नए जीवन की शुरुआत

 सुबह का सूरज अपने हल्के-हल्के किरणों के साथ कमरे में प्रवेश कर रहा था, लेकिन कमला जी की आँखों में किसी प्रकार की रौशनी नहीं थी। पिछले कुछ महीनों की घटनाएँ उनके मन में लगातार घूम रही थीं। उनका बुढ़ापा अब केवल शारीरिक थकान ही नहीं, बल्कि मानसिक बोझ और अकेलेपन से भी भरा हुआ था।कमला जी ने  आज सुबह जब उन्होंने देखा कि मीरा बाई घर नहीं हैं, तो उनकी चिंता और घुटन और बढ़ गई।

कमला जी ने धीरे-धीरे खिड़की की ओर बढ़ते हुए बाहर देखा। मोहल्ले में हल्की हल्की हलचल थी। बच्चे स्कूल जा रहे थे, महिलाएँ अपने कामों में व्यस्त थीं, लेकिन उनका मन कहीं और ही था। उन्होंने खुद को याद दिलाया, “आज भी मैं अकेली ही हूँ। कोई नहीं पूछेगा कि कैसे हो, क्या चाहिए।”

कमला जी ने खुद को संभालते हुए रसोई की तरफ बढ़ी। उनके हाथों में घड़ी की तरह हर कदम थकान और बेचैनी से भरा था। उन्होंने दूध उबाला और उसे गैस पर रखते ही सोचा, “अब तो सुबह का समय भी मेरे लिए बोझ बन गया है। मीरा बाई छुट्टी पर हैं, तो आज खुद ही सब करना होगा।”

पिछली यादों का मेला उनके मन में घूम रहा था। वे सोचने लगीं कि कैसे कुछ महीने पहले उन्हें अपनी बेटी-संध्या के घर से इस बेटे और बहू के घर भेज दिया गया। उनका मन अशांत था, पर उन्होंने कभी अपनी बेटी की खुशी और शांति के लिए अपने अहंकार को पीछे रखा। लेकिन यहां, बेटे और बहू के घर, उन्हें कभी भी अपने लिए सम्मान और सम्मान की भावना नहीं मिली।

बड़ा बेटा, रोहित, हमेशा बहू के पीछे खड़ा रहता, और छोटी बहू, प्रिया, ने अपनी ताकत का इस्तेमाल केवल यह दिखाने के लिए किया कि घर में असली सत्ता किसके हाथ में है। छोटी-छोटी बातों को लेकर प्रिया का बखेड़ा उनके कानों में हमेशा घुन घुनाता रहता। अगर कोई प्रतिक्रिया होती, तो रोहित उल्टा जवाब देता।

एक दिन ऐसा भी आया जब रोहित ने साफ शब्दों में कहा, “मां, तुम जब से आई हो, घर का सुख-चैन ही चला गया है। तुम्हें समझना चाहिए कि अब यह हमारा घर है, हमारे नियम हैं।” उस दिन कमला जी की दुनिया ही टूट गई थी। अगले ही दिन उन्होंने अपने गांव लौटने का निर्णय लिया। अपने छोटे से कमरे में बोरिया-बिस्तर बांधते समय उनकी आँखों में आंसू थे, पर शब्द नहीं थे।

गांव लौटकर भी उनका अकेलापन कम नहीं हुआ। बेटा और बहू अक्सर फोन से बात ही नहीं करते थे। उनकी बेटी, स्नेहा, तो अपनी शादी के बाद किसी और जीवन में व्यस्त थी। केवल यादें और उनकी फटी-पुरानी तस्वीरें ही उनके साथ थीं।

आज सुबह, जैसे ही उन्होंने गैस बंद किया और खाना बनाने की तैयारी शुरू की, उन्हें अपनी जिंदगी पर गहरी सोच आने लगी। “मैं तो हमेशा परिवार के लिए जीती रही। अपनी खुशी की कभी चिंता नहीं की। अब यह अकेलापन ही मेरी सच्चाई बन गया है।”

वे रसोई में बैठकर अपने हाथों से रोटियां बेल रही थीं। उनकी आंखों में थकान और दिल में उदासी थी। लेकिन अचानक उनके दिमाग में एक विचार आया—“क्यों न कुछ नया किया जाए? क्यों न इस अकेलेपन को चुनौती दी जाए?”

इतना सोचते ही उनके दिमाग में पुराने दोस्त आ गए। बच्चों के समय में हर रविवार को उनके पुराने दोस्त उनके घर आते और वे सभी मिलकर लंबी बातें करते, पुरानी यादों को ताजा करते। तभी उनके मन में उत्साह की एक किरण आई। उन्होंने अपने फोन की ओर देखा।

फोन उठाते ही उन्हें याद आया कि उनके कई दोस्त उनके नंबर पर ब्लॉक थे। अब भी हो सकता है कि उनके दोस्त भूल चुके हों, लेकिन शायद अब वक्त बदल चुका है। उन्होंने तुरंत अपने फोन पर ब्लॉक हटाया और पुराने दोस्तों को संदेश भेजा, “आज शाम को क्या मिल सकते हैं?”

कुछ ही देर में उनके दोस्त, सुरेश जी, ने कॉल किया, “कमला जी, कैसे हो? इतने दिनों बाद फोन लगाया!”

कमला जी की आंखों में चमक लौट आई। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बिलकुल ठीक, बस घर और अकेलेपन की थकान।”

सुरेश जी बोले, “तो इस बार क्यों न हम सब मिलकर पहाड़ी स्थल पर टूर पर चलते हैं? तुम भी आओ।”

कमला जी ने पहले तो हिचकिचाई, लेकिन तुरंत मन में हलचल हुई। “क्यों नहीं? अब समय है अपनी खुशी का भी। अब मैं भी जीने का अधिकार रखती हूं।”

यही सोचकर उन्होंने तुरंत तैयारी शुरू कर दी। रसोई से कुछ जरूरी सामान पैक किया, दवाईयों का बॉक्स तैयार किया, और अपने पुराने कपड़े और जूते खोज निकाले। उन्होंने अपने पुराने बैग में सबकुछ रखा और अपने दिल को हौसले से भर लिया।

दूसरी ओर, रोहित और प्रिया अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त थे। उन्हें पता भी नहीं था कि उनकी मां ने अपने लिए फैसला लिया है। जब वे शाम को घर से बाहर निकल रही थीं, तब कमला जी तैयार होकर अपने बैग के साथ दरवाजे की ओर बढ़ीं।

रोहित ने आश्चर्य से पूछा, “मां, कहां जा रही हो?”

कमला जी ने आत्मविश्वास से जवाब दिया, “मैं अपने दोस्तों के साथ पहाड़ी टूर पर जा रही हूं। यह मेरा भी जीवन है। आप लोग बच्चों और अपनी व्यस्तताओं में उलझे रहो। अब मैं अपनी खुशी के लिए भी जीना चाहती हूं।”

प्रिया ने घुटनों में झुककर कहा, “मां, उम्र हो गई है, क्यों बाहर जाना?”

कमला जी ने ठंडी नजरों से देखा, “अब मेरी उम्र मेरी खुशी के लिए है। किसी और की खुशी के पीछे नहीं भागना। आप लोग अपने काम संभालो, मैं अपने जीवन की जिम्मेदारी खुद लूंगी।”

इतना कहकर उन्होंने बैग उठाया और अपने दोस्तों के साथ यात्रा पर निकल गईं। रास्ते में उन्हें एहसास हुआ कि जीवन केवल दूसरों के लिए नहीं जीया जाता। कभी-कभी खुद के लिए भी जीना ज़रूरी होता है।

पहाड़ी स्थल पहुँचते ही कमला जी ने खुद को नई ऊर्जा से भरा पाया। मित्रों के साथ हँसी-मज़ाक, पुराने किस्सों की बातें, और स्वतंत्रता की भावना ने उन्हें ऐसा महसूस कराया कि जीवन अभी खत्म नहीं हुआ। उनके चेहरे पर वही मुस्कान लौट आई जो वर्षों से खोई हुई थी।

कमला जी ने सोचा, “अब मैं नहीं रुकूंगी। अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए हर संभव कोशिश करूंगी। अकेलापन, तल्खी, और परिवार की अनदेखी—इन सबको पीछे छोड़कर मैं खुद के लिए जीना सीखूंगी।”

यही था कमला जी के नए जीवन की शुरुआत। उस दिन से उन्होंने निर्णय लिया कि चाहे दुनिया कुछ भी कहे, चाहे उम्र कितनी भी हो, खुशियों की तलाश कभी खत्म नहीं होती।


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