एक हाथ से ताली नहीं बजती

 काफी दिनों से सतीश दफ्तर के नियम-कानून को धता बताकर अपनी मर्जी के हिसाब से दफ्तर जा-आ रहा था।परिवार और बाॅस की चेतावनी के बावजूद उसने अपना रवैया नहीं बदला।आखिरकार आज दफ्तर पहुँचते ही बाॅस ने उसके हाथ में निलंबन -पत्र थमा दिया।हाथ में पत्र आते ही सतीश का भ्रम एक ही झटके में टूट गया।अब तक तो सतीश इस मुगालते में था कि बाॅस  उसके बड़े भाई का दोस्त है,तो नौकरी में कोई खतरा नहीं है।


आज उसका सामना हकीकत से हो ही गया।अब उसे  ऐसा महसूस हो रहा था कि चीख-चीखकर खुद को बताएँ कि उसी की गलती थी।काफी देर इधर-उधर भटकने के बाद उसके मन की आँधी थम चुकी थी,वह बुझे मन से अपने घर की ओर जा रहा था।उसे महसूस हो रहा था कि उसकी जिन्दगी की तरह रात भी अँधेरी होती जा रही है!


पत्नी रेखा उसके इंतजार में बरामदे में परेशान-सी चहलकदमी कर रही थी।पति को देखते ही उसने पूछा -"सतीश! काफी परेशान  और बुझे से लग रहे हो?"

सतीश-"रेखा!बाॅस अपने को हिटलर समझता है।उसने मुझे नौकरी से निलंबित कर दिया है।"

रेखा-"सतीश!ये तो एक दिन  होना ही था।ताली एक हाथ से कभी नहीं बजती।बाॅस ने  तुम्हें बार-बार समय पर दफ्तर आने और काम पर ध्यान देने की चेतावनी दी थी,परन्तु तुम नहीं सुधरे,तो अब भुगतो।"


सतीश आत्मग्लानि भरे स्वर में कहता है-"रेखा! सचमुच बाॅस की नहीं ,मेरी ही गलती है।मैं ही काम के प्रति लापरवाह हो गया था।अब निलंबन खत्म होने पर तन्मयता से काम करूँगा।"

रेखा -"सतीश!याद रखो कि गलती हमेशा दोनों तरफ से होती है।इसीलिए कहा गया है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती!"

सतीश  सहमति में सिर हिलाता है।


समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)


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