आज रचना की ननद रेशमा, अपने मायके आई है।
"आइये दीदी, बहुत दिनों से आए हो आप हम सब कितना याद कर रहे थे आपको| रेशमा दीदी, शायद 2 साल तो हो गए होंगे आपको यहाँ आए हुए।"
"हाँ भाभी इस बार बहुत ज़्यादा समय से आई हूँ। पूरे एक सप्ताह के लिए रहूँगी आपके पास। अब आप लोग ही हो मेरे मायके में, अम्मा बाबूजी के बाद"।
"अरे दीदी, अब भी आपका ही घर है यह| चलो आओ चाय वाय हो जाये पहले, थक गयी होगी आप सफर से"।
"हाँ हाँ, मस्त मसाले वाली चाय बनाना"।
"जलेबियाँ तो खाओ दीदी आप, यहाँ बहुत अच्छी मिलती हैं"।
"कचौरी लीजिए, यहाँ की कचौरी बहुत प्रसिद्ध हैं|"
रचना व उसके पति मनोज, अपनी बहन के स्वागत में लगे हुए थे।
"आपने कहा था ना, कि स्वरा के लिए रिश्ते बताओ!! मैं 3-4 रिश्ते लायी हूँ, आप को बताती हूँ अभी, बहुत अच्छे घरों के रिश्ते लायी हूँ,अपनी स्वरा के लिए। ये देखो भाभी!! एक से बढ़कर एक रिश्ते, लड़कों के फोटो भी लाई हूँ मैं, अभी आपको बताती हूँ। देखो ये इंजीनियर है, दिल्ली में जॉब करता है, माँ नहीं है इसके। पैसा भी बहुत है इनके पास। एक और ये देखो मेरे ससुराल के रिश्ते में है ये लड़का। इसके दो बहने हैं, माता-पिता नहीं है, राज करेगी हमारी बिटिया वहाँ। और एक ये लड़का है, देखो कितना स्मार्ट है, बहुत ज़मीन ज़ायदाद है, इसके और इसकी भी माँ......"
"क्या दीदी, आप तो एसे रिश्ते बता रही हो, जहाँ माँ नहीं है या माता-पिता दोनों नहीं हैं"। रचना बात काटते हुए बोली।
"अरे... तो क्या हुआ हमारी बेटी राज करेगी वहां ठाठ से रहेगी"।
"नहीं दीदी मैं ऐसे घर में अपनी बेटी को नहीं देना चाहती, यह सोच कर तो बिल्कुल नहीं कि वहाँ उसके सास ससुर नहीं होंगे तो मेरी बेटी राज करेगी या खुश रहेगी"।
"लेकिन क्यों जहाँ सास-ससुर नहीं तो अच्छा ही रहेगा, हमारी स्वरा का हुक्म चलेगा। मेरी सास को आपने नहीं देखा था, इतना तेज स्वभाव था उनका, रोज़ लड़ाई करना, ताने सुनाना, मुझसे बहुत काम करवाती थी वे।
दीदी वह ज़माना अलग था, परिस्थितियाँ व हालात भी कुछ और थे।
देखो दीदी... जब मेरी शादी हुई थी तो मुझे कुछ नहीं आता था, मम्मी जी ने ही मुझे सब कुछ सिखाया, सबके साथ घुलना मिलना, काम करना, परिवार के रिश्तो को निभाना, यह सब कुछ मैंने मम्मी जी से ही सीखा है। मुझसे गलती होने पर डांटा भी है, मम्मी जी ने मुझे कई बार...तो क्या हुआ। अरे गलती पर तो मेरी माँ भी मुझे बहुत डांटती थी।
अरे भाभी...आप कयूं नहीं समझ रही हो,मेरी बात समझने की कोशिश तो करो, मैं स्वरा के भले के लिए ही कह रही हूँ।
"आपकी बात आपके हिसाब से ठीक होगी, लेकिन मेरी इच्छा है कि मेरी स्वरा की जिस घर में शादी हो वहाँ उसके सास ससुर हो "।
"सास-ससुर होना तो किस्मत की बात है। जहाँ सास होती है वहाँ बहू, अपनी सास से बहुत कुछ सीखती है| घर के रीति रिवाज, परिवार के संस्कार, रिश्तेदारों से घुलना-मिलना"। जैसे पीहर में माँ-बाप का होना ज़रूरी है वैसे ही ससुराल में सास-ससुर का होना बहुत ज़रूरी है"।
"ईश्वर की मर्ज़ी के आगे हमारा बस नहीं चलता। लेकिन मैं यह कभी नहीं चाहूँगी कि मेरी बेटी का रिश्ता यह देख कर करूँ, कि यहाँ सास-ससुर नहीं हैं।
मैं चाहती हूँ, कि मेरी बेटी को दोनों माँ और दोनों पिता का प्यार मिले, अपने ससुराल के संस्कारों को जानने का मौका मिले ताकि वह यही संस्कार आगे अपने बच्चों में भी डाल सके। मैं तो चाहूँगी मेरी बेटी को भरा पूरा परिवार मिले।
मेरी माँ भी एक बात कहती थी, कि सास अपनी बहू को स्वंय कह देती है, लेकिन किसी दूसरे को कहने नहीं देती है।
"माँ बिना पीहर नहीं तो सासू बिना ससुराल नहीं"।
"भाभी कह तो तुम ठीक ही रही हो, कल को हमारे बेटों की शादी में भी लड़की वाले यह न सोचें कि अरे बाप रे इसकी तो माँ है अभी..." कहते हुए दोनों ननद-भाभी हँसने लगी।
दोस्तों मेरी कहानी आपको कैसी लगी? अच्छी लगी तो बताइयेगा जरूर, कुछ सुधार की ज़रूरत हो तो सुझावों का स्वागत है।
- नीना माथुर
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