अपने लिए जीना

 सुबह-सुबह ही अजय के फोन पर एक हलचल मच गई। बेटा रोहन और बहू स्नेहा अपने-अपने परिवार के साथ तैयार होकर बाहर निकलने वाले थे।

"पापा, हम लोग रिजॉर्ट जाने वाले हैं। शाम तक लौट आएंगे। आप प्लीज़ घर का ख्याल रखना। हां, खाना टेबल पर रख दिया है, जब भी भूख लगे, लेकर खा लेना। रात तक का ही खाना बना दिया है। बाहर जाने में देर होगी, तो थककर खाना नहीं बनेगा। और हां, बाहर ताला लगाकर जा रहे हैं। अपना ख्याल रखना।"

फोन कटते ही अजय ने धीरे-धीरे सोफे से उठकर खिड़की की ओर बढ़े। नीचे देखा तो दोनों बेटे अपनी-अपनी कारों में बच्चों के साथ बैठे रवाना हो गए। एक लंबी सांस लेते हुए उन्होंने महसूस किया कि कितने समय से उन्हें इस तरह अकेला छोड़कर परिवार बाहर गया है।

धीरे-धीरे अजय डाइनिंग टेबल की ओर बढ़े। वहां रखे खाने को देखकर उनका मन भारी हो गया। स्टील के डिब्बे में पांच रोटियां, पतली सी दाल, सलाद के नाम पर एक प्याज कटा हुआ रखा था।
"इतना ही खाना? सुबह आठ बजे ही और आज पूरा दिन यही खाना खाऊंगा?" अजय ने मन ही मन कहा। पिछली बार भी जब परिवार गया था, तब यही हाल हुआ था। रात को घर लौटने पर उन्होंने बस इतना कहा था, "बहू, मुझे बहुत भूख लगी थी।" और फिर बहू की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया देखी।

अजय कमरे की ओर बढ़े और अपनी पत्नी की तस्वीर को देखा। आंखों में आंसू आ गए।
"एक वो थी, जो कभी मुझे भूखा नहीं रहने देती थी। अब तो सच में पेट भर खाने के लिए भी तरस रहा हूं।"

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने सोचा था कि परिवार के साथ खूब घूमेंगे, फिरेंगे। लेकिन अब महसूस हुआ कि घर में रहते हुए भी वह घुटन महसूस कर रहे थे। किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि पापा, आप भी चलना चाहते हैं? दोस्तों के फोन भी नहीं आते, और कोई बाहर बात करने नहीं देता।

अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर। उन्होंने उठाया। दूसरी तरफ़ पुराने दोस्त सुधीर का आवाज़ थी।

"अरे अजय, कैसे हो? कितने दिनों बाद कॉल लग रहा है!"
"सुधीर! इतने समय बाद? कैसे याद आया?"
"भाई, बस यही पूछने कि अब अपनी भाभी के जाने का ग़म खत्म हुआ या नहीं। इस बार रामेश्वरम घूमने चलेंगे, तो क्या चलोगे?"
अजय की आँखें खुल गईं। पिछली दो यात्राओं के बारे में तो उन्हें बिल्कुल पता ही नहीं था। बेटों ने उनकी बात कहीं भी पहुंचाई ही नहीं।

"अरे हाँ, इस बार जरूर जाऊंगा। कितना पेमेंट देना है?" अजय ने उत्साह से पूछा।
"बाद में दे देना। बस आधे घंटे में व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ देता हूँ। कल सुबह ही निकलना है।"

फोन कटते ही अजय ने देखा कि उनके मोबाइल में कई दोस्तों के नंबर ब्लॉक थे। याद आया कि पिछली बार बच्चों को छोड़कर दोस्तों के साथ घूमने गए थे, और बेटे-बहुओं ने उन्हें परेशान किया था।

लेकिन अब उन्होंने तय किया—वे अपने लिए जीएंगे।

अजय उठकर अपनी अलमारी से कपड़े निकाले, स्पोर्ट्स शूज साफ किए, जरूरी कागजात और दवाइयां रखीं। अगले दिन का इंतजार था। रात को बेटों और बहुओं के लौटने से पहले अजय सो चुके थे। किसी ने उनके कमरे में जाने की जहमत नहीं उठाई।

अगली सुबह जब रोहन और स्नेहा चाय पी रहे थे, अजय अपने बैग के साथ बाहर आए।
"पापा, कहां चल दिए?" रोहन ने हैरान होकर पूछा।
"मैं अपने दोस्तों के साथ रामेश्वरम टूर पर जा रहा हूँ। मेरा टिकट है।"

बेटों-बहुओं की आँखें फैल गईं। बड़ी बहू बोली, "पापा, आप ऐसे कैसे जा सकते हैं? बच्चों के एग्ज़ाम शुरू होने वाले हैं, हमारे पास भी बेंगलुरु जाना है, हम कैसे छोड़ सकते हैं?"
छोटी बहू ने कहा, "और पैसे क्यों खर्च करना? अब आपकी उम्र हो गई है, गिर पड़े तो कौन देखभाल करेगा?"

अजय ने शांत रहते हुए कहा, "मुझे ऑर्डर देने वाली तुम कौन होती हो? आप लोगों ने मुझे घर का चौकीदार समझ रखा है। मैंने अपने मोबाइल से दोस्तों को ब्लॉक किया गया पाया। अब सोचो, मेरी इच्छा की कोई कदर नहीं। जो खर्च मैं करना चाहता हूं, वह अपनी कमाई से करूंगा, किसी को बताने की जरूरत नहीं।"

यह सुनकर सभी मुँह चिढ़ाते रह गए। अजय ने बिना किसी बहस के तैयार होकर बाहर निकल लिया।

सड़क पर चलते हुए अजय को पहली बार महसूस हुआ कि वे अपने लिए जी रहे हैं। उनके कदम हल्के थे, और मन में उत्साह की लहर दौड़ रही थी। सोच रहे थे—कितने सालों बाद दोस्तों के साथ हंसी-खुशी में शामिल होंगे, बिना किसी रोक-टोक के।

रामेश्वरम की यात्रा में अजय ने बच्चों और परिवार के फर्ज़ को पीछे छोड़कर खुद को जीने का मौका दिया। समुद्र की ठंडी हवा, मंदिर की शांति, दोस्तों के साथ हंसी-मज़ाक—सब कुछ नया और ताज़ा लग रहा था। उन्होंने महसूस किया कि जीवन का हर क्षण अपने लिए जीना जरूरी है, परिवार के लिए जीना एक बात है, लेकिन खुद के लिए जीना भी उतना ही ज़रूरी।

पहली बार अजय ने अपनी इच्छाओं को प्राथमिकता दी, और इसके लिए किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी। उन्होंने तय किया कि अब हर साल कम से कम एक बार अपने दोस्तों के साथ यात्रा करेंगे।

इस यात्रा ने अजय को सिखाया—कभी भी अपने आत्मसम्मान और खुशी को दूसरों की इच्छाओं के पीछे मत दबाओ। जीवन छोटा है, और समय वापस नहीं आता। अब से वे खुद के लिए जीएंगे, और वही करेंगे जो उन्हें खुशी देगा।

वापसी के समय जब अजय घर लौटे, तो बेटे और बहुएँ चौंक गए। अजय ने मुस्कुराते हुए कहा, "जी हां, मैं वापस आ गया। और अब मैं अपनी खुशी और स्वास्थ्य का ध्यान रखने वाला हूं। उम्मीद है, अब आप लोग भी समझ जाएंगे कि पापा सिर्फ चौकीदार नहीं हैं, बल्कि एक इंसान हैं।"

बच्चों ने देखा कि पिता का आत्मविश्वास और खुशी पहले से ज्यादा बढ़ गई थी। धीरे-धीरे सबने समझा कि कभी-कभी अपने लिए जीना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना परिवार के लिए।

इस दिन के बाद अजय ने घर में नई ऊर्जा और आत्मसम्मान के साथ कदम रखा। अब वह अकेले भी खुश रहते, अपने निर्णय खुद लेते, और जीवन को पूरी तरह जीते।


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