एक नई सुबह

 सूर्य की पहली किरणें जब खिड़की से छनकर अंदर आईं, तो उन्होंने रवि बाबू को सोफे पर बैठे हुए पाया। उनके चेहरे पर वही उदासी थी, जो पिछले कुछ समय से उनका स्थायी भाव बन गई थी। उनका बेटा और बहू, अपने बच्चों के साथ, सप्ताहांत की छुट्टी मनाने निकल चुके थे।

"पापा, हम लोग शाम तक लौट आएंगे। आप आराम कीजिए। खाने का सब इंतजाम कर दिया है।" बेटे ने जाते-जाते कहा था।

रवि बाबू ने बस सिर हिला दिया। वे जानते थे कि 'खाने का इंतजाम' का मतलब क्या है—सूखी रोटियां और बेस्वाद सब्ज़ी, जो वे पहले से बनाकर रख जाते थे। उनका परिवार उन्हें एक सुविधा से ज़्यादा कुछ नहीं समझता था।

वे धीरे-धीरे उठे और बालकनी में जाकर खड़े हो गए। वहां से उन्होंने देखा, उनकी पोती और पोता कार की पिछली सीट पर बैठे हैं, खुशी से हंस रहे हैं। एक पल के लिए उनके होंठों पर मुस्कान आई, पर अगले ही पल वह फीकी पड़ गई। उन्हें याद आया, एक समय था जब वे भी परिवार के साथ कितनी यात्राएं करते थे। अब तो उन्हें घर की चारदीवारी में ही कैद कर दिया गया था।

तभी उनके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था। उन्होंने हिचकिचाते हुए फोन उठाया।

"अरे रवि, पहचान नहीं रहा क्या? मैं सुरेश बोल रहा हूँ!" दूसरी तरफ से एक उत्साही आवाज आई।

रवि बाबू को हैरानी हुई। "अरे सुरेश, तू? इतने सालों बाद! कहां था यार?"

"मैं तो यहीं था, पर तेरा नंबर ही नहीं मिल रहा था। मैंने कितनी बार कोशिश की, तेरे घर भी गया। तेरी बहू ने कहा कि तू बहुत व्यस्त रहता है, कहीं बाहर जाना पसंद नहीं करता। पर अब एक दोस्त से तेरा नया नंबर मिला है।"

"पर मैं तो नंबर...।" रवि बाबू ने बात पूरी नहीं की। उन्हें याद आया, उनकी बहू ने उनसे कहा था कि उनका नंबर बदल गया है और नया नंबर किसी को नहीं दिया गया है। उनके मन में एक संदेह उठा।

"सुन, इस बार हम लोग गोवा घूमने जा रहे हैं। हम दोस्तों ने मिलकर प्लान बनाया है। क्या तू चलेगा?" सुरेश ने पूछा।

"गोवा? पर मेरा बेटा-बहू...।"

"बच्चों की चिंता मत कर। हमने तेरी टिकट पहले ही करवा ली थी। अगर तू फोन नहीं उठाता, तो हम आज शाम को ही तेरे घर आ जाते। तू बस अपनी पैकिंग कर ले। कल सुबह की फ्लाइट है।"

सुरेश ने फोन रख दिया। रवि बाबू ने तुरंत अपने फोन को चेक किया। उन्होंने पाया कि उनके कई पुराने दोस्तों के नंबर ब्लॉक किए गए थे। उनकी आंखें भर आईं। यह उनके बेटों और बहुओं का किया-धरा था।

उन्होंने धीरे-धीरे अपने आंसू पोंछे और अपने कमरे में गए। उन्होंने अलमारी से अपना पुराना सूटकेस निकाला, जो सालों से बंद पड़ा था। उसमें अपनी मनपसंद शर्ट और पैंट रखी। अपने पसंदीदा जूते निकाले और उनकी धूल साफ की।

रात को जब बेटा-बहू वापस आए, तो रवि बाबू कमरे में सो चुके थे। सुबह, जब वे नाश्ता कर रहे थे, तो रवि बाबू बाहर आए। उनके हाथ में सूटकेस था और चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।

"पापा, आप कहां जा रहे हैं?" बेटे ने पूछा।

"मैं गोवा जा रहा हूँ। दोस्तों के साथ।"

"गोवा? पर इस उम्र में... और इतना पैसा क्यों खर्च करना?" बहू ने कहा। "और अगर आपको कुछ हो गया तो कौन संभालेगा?"

"मेरी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, और रही बात खर्च की, तो वह मेरी अपनी कमाई है," रवि बाबू ने शांत, पर दृढ़ता से कहा। "तुम लोग जब भी बाहर जाते हो, मुझे घर का चौकीदार बना कर जाते हो। अब मुझे कोई रोक नहीं सकता।"

यह कहकर रवि बाबू ने दरवाजा खोला और बाहर निकल गए। पीछे मुड़कर उन्होंने देखा भी नहीं। आज वे एक नई सुबह की ओर बढ़ रहे थे, जहां उनका जीवन केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए भी था।


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