महिमा आज नंदिता के बारे में ही सोच रही थी। आज सुबह उसने नंदिता को काफी कुछ सुना दिया था।
नंदिता उसके महिला मंडल की एक सदस्य थी। आर्थिक तौर पर समृद्ध ही थी। उसका भरा पूरा परिवार था।
पर नंदिता की एक आदत बहुत बुरी थी। हर समय, हर जगह बात किसी की भी चल रही हो, विषय कोई भी हो वह अपनी समस्याएं लेकर बैठ जाती थी और हर समय घड़ियाली आंसू बहाती रहती थी।
व्यावहारिक तौर पर तो यूं वह बहुत अच्छी थी। मगर उसकी इस आदत से पूरा महिला मंडल परेशान था।
इस महिला मंडल का गठन महिमा ने ही किया था। महिला मंडल गठन का उद्देश्य था गरीब होनहार छात्रों की शिक्षा हेतु मदद करना, भारतीय त्योहारों पर सामूहिक रूप से दान पुण्य करना आदि जनकल्याण कार्यों को करना।
यह विचार महिमा का ही था और उसने अपनी कुछ महिला मित्रों, आस पड़ोस की महिलाओं से चर्चा कर इस महिला मंडल का गठन किया था।
ऋषिका, गौतमी, यामिनी, रागिनी प्रतिभा उसकी सहेलियां और भी आसपास की कुछ महिलाएं इस मंडल की सदस्या थीं।
यह सभी महिलाएं अक्सर महिमा से नंदिता की शिकायत करती रहती थीं। किसी को भी नंदिता का यह व्यवहार पसंद नहीं आ रहा था।
अप्रत्यक्ष रूप से महिमा ने नंदिता को तीन चार बार इस बारे में समझाने का प्रयास पहले भी किया था।
कल जब महिला मंडल की बैठक थी और उसमें विषय था कि विद्यालय सत्र शुरू होने वाला है और पास के सरकारी स्कूल के कुछ बच्चों को नए बैग वितरण करने के लिए चर्चा एवं निर्णय।
इस विषय पर चर्चा अभी पूरी भी नहीं हुई थी की नंदिता ने अपने घर में आने वाली सहायिकाओं का विषय छेड़ दिया। और उस पर अपना रोना शुरू कर दिया आए दिन सहायिकाएं नहीं आती है, मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती है ।अब मैं क्या करूं? ऊपर से आज ये मीटिंग क्यों रख ली मुझे तो बहुत काम था।
यह सब सुनते ही ऋषिका और गौतमी चिढ़ गए। दोनों ने ही एक साथ उन्हें कह दिया तो आप मत आतीं, अपना घर संभाल लेतीं। इतना सुनते ही नंदिता रोने लगी और अपने वही घड़ियाली आंसू बहने लगी।
पूरी मीटिंग डिस्टर्ब हो गई और सभी महिलाएं उठकर चलीं गईं। मीटिंग का विषय और चर्चा बिना निर्णय के ही अधूरा रह गया।
उस समय तो महिमा ने कुछ नहीं कहा। परंतु शाम तक सभी महिला मंडल सदस्यों के उसे मैसेज आने लगे थे कि नंदिता जी का कुछ करिए वरना हम इस महिला मंडल की सदस्यता छोड़ देंगे।
इसीलिए उसने आज नंदिता को फोन कर अपने घर बुलाया था कि मुझे आपसे कुछ बात करनी है। आपके पास समय हो तो आप थोड़ी देर के लिए आ जाइए।
नंदिता 11:00 बजे का कहकर लगभग 1:00 बजे उसके घर आई।
आते ही फिर वही पारिवारिक कलह, अन्य महिलाओं की मीटिंग में उसके प्रति व्यवहार को लेकर उसने बोलना शुरू कर दिया। यह भी नहीं पूछा की महिमा ने उसे क्यों बुलाया है और अपने घड़ियाली आंसू बहाना चालू कर दिया।
महिमा ने उसकी पूरी बात तो सुन ली और फिर कहा- नंदिता तुम्हारी बात पूरी हो गई हो तो क्या मैं अब कुछ बोल सकती हूं?
महिमा ने नंदिता से कहा देखो नंदिता समस्याएं किस घर में नहीं होती। हर महिला को अपने घर की समस्याओं को अपने स्तर पर ही सुलझाना होता है। ठीक है कि कभी-कभी वह अपनी समस्याएं अपने मित्रों के साथ साझा कर सकती हैं। मगर वक्त बे वक्त यह सब ठीक नहीं। तुम्हें अगर इतनी ही समस्याएं हैं तो तुमने महिला मंडल ज्वाइन ही क्यों किया? तुम्हें तो अपनी समस्याओं के आगे कुछ और दिखाई ही नहीं देता।
पूरा महिला मंडल तुम्हारे इस व्यवहार से बहुत परेशान है। तुम्हें अपने व्यवहार में परिपक्वता लाने की आवश्यकता है। कल की मीटिंग को जिस तरह से तुमने डिस्टर्ब किया उसका तो तुम्हें बिल्कुल भी मलाल नहीं है। अब भी तुम अपना ही रोना रो रही हो। आज भी तो 11:00 बजे का समय लेकर 1:00 बजे आई हो क्या मेरे समय की कोई कीमत नहीं है?
तुम्हें देर भी हो रही थी तो क्या तुम मुझे कॉल कर सूचित नहीं कर सकती थी?
मैं तुम्हें महिला मंडल की सदस्यता से हटाती हूं। पहले तुम स्वयं को समय दो। अपनी समस्याओं को सुलझाओ।
तुम्हारे लिए यही ठीक होगा।
नंदिता रोनी सी सूरत लिए चली गई।
अब महिमा यही सोच रही थी कहीं उसने कुछ ज्यादा ही तो नहीं सुना दिया।
क्यों लोग यह नहीं समझ पाते कि हमें जो कार्य करना है उसका क्या उद्देश्य है और उसके लिए हमारा क्या कर्तव्य है?????
स्वरचित
दिक्षा बागदरे
0 टिप्पणियाँ