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भाभी

 भाई की शादी से नन्ही आस्था बेहद खुश थी। सभी कह रहे थे कि भाभी के आने से बिन माँ की आस्था को माँ जैसा प्यार मिलेगा और उसके नन्हे कंधे पर से घर के कामों का भी बोझ कम हो जाएगा। माँ की मृत्यु के पश्चात घर के अधिकतर कामों की जिम्मेदारी उस पर ही आ गई थी। 12 साल की उम्र में वह बेहद समझदार एवं जिम्मेदार लड़की बन गई थी। उसकी उम्र के बच्चे खेलकूद में मस्त रहते थे और वह घर के कामों में उलझी रहती थी। उसकी भी इच्छा होती थी कि वह भी उनके साथ खेले, पर वह खेल नहीं पाती थी। सुबह नाश्ता ,खाना बना कर ,अपना और अपने भैया का टिफिन पैक करके,वह स्कूल भागती थी। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद भी वह समय पर स्कूल नहीं पहुँच पाती और रोज उसे अपनी टीचर से डांट मिलती थी । भाई की शादी के बाद सभी कह रहे थे कि अब तो आस्था के मजे ही मजे हैं ।अब उसे खाना नहीं बनाना पड़ेगा ।उसे तो अपना टिफिन भी पैक मिलेगा। अब वह रोज स्कूल समय पर जा पाएगी।

 सुबह-सुबह वो आँगन में बैठी यह सब सोच सोच कर मुस्कुरा रही थी। तभी भैया आए और उससे चाय बनाने को कहा।

" भाभी कहाँ है?... वह पूछ बैठी ।

"अभी वह सो रही है।"

आस्था जल्दी से दो कप चाय बना कर ले आई। भाभी सो रही थी इसलिए उसने उनके लिए चाय नहीं बनाई ।

भाई ने दोनों कप को उठाते हुए कहा," मैं दोनों कप ले जा रहा हूँ। तेरी भाभी को बिना बेड टी की आँखें नहीं खुलती। अब से चाय तीन कप बनाया करो ।"

आस्था आँख फाड़े भाई को देख रही थी।

         रंजना वर्मा उन्मुक्त

           स्वरचित


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