों झलक रहे थे।

“सरिता,” उसने कहा, “तुम्हारे अपने भी तो दो बच्चे हैं, अकेले पाल रही हो। खुद के लिए तो कभी कुछ नहीं माँगा मुझसे, पर किसी और के लिए यूँ दौड़ आई? क्यों?”

“दीदी,” सरिता ने कहा, “हम गरीब लोग हैं, पर एक-दूसरे के दुख बाँटकर ही तो जीते हैं। जब मेरे पति नहीं रहे थे, तब किरन ने ही मेरे लिए दो दिन खाना बनाया था, बच्चों को संभाला था। अब उसकी बारी आई है तो मैं मुँह कैसे फेर लूँ? इंसान का असली धर्म यही तो है ना, कि जो तकलीफ़ में हो, उसकी मदद करे।”

सरिता की आँखें भर आईं।

रेखा के हाथ थम गए। उसने सोचा — जहाँ लोग अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं, वहाँ ये औरत दूसरों का दर्द अपना बना रही है।

“सरिता,” रेखा बोली, “मैं तुम्हें पैसे उधार नहीं दूँगी।”

सरिता के चेहरे पर डर उतर आया। “क्यों दीदी? आपको मुझपर भरोसा नहीं? मैं पैसे लौटा दूँगी, सच…”

“नहीं, रो मत,” रेखा ने उसकी बात बीच में काट दी, “मैं तुम्हें पैसे उधार नहीं दूँगी, क्योंकि तुम लौटाओगी नहीं। मैं खुद मदद करूँगी — किरन की बेटी की शादी के लिए। ये पैसे दान समझो, उधार नहीं। और सुनो, कपड़े, साड़ी, कुछ बर्तन — जो भी जरूरत होगी, मैं दूँगी। बेटी की शादी है, मेरी भी बेटी जैसी है वो।”

सरिता की आँखों से आँसू टपकने लगे, “दीदी, आप सच में बहुत अच्छी हैं। मैं तो उम्मीद ही नहीं कर रही थी…”

“नहीं रे,” रेखा मुस्कुराई, “अच्छी तो तू है। तेरे मन में जो भावना है, वही सबसे बड़ी नेकी है। जब तू खुद संघर्ष में रहते हुए किसी और के लिए सोच सकती है, तो मैं क्यों नहीं?”

कुछ देर बाद सरिता दौड़ती हुई किरन को बुला लाई। किरन घबराई हुई थी, बार-बार आँचल से पसीना पोंछ रही थी। रेखा ने उसे कुर्सी पर बैठाया और प्यार से कहा, “देखो बहन, बेटी की शादी का शुभ काम है। सब ठीक होगा। पैसे और जो जरूरत का सामान है, वो रख लो, चिंता मत करो।”

किरन के गले से शब्द नहीं निकल पाए। उसने रेखा के पैर छूने चाहे, पर रेखा ने उसे रोक लिया, “अरे ये क्या कर रही हो, आशीर्वाद तो बेटी को देना चाहिए मुझे।”

रेखा ने अपनी अलमारी से एक खूबसूरत पीली साड़ी निकाली और कहा, “ये साड़ी मीना की हो जाएगी, मैं खुद उसे पहनाते हुए देखना चाहती हूँ।”

उस दिन से अगले कुछ दिनों तक रेखा और सरिता ने मिलकर शादी की तैयारी में हाथ बँटाया। कभी फूलों का इंतज़ाम, कभी मिठाई का ऑर्डर, कभी बर्तन की व्यवस्था — हर जगह रेखा का स्नेह और सरिता का समर्पण दिखाई दे रहा था।

शादी वाले दिन जब दूल्हा-दुल्हन ने सात फेरे लिए, तो किरन की आँखों में राहत और खुशी दोनों थे। रेखा एक कोने में खड़ी थी, मन ही मन भगवान का धन्यवाद करती — कि उसे किसी की खुशी का कारण बनने का अवसर मिला।

जब सब मेहमान जा चुके, किरन रेखा के पास आई और बोली, “दीदी, मैं आपकी एहसानमंद हूँ। आपने जो किया, वो मेरी औकात से बाहर था।”

रेखा ने कहा, “किरन, मैंने कुछ नहीं किया, बस वही जो इंसान को करना चाहिए।”

उसके पास खड़ी सरिता मुस्कुराई, “दीदी, मैंने तो कहा था ना, मेरी किरन की बेटी भी मेरी बेटी जैसी है।”

रेखा ने दोनों को गले से लगा लिया।

वापस घर लौटते हुए रेखा ने सोचा — आज के दौर में, जहाँ लोग रिश्तों में स्वार्थ ढूँढते हैं, वहाँ सरिता जैसी औरतें इंसानियत की असली पहचान हैं। जिनके पास देने को बहुत कुछ नहीं होता, पर फिर भी वे दिल से सब कुछ दे देती हैं।

रात को जब रेखा बालकनी में बैठी, तो आसमान में चमकता चाँद उसे जैसे कह रहा था — नेकी का उजाला कभी मंद नहीं पड़ता।

और सच में, उस रात रेखा के भीतर भी एक उजाला था — किसी की खुशी का हिस्सा बनने का उजाला।


 लेखिका 

सुभद्रा प्रसाद


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