तीस साल पहले दिव्या की शादी राजेन्द्र से हुई थी।उसका सात माह का बेटा आर्यन था। आर्यन की माँ उसको जन्म देते ही संसार से चली गयी थी।
दिव्या आर्यन को सगी माँ से भी ज्यादा प्यार करती थी।उसे आर्यन से इतना प्यार था कि, उसने अपना बच्चा भी नहीं होने दिया।
दिव्या ने शादी से पहले ही राजेन्द्र से निवेदन किया कि,” सबको कह दीजिए आर्यन को कभी पता नहीं होना चाहिए कि मैं उसकी दूसरी माँ हूँ।” राजेन्द्र ने सबसे दिव्या के मन की बात कह दी थी।
समय बीता। आर्यन की शादी थी। दिव्या बहुत उत्साह से शादी के कार्यक्रम करवा रही थी।
तभी दूर की बुआ ने कहा,” पूजा करने के पहले आर्यन की माँ के नाम से साड़ी कपड़े रखो ,पण्डिताइन को दे देना”।
आर्यन बोला,”मेरी मम्मी तो ये हैं”। सब के चेहरे बुझ गये।
आर्यन माँ को झंझोड़ कर रोते हुए बोला “आप मेरी माँ हो, ये बुआजी किस मांँ की बात कर रही है?”दिव्या उसे प्यार से बोली,”अरे तेरी ताईजी के लिये कहा, वह भी तो तेरी माँ थी।”
आर्यन मान तो गया परन्तु, उस के मन में उथल- पुथल मची थी।
शादी बाद ही राजेन्द्र बीमार हो गया। एक बार अलमारी से कपड़े निकालने के लिए उसने आर्यन से कहा। कपड़े निकालते समय एक फ्रेम गिरी उसका कांच टूटकर बिखर गया। आर्यन ने तस्वीर उठाई और पापा से पूछा,” ये कौन हैं?”पापा की आँखों से आँसू बह रहे थे, वे सच नहीं छुपा पाये। बोले,” तेरी माँ है बेटा।”
आर्यन दिव्या की गोद में सिर छुपाकर सिसकने लगा। उसका घाव हरा हो गया था। रोते हुए वह बोला,”पापा कह दो यह झूठ है”।मेरी माँ तो मेरे पास है”। राजेन्द्र बोला,” हाँ बेटा दिव्या ही तेरी माँ यशोदा है”।
सुनीता परसाई'चारु'
जबलपुर मप्र
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