वात्सल्य पापा का

  देखो बेटा विपिन अब तुम बड़े हो गये हो,अपने निर्णय स्वयं लेते भी हो,ये अच्छी बात है।पर जो बाते हमे मर्यादा हीन लगे,या हमारी शर्मिंदगी का कारण बने,उसे भला हम क्यो माने?अच्छा होगा अब तुम अपनी जिंदगी हमसे अलग होकर अपनी तरह जियो।

      साफ साफ कहो ना पापा आप मुझे घर से निकाल रहे हैं, क्यो बातों की जलेबी बना रहे हो?

   चलो ऐसा ही समझ लो।साफ साफ सुनना चाहते हो ना तो साफ साफ ही सुनो,अब तुम्हारा हमसे या हमारी संपत्ति से कोई वास्ता नही।

       सेठ जयभगवान जी ने अपने छोटे से नगर में पैसे के साथ साथ खूब इज्जत भी कमाई थी।उनका एक ही बेटा था- विपिन। दौलत और शौहरत के बीच पला बढे विपिन को किसी चीज की कोई कमी नही थी।पर जैसा अमूमन होता है,वही हो रहा था,बड़े बाप की औलाद अक्सर बिगड़ जाती है।विपिन पर संगत का असर होता जा रहा था। देर रात तक घर से बाहर रहना, शराब पीना अब उसकी दैनिक चर्या बन गयी थी।जयभगवान जी ने विपिन को कई बार कोमलता से तो कई बार सख्ती से इन सब हरकतों से बाज आने की चेतावनी भी दी,पर विपिन पर कोई असर नही पड़ता।यार दोस्तो के बीच वह बेबस सा हो जाता।उसे अपने पिता पर ही क्रोध आता कि वे उसे क्यो टोक रहे है?उसके दोस्तों में मोनू और सोनू तो हमेशा ही उसे उकसाते रहते।एक दिन तो जयभगवान जी के धैर्य का बांध टूट ही गया,जब उन्हें पता चला कि विपिन किसी बदनाम लड़की के संपर्क में आ गया है।वे समझ गये कि अब ऑपरेशन का समय आ गया है।तब उन्होंने विपिन को घर से अलग करने का फरमान सुना दिया।

     अपने भविष्य से अनभिज्ञ विपिन को लगा कि अच्छा है अब रोज की चिक चिक से पीछा छूटा, अब आराम से पिंकी के यहां रहेगा,वह उससे कितना प्यार करती है?उसकी माँ भी उसे कितना सम्मान देती है, उसके घर पहुचते ही पिंकी से बात करने को किसी भी बहाने से अकेला छोड़ देती है।विपिन ने सोच लिया कि पिंकी के घर स्थायी रूप से रह लेगा,आंटी खुद उसे कितना चाहती है,सो पिता की हेकड़ी भी निकल जायेगी। जयभगवान जी के विपिन को घर से जाने को कहते ही विपिन ने एक सूटकेश में अपने कपड़े रखे और घर से निकल कर पिंकी के घर पहुंच गया।विपिन को देख पिंकी और उसकी मां बहुत खुश हुई। आंटी  बोली बेटा तुम्हारा घर है,पिंकी भी तुम्हारी है, आराम से रहो।एक बात तो बताओ बेटा तुम तो अपने पिता की अकेले बेटे हो,घर से ही तो निकाला है,अपनी संपत्ति से बेदखल थोड़े ही किया है,उस पर तो तुम्हारा भी हक़ है? अरे आंटी जी जब पापा को और घर ही छोड़ दिया तो उनकी संपत्ति से भला मैं वास्ता क्यूँ रखूं?मैंने ग्रेजुएट कर लिया है,कही भी नौकरी ढूंढ लूंगा।शुरुआती कुछ दिन की बात है,मेरी नौकरी लगते ही सब ठीक हो जायेगा।

      बेटा तुम्हारी नौकरी की आमदनी से क्या भला होगा?मेरी मानो तो अपने पिता से अपना हिस्सा मांग लो।

      नहीं-नहीं, आंटी,पिता की संपत्ति ही लेनी होती तो घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?मैं अपने पिता के बिना अपनी जिंदगी खुद जी कर दिखाऊंगा।

      आंटी ने दावँ न चलते देख विपिन से कहा तो बेटा, जब नौकरी वोकरी मिल जाये,अच्छा भला कमाने लगो तो यहां जरूर आ जाना।पिंकी तब तक तुम्हारा इंतजार करेगी।

     विपिन मानो आकाश से गिरा, वह तो अपने घर को ठसक के साथ तिलांजलि देकर ही पिंकी  के साथ रहने की लालसा के कारण छोड़ आया था,यहां तो एक झटके में ही जवाब मिल गया,और पिंकी भी चुपचाप रही।आवरण हट रहा था,उसके पिता ने पहले ही समझाया था कि गलत राह पर चल रहे हो।अब समस्या थी कि घर वापस किस मुँह से जाये। सोचते सोचते विपिन मोनू के घर पहुंच गया।मोनू ने उसके सोने की व्यवस्था अपने घर के ऊपर के कमरे में कर दी।रात्रि में खाना खाने के बाद मोनू भी विपिन के पास ही आ गया।बातचीत में मोनू को पता लगा कि विपिन घर छोड़ आया है तो वह चिंतित हुआ कि वह उसे कब तक अपने घर मे रख सकता है।जब उसे यह पता चला कि विपिन अपना घर छोड़ते समय घर से अपने कपड़ों के अतिरिक्त कुछ भी नही लाया है तो उसे विपिन एक बेकार का बोझ महसूस होने लगा। रात्रि बीत गयी,अगले दिन विपिन को सब खाली खाली लगा,पहले तो आधा समय घर पर गुजरता था, फिर यार दोस्तो में,पिंकी के यहाँ,पर अब आज क्या करे?मोनू ने भी अप्रत्यक्ष रूप से उसे जता दिया था कि एक दो दिन तो वह उसे अपने घर एडजस्ट कर सकता है,उसके बाद सम्भव नही,यही सोनू का भी इशारा था।विपिन को एक दिन के अंतराल में ही दिन में तारे दिखाई देने लगे।उसे एक एक मिनट काटना भारी लग रहा था।लेकिन करे तो क्या करे?कैसे वापस घर जाये,सोचते सोचते यूँ ही विपिन सोनू के पास जा रहा था,तभी सामने से आती कार ने अपनी साइड उसे मार दी,जिससे वह छिटक कर एक ओर गिर पड़ा।चोट तो अधिक नही लगी,पर सिर सड़क पर टकराने से वह बेहोश हो गया।लोग जमा हो गये, किसी ने पहचान लिया,अरे ये तो जयभगवान जी का बेटा है,उन्हें खबर मिली तो दौड़े आये, बेहोश बेटे को  हॉस्पिटल में एडमिट कराया।पूरे दिन आईसीयू के गेट पर बैठे रहे,आखिर बेटा था उनका।रात में विपिन को होश आया तो जयभगवान जी बावले से हो विपिन को आगोश में ले बोले बेटा मुझे माफ़ कर दे,मैंने तुझे घर से नही निकाला होता, तो ये घटित नही होता,मैं तो आज अपने बच्चे से ही हाथ धो बैठता।

    विपिन आज अपने पिता का वह स्नेह,प्यार वात्सल्य देख रहा था,जिसे वह ठुकराकर चला गया था।उसकी आँखों से आंसुओ की धार बह रही थी,मुँह से शब्द तो नही निकल रहे थे,पर पिता के पैर  पकड़ कर मानो वह अपनी करनी का प्रायश्चित कर रहा था।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवं अप्रकाशित


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