एकमात्र सहारा

 “ बाबूजी हमें नहीं जाना उस घर…सब उस विवेक के ही गुण गाते हैं… रोहन भी तो काम करते हैं …अब क्या हुआ जो नौकरी छूट गई कोशिश कर रहे हैं ना… जल्दी ही कही लग जाएगी।” नैना अपने ससुराल जाने में आना कानी करते हुए बोली 

“ देखो बेटा दो महीने होने को आए… तुम लोग यहाँ हो समधी जी कितनी बार फोन कर के कह चुके हैं उन दोनों को यहाँ भेज दीजिए…अरे हमारे बेटा बहू है… हमारी ज़िम्मेदारी है…अच्छा नहीं लगता बेटा ससुराल जाकर बैठा रहे….आप बस उन्हें यहाँ आने को कह दीजिए …अब तुम ही बताओ तेरे पिताजी क्या करें….. तुने सुना है ना घी का लड्डू टेढ़ा ही भला…बस विवेक को वही समझ…दिव्यांग है बैंक की नौकरी कर रहा है…शादी नहीं करना चाहता… जो पैसे कमा रहा है घर में ही देता है… तो सब उसके गुण गाएँगे ही तुम दोनों को भी तो इतना मान देता है…चली जा बेटा ससुराल का मान रख।” नैना की माँ समझाते हुए बोली 

नैना बेमन से ससुराल गई पर उधर विवेक के व्यवहार ने उसकी सोच ही बदल दी… लोग उसके गुण ज़रूर गाते थे पर उसके अंदर तनिक भी घमंड ना था … वो अपने बड़े भाई भाभी को समझाते हुए बोला,” आप दोनों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है…. जब तक आपकी नौकरी नहीं लगती लक्ष्मण है ना आपके लिए…कोशिश करते रहिए भैया नौकरी के लग ही जाएगी ।” 

नैना को अपनी सोच पर शर्मिंदगी हो रही थी वो अच्छी भली होते हुए भी बस अपना सोच रही थी और जो दिव्यांग था वो सबको सहारा देकर भी खुश हैं ।

✍️रश्मि प्रकाश 

#मुहावरा 

 # घी का लड्डू टेढ़ा ही भला


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