संध्या अपने बच्चों के साथ घर आई। माँ रचना ने उसे अचानक आते देख हैरानी से पूछा,
"अरे संध्या! न कोई खबर, न फोन? कहाँ से आ गई इतनी जल्दी?"
संध्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "माँ, घर की याद आ रही थी, सो सोच लिया आ जाऊं।"
"अंदर तो आओ, पापा कहाँ हैं?"
"पापा ऑफिस गए हैं, शाम तक लौट आएंगे। तुम लोग बैठो, मैं थोड़ा नाश्ता लाकर देती हूँ।"
"नमस्ते नानी!"
"खुश रहो मेरे बच्चों, सब ठीक-ठाक तो हो?"
"जी नानी, सब बढ़िया है। आपकी याद आती है जमशेदपुर में। नाश्ता करके आपसे कहानी सुनाएंगे," बच्चे बोले।
"ठीक है, मैं नाश्ता लाती हूँ, तुम लोग हाथ-मुँह धो लो," रचना बोली।
"मैं भी चलती हूँ, माँ," संध्या ने कहा।
दोनों रसोई की ओर बढ़ीं। नाश्ता तैयार हो गया, बच्चे खेल में मग्न हो गए, और माँ-बेटी बैठकर बातें करने लगीं।
"तो बताओ, अचानक कैसे आ गई हो?" रचना ने पूछा।
संध्या ने एक गहरी साँस ली और बोली, "माँ, मैं अब इस घर में नहीं रहना चाहती। बच्चे भी कुछ नहीं जानते।"
रचना के चेहरे पर झटका सा महसूस हुआ। वह कुछ देर खामोश रहीं, फिर धीरे से बोलीं,
"इतनी बड़ी बात तुम इतनी आसानी से कैसे कह सकती हो? सच में सोच-समझ कर बोल रही हो?"
संध्या ने कहा, "हाँ माँ, मैं पूरी तरह होश में हूँ। 15 साल की मेहनत के बाद मुझे तुम्हारे बेटे से धोखा मिला है। ऑफिस की यात्राओं के नाम पर वो किसी और के साथ था… मुझे कहते हुए भी शर्म आती है।"
रचना ने कहा, "बेटी, मेरी आँखें धोखा नहीं खा सकतीं। तुम्हें कोई गलतफहमी हुई होगी।"
संध्या ने गुस्से में कहा, "माँ, मुझे पूरा यकीन है। अगर आप भी मुझे और बच्चों को बोझ समझती हो तो हम अभी चले जाएंगे।"
रचना ने प्यार से कहा, "अरे, गुस्सा मत करो। जब तक चाहो रहो, ये तुम्हारा भी घर है। बस थोड़ा आराम कर लो, सफर से थक गई हो। मैं थोड़ी देर में आती हूँ।"
रचना कमरे से बाहर चली गईं।
थकान से संध्या सो गई। अचानक फोन की घंटी बज गई। फोन पर अनमोल का आवाज़ था।
"संध्या, तुम कहाँ हो? दरवाज़े पर कितनी देर से खड़ा हूँ, आवाज़ लगाता रहा। कहा था जल्दी आना।"
"मैं घर छोड़ आई हूँ, बच्चों के साथ। अब तुम अपनी ज़िंदगी जी सकते हो। मैं तुम्हें आजाद करती हूँ, फोन मत करना।" कहकर उसने फोन रख दिया।
अनमोल तुरंत जमशेदपुर से रांची के लिए रवाना हो गया। तेज़ गति से गाड़ी चलाते हुए मन में सिर्फ संध्या ही था।
घर पहुंचकर घंटी बजाई। संध्या के पिता ने दरवाज़ा खोला।
"अनमोल बेटा, आने वाले हो, संध्या ने कुछ नहीं बताया?"
"कार्यक्रम बन गया है, उससे मिलने का। मैं ही मिलता हूँ, आप आराम करें।"
कमरे में जाकर अनमोल ने संध्या को देखा।
"बताओ, इतना गुस्सा क्यों? क्या हुआ?"
"जब तुम ऑफिस गए थे, तुम्हारा फोन एक लड़की ने उठाया था। आज दोपहर को भी। कैसे हो सकता है?"
अनमोल ने कहा, "यह तो ऑफिस की लड़की थी, वो ही गलती कर रही है। तुमसे पहले मुझे बता देना चाहिए था। विश्वास नहीं तो मैं अभी बात करता हूँ।"
फोन पर बात सुनकर संध्या हैरान हो गई। आँसू छलक पड़े।
"माफ़ी मांगने की जरूरत नहीं। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। तुम्हारे अलावा कोई नहीं। कोई भी बात हो पहले मुझसे पूछना, घर छोड़कर जाना मत," अनमोल ने कहा और गले लगा लिया।
संध्या ने भी कसम खाई कि आगे से ऐसी गलती नहीं होगी।
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