बोया पेड़ बबूल का,आम कहाँ से होय!

 सोमेश जी के बेटे ने माँ की मृत्यु पर  विदेश से अंतिम संस्कार में आने से इंकार कर दिया था।बेटे ने कितनी सहजता से कहा था -" डैड!माँ तो चली ही गई। अब हमारे जाने से वापस तो लौटकर नहीं आएगी।अभी मुझे भी बहुत काम है और बच्चों की परीक्षाएँ भी हैं।कर्मकांड में कुछ  नहीं रखा है।आप संक्षिप्त रुप में निबटा लेना,और कोई जरूरत हो तो बताना।"


रात भर पत्नी के शव के समक्ष बैठे -बैठे सोमेश जी के लिए  मानो वक्त ठहर-सा गया था।बेटी ने तो पहले ही विदेश से आने में असमर्थता जता दी थी,अब बेटे के इंकार ने  उनके दिल को झकझोर कर रख दिया था।बीती बातों को याद कर उनकी आँखों का समंदर छलछला उठता।ग्लानि ,पछतावा,अपराधबोध  से उनका दिल बार-बार भर उठता है।आजतक उन्होंने अपने परिवार माता-पिता, भाई-बहन से कोई सम्बन्ध नहीं रखा।बच्चों के लिए  भी पैसों की जरूरत पूरी कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान बैठे।यहाँ तक कि एक डाॅक्टर होते हुए  भी पत्नी की गंभीर बीमारी को समझ नहीं सकें या तो ध्यान नहीं दिया।समय रहते सही इलाज हो जाता तो शायद जीवनसंगिनी बच सकती थी!पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए कब अरूणोदय  हो गया ,उन्हें पता ही नहीं चला।


छोटे भाई  रमेश के  सपरिवार सुबह-सुबह पहुँचने पर सोमेश जी की चेतना लौटी।जिस भाई को उन्होंने कभी भी अपने समकक्ष नहीं माना,आज उसी भाई के गले से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े और कहा - "रमेश!तुम्हारी भाभी बेटा गगन की एकटक राह देखती रही।उस कष्ट में भी बेटे का नाम ही जुबान पर था।कम-से-कम मुखाग्नि देने तो आ जाता,जिससे उसकी आत्मा को मुक्ति मिल जाती!"


छोटे भाई रमेश ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा भैया!अभी उन बातों को दुहराने से कोई फायदा नहीं है।पहले भाभी के नश्वर शरीर को गति-मुक्ति देनी है,फिर बात करेंगे।


छोटे भाई के सहयोग से सोमेश जी की पत्नी का क्रिया-कर्म संपन्न हो चुका था।अगले दिन रमेश सपरिवार जब वापस जाने लगा,तो सोमेश जी ने  उसका हाथ  पकड़कर  रोते हुए कहा-"रमेश!सब तो मुझे छोड़कर चले गए। तुम तो रुक जाओ। बेटा-बेटी तो परदेसी हो गए। इतने बड़े सूने घर का सन्नाटा मैं कैसे झेल पाऊँगा?अब मैं किसके सहारे रहूँगा?


जबसे रमेश आया था,तब से उसके मन में अजीब कशमकश थी।भाई के घड़ियाली आँसू देखकर उसका सर्वस्व झनझना उठा।आहत हृदय इससे पहले कि रुदन करे  ,उसने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए कहा -" भैया!कहना तो नहीं चाहता था,परन्तु कह रहा हूँ कि आपने अपनी माँ साथ जो किया था,उसी का  फल लौटकर आपके पासआया है।माँ भी अंतिम घड़ी में आपकी राह देखते हुए तड़प-तड़पकर गुजर गई थी।दफ्तर के काम के बहाने आप नहीं आए थे।आपके बच्चे तो विदेश में हैं,आप तो मुंबई में रहकर नहीं आए थे।जिस व्यक्ति को परिवार का आधार-स्तंभ समझा जाता हो,वही अगर पुख्ता न निकले,तो उनसे जुड़े व्यक्तियों का दर्द असहनीय हो जाता है।हमने सब झेला है।कुछ पैसे भेजकर आप अपने कर्त्तव्य से मुक्त हो गए थे।सच ही कहा गया है कि आपका कर्म पलटकर वापस आता है।इसे ही कहा गया है'बोया पेड़ बबूल का,आम कहाँ से होय'।"

इतना कहकर रमेश सपरिवार निकल गया।सोमेश जी आत्मग्लानि और पश्चाताप की अग्नि में खड़े-खड़े  दग्ध होते रहें


समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा (स्वरचित)


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