सुनो जी,वो प्रभा है ना मेरी सहेली, कह रही थी,की बनारस वाले उनके गुरु जी कल उनके यहां पधार रहे हैं, आने को जिद कर रही थी,कल शाम चलेंगे।
अच्छा,प्रभा ने तो शायद पहले भी कई बार उनका जिक्र किया है।ठीक है,जब काशी यही अपने मेरठ में विराज रही है,तो दर्शन करने में क्या हर्ज।
सुधा बहुत खुश थी,उसकी सहेली प्रभा और उनका परिवार बनारस के इन बाबा को अपना गुरु मानता था,उनका विश्वास था,कि उनकी कृपा से ही उनके यहां बरकत है। सुधा की इच्छा थी कि वे भी बनारस उनके दर्शन करके आये और शैलेश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो जाये।पर शैलेश इस प्रकार के गुरुओ पर विश्वास नही करता था,दूसरे उसे बनारस जाने में होने वाला खर्च भी फिजूल लगता था।
पर जब गुरु जी खुद ही मेरठ आ रहे हैं तो उसके मन मे भी उनके चमत्कार देखने की इच्छा जागृत हो गयी। अगले दिन शाम को शैलेश और सुधा प्रभा के घर पहुंच गये।सुबह ही गुरु जी पधार चुके थे।इस समय प्रभा के यहां काफी गहमा गहमी थी।सुधा और शैलेश वहां पहुंचकर एक ओर बैठ गये,और अपनी बारी की प्रतिक्षा करने लगे।प्रभा व्यस्त थी।काफी लोग आये हुए थे,बीच बीच मे गुरु जी का जयजयकार भी गूंज रहा था।इसी बीच शैलेश टॉयलेट गये, वहां से आते समय उन्होंने दो तीन लोगो की फुसफुसाहट सुनी,उन्हें शैलेश की उपस्थिति का भान नही था।उनकी बात चीत से स्पष्ट हो गया कि वे गुरु जी के साथ आये उनके शिष्य थे।उनमें से एक शिष्य कह रहा था कि यहां तीन दिन रुकना है, गुरुजी का कहना है कि तीन दिनो मे कम से कम पांच लाख एकत्रित करने हैं।दूसरा बोला हम तो आज ही आये है,आज आज में ही दो लाख हो चुके हैं।देखना आंकड़ा 10 तक पहुंच जायेगा।
सुनकर शैलेश की आंखे फैल गयी।विश्वास और आस्था के साथ खिलवाड़ करके दौलत इकठ्ठा करने का खेल वह समझ चुका था।उसने सुधा का हाथ पकड़ा और प्रभा के यहां से बिना किसी को कुछ बताये तुरंत अपने घर वापस आ गया।सुधा शैलेश की इस प्रतिक्रिया को समझ नही पा रही थी।शैलेश बोला सुधा नहाने से पहले गंगा और नाले की पहचान भी तो जरूरी है।बहते तो दोनो ही हैं।
बालेश्वर गुप्ता, नोयडा
मौलिक एवम अप्रकाशित
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