तौबा करना

 रमेश जी के पड़ोसवाले फ्लैट से आए दिन झगड़े की आवाजें आती रहतीं थीं। बगल फ्लैट में माँ सुनयना देवी,बेटा और बहू रहतीं थीं ।सभी पड़ोसी उनके झगड़े से परेशान थे,परन्तु शहरों में  विशेषकर फ्लैटों में एक अलग ही संस्कृति विकसित हो चुकी है।अड़ोस-पड़ोस के घरों में क्या हो रहा है? इस बात से सभी उदासीन रहते हैं।अपनी-अपनी दुनियाँ में मशगूल रहते हैं।रमेश जी भी  हमेशा पड़ोसी के झगड़े से अपना ध्यान भटकाने की कोशिश करते,परन्तु एक दिन तो हद हो गई। उनके पड़ोस से फिर जोर-जोर से झगड़े की आवाजें आने लगीं।रमेश जी अन्य दिनों की तरह धैर्यपूर्वक झगड़े के शांत होने का इंतजार कर रहे थे,परन्तु उस दिन झगड़ा शांत होने के बजाय उग्रतर होता जा रहा था।आरंभ में  झगड़े का स्वर पहले निराशा ,फिर आक्रोश, फिर कटूक्तियों में बदलते जा रहे थे।उनके अंतस में कैद ऊर्जा खीझ और आरोप-प्रत्यारोप के रुप में बाहर आने लगी थी।सुनयना देवी जोर-जोर से रो और चिल्ला रही थी।बहू-बेटे भी उसी गति से चिल्लाएँ जा रहे थे।


आखिरकार सुनते-सुनते रमेश जी का धैर्य जबाव दे चुका था।पत्नी के मना करने के बावजूद रमेश जी ने किसी अनहोनी की आशंका से थाने में पुलिस को फोन कर दिया।कुछ देर में पुलिस आकर मामले को रफा-दफाकर चली गई।  एकदम से माहौल ऐसा शांत हो गया,मानो कुछ हुआ ही न हो।


अगले दिन  सुनयना देवी ने रमेश जी को आड़े हाथों लेते हुए कहा -"भाई साहब!हमारे पारिवारिक झगड़े में आपसे पुलिस बुलाने किसने कहा?आपने तो पुलिस बुलाकर हमारी इज्जत सरेआम  नीलाम कर दी।इतनी उम्र होने पर आपको समझ में आ जानी चाहिए कि पारिवारिक  मसले में किसी तीसरे को नहीं पड़ना चाहिए। पुलिस आने से सोसायटी में मेरे बेटा-बहू की क्या इज्जत रह जाएगी?"


सुनयना देवी की बातें सुनकर  अपनी गलती मानते हुए  रमेश जी ने किसी दूसरे के पारिवारिक मसले में पड़ने से कान पकड़कर तौबा कर ली।उन्होंने मन-ही-मन प्रण करते हुए कहा -"आज के बाद से मैं किसी के आपसी झगड़े में 'दाल-भात में मूसलचन्द कभी नहीं बनूँगा!तौबा!तौबा!"


समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा (स्वरचित)


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