ऊंची उड़ान

रमेश चंद्र जी को हमेशा यह मलाल रहता कि उनका परिवार इतना उच्च शिक्षित होते हुए उनका छोटा बेटा कम पढ़ा लिखा रह गया। बड़ा बेटा तो डॉक्टर बनकर अमेरिका सेटल हो गया। बेटी भी इंजीनियर थी जो शादी करके कनाडा चली गई। रमेश चंद्र जी भी खुद भी सरकारी उच्च पद पर से रिटायर्ड थे। उनको लगता उनके संस्कारों में ही कहीं कमी रह गई जो उनका सार्थक उच्च पद पर नहीं पहुंच पाया। उन्होंने थोड़ा सा पैसा लगाकर उसका काम जुड़वा दिया। अपनी मेहनत के बल पर अब सार्थक भी समर्थ हो गया था। एक दिन उनकी धर्मपत्नी कि अचानक से हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई। अमेरिका और कनाडा से उनका कोई सा भी बच्चा माँ के मरने पर नहीं आया। इधर सार्थक ने कोई कसर न छोड़ी उनकी सेवा करने में। अब रमेश चंद जी को एहसास होता है संस्कार किस में कम रहे। अगर सार्थक भी यहां नहीं होता तो उनकी मिट्टी को कंधा देने शायद कोई नहीं आ पाता।

परिंदों का इतना ऊंचा आसमान ना कर 

कि लौटने को जमीन ही ना मिले।

ताली भी तो एक हाथ से नहीं बजती है। गलती भी तो सारी उनके बच्चों की नहीं थी क्योंकि उनकी उड़ान का सपना तो खुद उन्होंने ही अपनी आंखों से देखा था। अपने कामयाब बच्चों की सफलता को देखकर तो उन्होंने सदैव अपने छोटे बेटे को खोटा सिक्का समझा था। आज वही खोटा सिक्का उनके बुढ़ापे की लाठी बन गया।

वतन छोड़ गए बच्चों से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने मां-बाप को कंधा देने आएंगे। 

प्रश्न विचारणीय है। सोचिएगा जरूर।


प्राची अग्रवाल 

खुर्जा बुलंदशहर 

एक हाथ से ताली नहीं बजती है मुहावरा आधारित लघु कथा


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