रिश्तों में कड़वाहट

 आज वंदना भाभी को वे शब्द रह-रहकर याद आ रहे थे। वे दो सगे भाई, जो कभी एक ही थाली में खाते थे, एक-दूसरे की परछाई से भी नफरत करने लगे थे। सावित्री जी ने कई बार समझाया था, "बेटी, दीवारें ईंटों की नहीं, दिलों की ऊँची हो गई हैं। एक दिन पछताएगी।" पर तब वंदना को सत्ता और अहंकार का नशा था।

पहाड़ों की गोद में बसे उस छोटे से कस्बे में सुबह की पहली किरण अभी खिड़की के कांच से टकराई ही थी कि बाहर गली में शोर सुनाई दिया। रमण अपने बगीचे में पौधों को पानी दे रहा था, तभी उसने देखा कि सामने वाले पुश्तैनी मकान के बरामदे में बिछी चारपाई खाली है। पिछले बारह वर्षों से वह रोज़ सुबह अपने बड़े भाई, सोमेश जी को वहाँ अखबार पढ़ते देखता था, लेकिन आज वहाँ सन्नाटा था।

गली के मोड़ पर रहने वाले करीम चाचा अपनी साइकिल रोककर चिल्लाए, "रमण बाबू! अरे भाई, सोमेश भैया कहाँ हैं? तीन दिन हो गए, दूध वाला लौट जाता है, अखबारों का ढेर लग गया है और दरवाजे पर सांकल चढ़ी है। कभी ऐसा हुआ नहीं कि सोमेश बिना बताए कहीं चले जाएं।"

रमण का हाथ ठिठक गया। बीस साल पहले हुई जायदाद की लड़ाई और कड़वाहट ने दोनों भाइयों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी जिसे लांघने की हिम्मत किसी ने नहीं की। बीच में एक पतली सी गली थी, पर वह फासला मीलों जैसा था। रमण की पत्नी, चित्रा, भीतर से चाय का कप लेकर आई और करीम चाचा की बात सुनकर उसके माथे पर भी चिंता की लकीरें उभर आईं।

"चित्रा, तुम्हें कुछ पता है? भैया और भाभी बच्चों को लेकर कहाँ गए होंगे? रितु की तो कॉलेज की परीक्षाएँ भी चल रही थीं," रमण ने धीमे स्वर में पूछा।

चित्रा ने मुँह बिगाड़ते हुए कहा, "हमें क्या लेना-देना? जब उन्होंने हमें अपना माना ही नहीं, तो हम क्यों परवाह करें? अपने काम पर ध्यान दो, ऑफिस के लिए देर हो रही है।"

परंतु मन के किसी कोने में एक अनजाना डर रेंगने लगा था। रमण ने ऑफिस जाते समय पड़ोस के किराना स्टोर वाले से पूछा, तो पता चला कि तीन रात पहले सोमेश जी को भयानक सीने में दर्द हुआ था। आधी रात को जब बारिश हो रही थी, सोमेश जी सीढ़ियों से उतरते वक्त संतुलन खो बैठे और गिर पड़े। उनकी पत्नी, वंदना भाभी, अकेली थीं। उन्होंने पड़ोस के एक युवक की मदद से उन्हें पास के जिला अस्पताल पहुँचाया।

रमण के पैर जैसे जमीन में धंस गए। वह ऑफिस जाने के बजाय सीधे अस्पताल की ओर भागा। वहाँ आईसीयू के बाहर के गलियारे में वंदना भाभी बदहवाल बैठी थीं। उनके बाल बिखरे हुए थे और आँखों के नीचे काले घेरे थे। रितु और छोटा बेटा आर्यन पास ही एक बेंच पर दुबके हुए थे।

चित्रा को जब यह खबर मिली, तो वह भी सास, यानी सावित्री जी को लेकर अस्पताल पहुँची। सावित्री जी, जो बड़े बेटे के अहंकार और छोटे बेटे के स्वाभिमान की चक्की में वर्षों से पिस रही थीं, अपने बड़े बेटे की हालत सुनकर टूट गईं।

"वंदना! क्या हुआ मेरे सोमेश को? तूने एक बार हमें खबर करना भी ठीक नहीं समझा? क्या पराये हो गए थे हम इतने?" सावित्री जी ने सुबकते हुए पूछा।

वंदना भाभी ने शून्य में ताकते हुए कहा, "माँ जी, सब इतनी जल्दी हुआ कि सोचने का वक्त ही नहीं मिला। डॉक्टरों ने कहा है कि सिर में गहरी चोट आई है और दिल का दौरा भी पड़ा है। वे वेंटिलेटर पर हैं।"

अगले अड़तालीस घंटे अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में प्रार्थनाओं और सिसकियों के बीच बीते। रमण ने अपनी सारी जमा-पूंजी और रसूख लगा दिया ताकि भाई को सबसे अच्छा इलाज मिल सके। चित्रा, जो अब तक कड़वाहट पालकर बैठी थी, वंदना भाभी की हालत देखकर खुद को रोक न सकी। उसने रितु और आर्यन को संभाला, उनके लिए घर से खाना बनाकर लाई और भाभी का हाथ थामकर उन्हें ढांढस बंधाया।

पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। तीसरी रात, जब पूरा शहर सो रहा था, सोमेश जी ने अंतिम सांस ली। नियति का क्रूर खेल देखिए, जिस भाई से बीस साल तक बात नहीं की, उसी भाई के कंधों पर सोमेश जी की अंतिम यात्रा निकली।

मृत्यु के बाद के वे तेरह दिन आत्म-मंथन के दिन थे। वंदना भाभी अपने कमरे की दीवार से सटकर बैठी अतीत के पन्नों को पलट रही थीं। उन्हें याद आया कि कैसे बीस साल पहले उन्होंने ही सोमेश जी के कान भरे थे। जब रमण की शादी हुई थी, तो वंदना को लगा था कि चित्रा के आने से घर की सत्ता उसके हाथ से निकल जाएगी।

चित्रा एक पढ़ी-लिखी और स्वावलंबी लड़की थी। वंदना को डर था कि सासु माँ चित्रा को ज्यादा तवज्जो देंगी। बस, वहीं से ईर्ष्या का बीज बोया गया। वंदना ने हर छोटी बात को बड़ा बनाया। उसने सोमेश से कहा कि रमण चुपके से पुश्तैनी गहने बेच रहा है, जबकि रमण ने वे पैसे सावित्री जी के इलाज के लिए खर्च किए थे। कलह इतनी बढ़ी कि रसोई अलग हो गई और फिर घर के बीच में दीवार खिंच गई।

सोमेश जी भी पत्नी की बातों में आकर छोटे भाई को अपना दुश्मन समझने लगे थे। जब रमण के जुड़वां बेटे हुए, तो वंदना ने कहा था, "देखना, अब ये लड़के बड़े होकर हमारे बच्चों का हक मारेंगे।" बदले में सोमेश ने रमण के बेटों को कभी प्यार की नज़र से नहीं देखा।

आज वंदना भाभी को वे शब्द रह-रहकर याद आ रहे थे। वे दो सगे भाई, जो कभी एक ही थाली में खाते थे, एक-दूसरे की परछाई से भी नफरत करने लगे थे। सावित्री जी ने कई बार समझाया था, "बेटी, दीवारें ईंटों की नहीं, दिलों की ऊँची हो गई हैं। एक दिन पछताएगी।" पर तब वंदना को सत्ता और अहंकार का नशा था।

तेरहवीं के संस्कार पूरे होने के बाद, मेहमान विदा हो गए। घर फिर से खाली हो गया। सावित्री जी अपने कमरे में जाने के लिए उठीं, तभी वंदना ने उनका पल्लू पकड़ लिया।

"माँ जी... मुझे छोड़कर मत जाइए। मैं इन तीन बच्चों के साथ कैसे जिऊंगी? सोमेश का कोई इंश्योरेंस भी नहीं था, बैंक में बस कुछ हजार रुपये बचे हैं। रितु की पढ़ाई, घर का खर्च... मैं क्या करूँगी?" वंदना फुट-फुटकर रो पड़ी।

सावित्री जी की आँखों में करुणा थी, पर उन्होंने दृढ़ता से कहा, "बहू, तूने खुद यह रास्ता चुना था। तूने अपनों को पराया बनाया। अब हिम्मत जुटा और खुद संभाल।"

तभी बाहर से रमण और चित्रा आते दिखाई दिए। उनके हाथ में कुछ कागज और बच्चों के लिए स्कूल का सामान था। रमण ने वंदना भाभी के पास जाकर कहा, "भाभी, भैया चले गए पर हम तो हैं। रितु और आर्यन की कॉलेज की फीस मैंने भर दी है। और यह देखिए, भैया की कंपनी के मालिकों से मेरी बात हुई है। वे आपको वहां एक डेस्क जॉब देने के लिए तैयार हैं ताकि घर की गाड़ी चलती रहे।"

चित्रा आगे बढ़ी और रितु का हाथ थामकर बोली, "भाभी, कल सुबह से रितु और आर्यन मेरे साथ मेरे घर में रहेंगे। वहां से उनका कॉलेज पास है और उन्हें पढ़ाई का माहौल भी मिलेगा। आप चिंता मत कीजिए, वे अब मेरी जिम्मेदारी हैं।"

वंदना भाभी की ज़बान जैसे सिल गई थी। जिन देवर-देवरानी के लिए उन्होंने 'जहर' उगला था, वही आज उनकी दुनिया को ढहने से बचा रहे थे। उन्हें अपनी सास की बात याद आई कि 'रिश्ते हीरा होते हैं'।

चित्रा ने सावित्री जी की ओर देखा। सावित्री जी जानती थीं कि चित्रा के इस बड़े दिल के पीछे उसके मायके के वे संस्कार थे जहाँ रिश्तों को धन-दौलत से ऊपर रखा जाता था। सावित्री जी ने मन ही मन सोचा कि यदि सोमेश जीवित होता, तो आज उसे अपनी गलती का एहसास होता कि जिस दीवार को उसने सुरक्षा समझा था, वह असल में उसकी बर्बादी का कारण थी।

कुछ ही हफ्तों में पुश्तैनी घर की वह दीवार भले ही भौतिक रूप से खड़ी रही, पर दिलों के दरवाजे खुल गए। वंदना भाभी अब नौकरी पर जाने लगी थीं। शाम को जब पूरा परिवार एक साथ बैठता, तो सावित्री जी की आँखों में संतोष के आँसू होते। उन्हें आभास हो गया था कि भले ही उनका बड़ा बेटा चला गया, पर उसकी गलतियों का प्रायश्चित उसकी संतानों को मिलने वाले प्यार और सुरक्षा में हो रहा था।

आज वंदना भाभी हर किसी से कहती फिरती हैं, "इंसान को कभी अपने रिश्तों में कड़वाहट नहीं घोलनी चाहिए, क्योंकि बुरा वक्त आने पर केवल अपना खून ही काम आता है।" और सावित्री जी दूर बैठी मुस्कुराहट के साथ अपनी 'हीरा' जैसी बहू चित्रा को देख रही थीं, जिसने बिखरते हुए कुनबे को अपनी समझदारी की डोरी से फिर से पिरो दिया था।

मूल लेखिका 

करुणा मलिक 


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