आज मैं बहुत खुश थी। मुझे प्रमोशन जो मिला था। अब मैं अस्सिटेंट मैनेजर हो गई थी। मेरा वेतन भी बढ़ गया था। सबसे पहले घर में मैंने ये खबर अपनी मां को सुनानी चाही। क्योंकि एक मां ही है जो अपने बच्चों की तरक्की से सबसे ज्यादा खुश होती है। घर आते ही मैंने मां के कमरे का रुख किया। दरवाजे से अंदर जाने ही वाली थी कि दस वर्षीय पिंकी मेरी भतीजी की आवाज मेरे कानों में पड़ी। वो दादी से शिकायत कर रही थी कि आज कल बुआ बहुत डांटने लगी है। उसकी शह पाकर सात वर्षीय भतीजा भी बोल उठा, हाँ दादी बुआ आजकल बहुत डांटने लगी है। तभी भावना जो मेरे छोटे भाई की पत्नी थी शायद किचन से बाहर आते-आते बोली,
"देखिये न मांजी, आजकल दीदी कुछ ज्यादह ही चिड़चिड़ी हो गई है। जब देखो तब हमारी गृहस्थी में अपनी नाक घुसेड़ती रहती है।" मां बोली,
"बहू, उसकी समय पर शादी नहीं हुई न इसलिये वो अपनी निराशा कहीं तो निकलेगी न। ४० की हो गई है अब लड़का नहीं मिलेगा। फिर घर खर्चे के लिए इतना रुपया देती है। अब दुधारू गाय की लातें तो सहना ही पड़ेंगी।" बहू बोली,
"अम्माजी, राहुल (पती ) भी अच्छा खासा कमा लेते हैं। अब दीदी की बातें सहन नहीं होती।" अम्मा बोली,
"तो क्या करें, तू ही बता। शादी हो जाती तो अपने घर चली जाती।"
मां की इस तरह की बातों ने मुझे अंतर मन से दुखी कर दिया। बिना जाँच पड़ताल किये कि आखिर मैंने बच्चों को क्यों डांटा, घूम फिर के बात मेरी शादी पर अटक जाती है। मानो सब मुझे घर से भगाने पर तुले हैं। मेरी शादी की उम्र में पिताजी का हार्ट अटेकसे निधन हो गया। तब मैंने घर को सम्हालने का और शादी नहीं करने का निर्णय लिया।
घर को सही सम्हालने छोटे भाई की शिक्षा और नौकरी लगते तक काफी वक्त निकल गया। मुझे बैंक का बढ़िया जॉब मिल गया था और मैं उसमें बहुत खुश थी। और अब ये प्रमोशन। बॉस कह रहे थे तुम चाहो तो पास के शहर में जा सकती हो। चाहो तो यहीं काम कर सकती हो। मैंने निर्णय लिया कि मैं अब पास के शहर का तबादला स्वीकार कर लूंगी। अगर मैं अनवांटेड हूँ तो यहां "अनवांटेड" बन कर नहीं रहना।
श्याम आठले (ग्वालियर /बैंगलोर )
मौलिक।
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