एक मुँह दो बात

 अनुजा सरकारी बैंक में नौकरी करती थी।जब उसकी शादी तय हुई,तो अनुजा के माता-पिता ने बेटी की इच्छानुसार लड़के और उसके परिवार वालों के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा -" आपलोगों से मेरी एक गुजारिश है कि मेरी बेटी शादी के बाद  नौकरी नहीं छोड़ेगी!"

लड़के के पिता ने उनकी शर्त्त  मानते हुए कहा -अरे समधी जी! हमलोगों को अनुजा की नौकरी करने से भला क्या ऐतराज हो सकता है?"

लड़का मुकेश और उसकी माँ ने भी सहमति में अपना सिर हिलाया।

परन्तु शादी के कुछ दिनों बाद से ही अनुजा की नौकरी को लेकर घर में तनाव रहने लगा।अनुजा को धीरे-धीरे  एहसास होने लगा था कि शादी के बाद सिर्फ उसकी जिन्दगी ही नहीं बल्कि परिवार के लोग भी बदल गए हैं।रिश्ते वही थे,परन्तु सभी के सुर बदले हुए  थे।


शादी के एक साल बाद ही अनुजा एक प्यारे से बेटे की माँ बन गई। छः महीने के मातृत्व अवकाश के बाद जब अनुजा ने नौकरी ज्वाइन करने की बात की तो घर में भूचाल उठ खड़ा हो गया।उसकी सास ने गुस्से में कहा -" इस उम्र में मुझसे कोई  काम नहीं होता है।घर में क्या कमी है,जो तुम घर के वारिश को छोड़कर नौकरी के लिए भटकोगी?"

अनुजा के पति और ससुर भी उसके नौकरी छोड़ने की बात पर खामोशी से अपनी सहमति दे रहे थे। 


अनुजा ने नौकरी न छोड़ने के अपने  निर्णय पर अटल रहते हुए कहा -" आपलोगों में एक मुँह दो बात है!  शादी के समय तो सब मेरी नौकरी का समर्थन कर रहें थे और अब विरोध!मातृत्व स्त्री के लिए  गौरव की बात  है!उसे मैं कभी अभिशाप नहीं बनने दूँगी।मैं  अपने मातृत्व को पैरों की बेड़ी बनाकर अपनी महत्त्वकांक्षाओं और अरमानों को धूलि-धूसरित नहीं होने दूँगी।मैं अपने बच्चे के पालन-पोषण की व्यवस्था खुद करूँगी और नौकरी भी करुँगी!"


अनुजा के ससुरालवालों का अपने दुमुँहे व्यवहार के कारण खुद शर्म से सिर झुक गया।

समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा।(स्वरचित)


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