"हाँ कबीर, यही सच है. हम इस आलीशान पिंजरे में सोने की कटोरी में खाना तो खा रहे हैं, लेकिन हमारे पंख काट दिए गए हैं. तुम्हारी अपनी पहचान क्या है? 'विवान खन्ना का भाई'. बस? जिस दिन विवान भैया का कार्ड काम करना बंद कर देगा, उस दिन तुम्हारी जेब में क्या है?"
शहर के सबसे पॉश इलाके 'गुलमोहर पार्क' में स्थित 'रॉयल हाइट्स' की 15वीं मंजिल पर चल रही पार्टी अपने शबाब पर थी. शैम्पेन के गिलास टकरा रहे थे और बैकग्राउंड में हल्का जैज संगीत बज रहा था. यह पार्टी शहर के मशहूर आर्किटेक्ट और बिल्डर, विवान खन्ना ने अपनी नई टाउनशिप की सफलता की खुशी में दी थी.
विवान का छोटा भाई, कबीर, पार्टी की जान बना हुआ था. ब्रांडेड सूट पहने, हाथ में महंगा स्कॉच का गिलास थामे वह मेहमानों की आवभगत ऐसे कर रहा था जैसे यह सारी सफलता उसी की हो.
"अरे मिस्टर मेहता! क्या बात है, आज तो आप बिल्कुल हीरो लग रहे हैं," कबीर ने एक बुजुर्ग बिजनेसमैन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
"शुक्रिया कबीर बेटे. सुना है तुम्हारे भाई ने नया विला खरीदा है लोनावला में?" मेहता जी ने पूछा.
"जी अंकल! भाई का क्या है, उनका तो हाथ मिट्टी पर पड़े तो वो भी सोना हो जाए. अगले वीकेंड हम सब वहीं जा रहे हैं. आप भी चलिएगा," कबीर ने बड़े अधिकार से न्योता दे दिया.
कोने में खड़ी कबीर की पत्नी, नियति, यह सब देख रही थी. उसके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान थी, लेकिन आंखों में चिंता की लकीरें साफ थीं. वह जानती थी कि यह चमक-दमक, यह रूतबा, यह आलीशान पेंटहाउस—इसमें से कुछ भी कबीर का नहीं है. यह सब विवान भैया का है.
कबीर और विवान में दस साल का अंतर था. माता-पिता के जल्दी गुजर जाने के बाद विवान ने ही कबीर को बेटे की तरह पाला था. कबीर ने एमबीए किया था, लेकिन नौकरी करने की जहमत उसने कभी नहीं उठाई. विवान का इतना बड़ा एम्पायर था, कबीर बस ऑफिस जाता, थोड़ी-बहुत फाइलों पर साइन करता और दोस्तों के साथ पार्टियां करता. विवान उसे बहुत प्यार करता था, इसलिए कभी कुछ नहीं कहता. लेकिन विवान की पत्नी, शालिनी, व्यावहारिक थी. वह बुरी नहीं थी, लेकिन उसे यह 'पैरासाइट' (परजीवी) वाली जीवनशैली खटकती थी.
पार्टी खत्म होने के बाद, जब सब मेहमान जा चुके थे, घर के नौकर सफाई कर रहे थे. कबीर सोफे पर पैर फैलाकर बैठ गया.
"भाभी, आज का कैटरिंग वाला कमाल का था. मैंने उसे बोल दिया है कि अगले महीने नियति के बर्थडे पर भी वही खाना लगाएगा," कबीर ने शालिनी से कहा.
शालिनी, जो अपने हीरे के झुमके उतार रही थी, एक पल के लिए रुकी. उसने विवान की ओर देखा, जो थका हुआ लग रहा था.
"कबीर," शालिनी ने शांत स्वर में कहा, "अगले महीने हम यहां नहीं हैं. और... नियति का जन्मदिन हम सादगी से मनाना चाहते थे. बिजनेस में अभी काफी कैश-फ्लो की दिक्कत है."
कबीर हंस पड़ा. "अरे भाभी, आप भी ना! भैया के रहते कैश की दिक्कत? और नियति के लिए तो मैं बेस्ट पार्टी ही दूँगा. है ना भैया?"
विवान ने मुस्कुराने की कोशिश की, "देखेंगे कबीर, अभी सो जाओ."
कमरे में आकर नियति ने कबीर से कहा, "कबीर, हमें अपना अलग घर देख लेना चाहिए. या कम से कम तुम्हें कोई ढंग की नौकरी या खुद का छोटा-मोटा काम शुरू करना चाहिए."
कबीर चिढ़ गया. "तुम फिर शुरू हो गईं? भैया ने कभी कुछ कहा? यह घर मेरा भी है. मैं इस घर का छोटा बेटा हूँ. क्यों जाऊं मैं कहीं और धक्के खाने?"
"क्योंकि यह अधिकार नहीं, एहसान है कबीर. और एहसान की मियाद होती है," नियति ने समझाने की कोशिश की, लेकिन कबीर ने चादर तान ली.
अगले कुछ दिन सामान्य रहे. लेकिन कबीर को एक बड़ा झटका तब लगा जब उसने अपने दोस्तों को घर पर बुलाने का प्लान बनाया. उसने सोचा कि वह दोस्तों के साथ पूल-साइड पार्टी करेगा. उसने अपने दोस्तों के ग्रुप में मैसेज भी डाल दिया.
रविवार की सुबह, वह नाश्ते की टेबल पर बड़े उत्साह से बोला, "भाभी, आज शाम को मेरे कुछ दोस्त आ रहे हैं. करीब दस लोग होंगे. मैंने रसोइये को स्टार्टर्स का मेन्यू दे दिया है."
शालिनी के हाथ से चाय का कप रकाबी पर थोड़ी जोर से गिरा. "आज? लेकिन कबीर, आज शाम को मेरे मायके वाले आ रहे हैं. मेरी बुआ जी की तबीयत ठीक नहीं है, वो लोग उनसे मिलने और डिनर के लिए आ रहे हैं. घर में वैसे ही बहुत भीड़ रहेगी."
"तो क्या हुआ भाभी? मेरा ग्रुप टेरेस पर रहेगा, आपके मेहमान नीचे ड्राइंग रूम में. कोई डिस्टर्बेंस नहीं होगा," कबीर ने लापरवाही से कहा.
"बात डिस्टर्बेंस की नहीं है कबीर," शालिनी की आवाज थोड़ी सख्त हो गई. "बात प्राइवेसी की है. और... रसोइया एक ही है. वह मेरे मेहमानों के लिए खाना बनाएगा या तुम्हारे दोस्तों के लिए स्नैक्स तलेगा? तुम्हें मुझसे पूछना चाहिए था."
"पूछना? अपने ही घर में दोस्तों को बुलाने के लिए अब मुझे परमिशन लेनी होगी?" कबीर का अहं जाग उठा.
तभी विवान वहां आ गया. उसने स्थिति को भांप लिया. "कबीर, शालिनी सही कह रही है. उसके मेहमान पहले से तय थे. तुम अपने दोस्तों को किसी क्लब में ले जाओ. मेरा कार्ड ले लो."
विवान की बात ने कबीर को अंदर तक बेध दिया. भाई ने यह नहीं कहा कि 'कोई बात नहीं, एडजस्ट कर लेंगे'. भाई ने उसे 'क्लब जाने' और 'कार्ड लेने' को कहा. यानी उसे टाल दिया गया. उसे महसूस हुआ कि उसकी योजना, उसकी इच्छा, इस घर के निर्णयों में दूसरे दर्जे पर आती है.
कबीर गुस्से में वहां से उठ गया. उसने अपने दोस्तों को फोन करके प्लान कैंसिल किया. उसे क्लब जाना अपनी तौहीन लगा. वह कमरे में बंद हो गया. नियति ने उसे समझाया, "कबीर, इसमें नाराज होने वाली बात नहीं है. उनका घर है, उनकी प्राथमिकताएं होंगी."
"उनका घर? तुम भी यही कह रही हो?" कबीर चिल्लाया.
"हाँ कबीर, यही सच है. हम इस आलीशान पिंजरे में सोने की कटोरी में खाना तो खा रहे हैं, लेकिन हमारे पंख काट दिए गए हैं. तुम्हारी अपनी पहचान क्या है? 'विवान खन्ना का भाई'. बस? जिस दिन विवान भैया का कार्ड काम करना बंद कर देगा, उस दिन तुम्हारी जेब में क्या है?"
कबीर उस दिन बहुत देर तक बालकनी में खड़ा शहर को देखता रहा. नीचे गाड़ियां चींटियों जैसी दिख रही थीं. उसे याद आया, पिछले हफ्ते उसने गार्डेन में अपनी पसंद के पौधे लगाने को माली से कहा था, लेकिन शाम को देखा कि वहां शालिनी की पसंद के गुलाब लगे थे. छोटी-छोटी बातें अब उसे चुभने लगी थीं. उसे महसूस होने लगा था कि वह इस घर का मालिक नहीं, बल्कि एक परमानेंट गेस्ट है, जिसकी हर सुविधा दूसरे की मर्जी पर निर्भर है.
अगले दिन, कबीर ने नाश्ते पर घोषणा कर दी. "भैया, मैं और नियति अलग शिफ्ट होना चाहते हैं."
विवान चौंक गया. "क्या बकवास है? कोई कमी है यहाँ?"
"कमी नहीं है भैया, बस... मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है," कबीर ने नजरें झुकाकर कहा. शालिनी चुप रही. शायद उसे भी राहत महसूस हो रही थी.
विवान ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन कबीर अड़ गया. उसने शहर के दूसरे छोर पर, एक मध्यम वर्गीय इलाके में एक छोटा सा 2 BHK फ्लैट किराए पर लिया.
शिफ्टिंग वाले दिन, कबीर को असली संघर्ष का एहसास हुआ. रॉयल हाइट्स में उसका सामान नौकर पैक करते थे, यहाँ उसे और नियति को खुद कार्टन टेप करने पड़े. विवान ने उसे गाड़ी और ड्राइवर देने की पेशकश की, लेकिन कबीर ने मना कर दिया. उसने एक ऐप से टेम्पो बुक किया.
जब वे नए फ्लैट में पहुंचे, तो वहां की दीवारों का पेंट कहीं-कहीं से उखड़ रहा था. नल से पानी टपक रहा था और खिड़की खोलते ही सामने वाले घर की रसोई का शोर सुनाई दे रहा था. एसी नहीं था, सिर्फ पुराने पंखे थे जो चलते वक्त 'घर्र-घर्र' की आवाज करते थे.
पहली रात कबीर को नींद नहीं आई. मच्छर काट रहे थे और गद्दे भी उतने नरम नहीं थे जितने वह आदी था. उसे बार-बार रॉयल हाइट्स का वह मखमली बिस्तर याद आ रहा था. उसे गुस्सा आ रहा था—अपनी जिद पर, नियति पर, और विवान भैया पर भी कि उन्होंने उसे जाने क्यों दिया.
अगले कुछ महीने कबीर के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे. उसने विवान की कंपनी छोड़ दी थी और एक स्टार्टअप में नौकरी शुरू की थी. वेतन सामान्य था. जो कबीर एक बार के डिनर में पाँच हजार उड़ा देता था, अब वह सब्जी वाले से दस रुपये के लिए बहस करता था.
एक शाम, वह ऑफिस से थका-हारा लौटा. बस की भीड़ और धक्कों ने उसका बुरा हाल कर दिया था. घर पहुंचा तो देखा कि बिजली नहीं थी. इनवर्टर भी नहीं था. मोमबत्ती की रोशनी में नियति बैठी थी.
"मैं तंग आ गया हूँ नियति!" कबीर ने अपना बैग सोफे पर पटकते हुए कहा. "यह कोई जिंदगी है? पसीना, धूल, और यह अंधेरा! वहां भैया के घर जनरेटर था, पता भी नहीं चलता था कब लाइट गई. हम वापस चलते हैं. मैं भैया से माफी मांग लूँगा."
नियति उठी और उसने कबीर के लिए पानी का गिलास बढ़ाया.
"कबीर, यह पानी मटके का है. ठंडा है. पी लो."
कबीर ने झुंझलाकर पानी पिया.
नियति ने धीमे स्वर में कहा, "आज मैंने अपनी फ्रीलांस राइटिंग के पैसों से यह डाइनिंग टेबल का कवर खरीदा है. देखो, कितना सुंदर है."
कबीर ने उस सस्ते सूती कवर को देखा.
"और कबीर," नियति ने उसके हाथ को थामते हुए कहा, "कल रात जब तुम खर्राटे ले रहे थे, तो मुझे बहुत सुकून मिल रहा था. पता है क्यों? क्योंकि हमें यह डर नहीं था कि हमारी आवाज से किसी की नींद खराब होगी. हमें यह चिंता नहीं थी कि सुबह रसोइया लेट आएगा तो हमें भूखा रहना पड़ेगा. यहाँ हम अपनी मर्जी के मालिक हैं. आज खिचड़ी बनी है, लेकिन यह खिचड़ी हमारी कमाई की है."
कबीर चुप रहा. उसने मोमबत्ती की रोशनी में नियति का चेहरा देखा. वह पसीने में थी, लेकिन उसके चेहरे पर वह तनाव नहीं था जो रॉयल हाइट्स में हमेशा रहता था—वह 'परफेक्ट दिखने' का दबाव वहां नहीं था.
समय बीतता गया. कबीर ने मेहनत करना सीखा. उसने ऑफिस में देर रात तक काम किया, नए प्रोजेक्ट्स लिए. धीरे-धीरे उसकी तरक्की हुई. छह महीने बाद, उसने अपनी पहली बड़ी बोनस राशि से घर के लिए एक सेकेंड हैंड एसी खरीदा.
जिस दिन एसी लगा, कबीर ने खुद मिस्त्री के साथ खड़े होकर फिटिंग करवाई. स्विच ऑन करते ही जब ठंडी हवा का झोंका आया, तो कबीर की आँखों में आंसू आ गए. यह ठंडक विवान के सेंट्रलाइज्ड एसी से कहीं ज्यादा सुकून देने वाली थी. यह ठंडक उसने 'कमाई' थी.
दिवाली का त्योहार आया. विवान ने उन्हें डिनर पर बुलाया था.
कबीर और नियति तैयार होकर रॉयल हाइट्स पहुंचे. वही पुराना वैभव, वही झूमर, वही महंगे परदे. शालिनी ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. विवान ने कबीर को गले लगाया.
"बहुत दुबले हो गए हो यार," विवान ने कहा.
"लेकिन फिट हूँ भैया," कबीर मुस्कुराया.
डिनर टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन थे. कबीर ने देखा कि शालिनी अपने बेटे आरव को डांट रही थी, "आरव, सोफे पर पैर रखकर मत बैठो, गंदा हो जाएगा." फिर उसने विवान से कहा, "विवान, मैंने कहा था न कि इन पर्दों का रंग सोफे से मैच नहीं कर रहा, हमें इंटीरियर डिजाइनर को फिर से बुलाना होगा."
कबीर चुपचाप खाना खाता रहा. उसे वहां का माहौल अब बहुत 'बनावटी' और 'नियंत्रित' लग रहा था. हर चीज जगह पर होनी चाहिए, हर बात नपी-तुली होनी चाहिए.
खाना खाने के बाद विवान कबीर को बालकनी में ले गया.
"कबीर, अब बहुत हो गया यह स्ट्रगल. मैंने तुम्हारे लिए अपनी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट की पोस्ट खाली रखी है. और यह फ्लैट तो तुम्हारा है ही. वापस आ जाओ. वो छोटे से कबूतरखाने में रहने की क्या जरूरत है?"
कबीर ने नीचे शहर की ओर देखा. उसे दूर कहीं अपना वह इलाका महसूस हुआ.
"भैया," कबीर ने विवान का हाथ पकड़कर कहा, "आपका यह महल बहुत खूबसूरत है. इसमें दुनिया की हर सुविधा है. लेकिन सच कहूँ? वहां मेरे उस छोटे से घर में, मैं जिस कुर्सी पर बैठता हूँ, वो मेरी है. मैं जिस दीवार पर कील ठोकता हूँ, उसके लिए मुझे सोचना नहीं पड़ता कि पेंट खराब होगा. वहां मैं सांस लेता हूँ तो मुझे कर्ज का बोझ महसूस नहीं होता."
विवान खामोश हो गया.
"मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ भैया. और हमेशा आऊंगा मिलने. लेकिन अब मैं उस 'सोने के पिंजरे' में वापस नहीं आ सकता. मुझे खुले आसमान में उड़ने की आदत लग गई है, चाहे धूप कितनी भी तेज क्यों न हो."
देर रात जब कबीर और नियति अपने 2 BHK फ्लैट में वापस आए, तो घर बंद होने की वजह से थोड़ी उमस थी. कबीर ने चाबी घुमाकर दरवाजा खोला. अंदर की परिचित गंध—फिनाइल और अगरबत्ती की मिली-जुली महक—ने उसका स्वागत किया.
उसने जूते उतारे और अपने खरीदे हुए उस सोफे पर धम्म से बैठ गया, जिसके स्प्रिंग अब थोड़े ढीले हो गए थे. नियति ने खिड़कियां खोल दीं और रात की ताजी हवा अंदर आने लगी.
"चाय बनाऊँ?" नियति ने पूछा.
"अदरक वाली," कबीर ने जवाब दिया.
वह उठा और बालकनी (जो असल में बस एक छोटी सी गैलरी थी) में खड़ा हो गया. सामने वाली बिल्डिंग में एक बच्चा रो रहा था, नीचे सड़क पर कुत्ते भौंक रहे थे. शोर था, अव्यवस्था थी. लेकिन कबीर ने एक गहरी सांस ली और मुस्कुराया.
यह शोर उसका था. यह हवा उसकी थी.
रसोई से चाय की खुशबू आने लगी थी. कबीर ने मन ही मन सोचा—महल में रहकर राजा के पीछे चलने से बेहतर है, अपनी झोपड़ी का राजा होना. क्योंकि दूसरों के महलों में हमें सिर्फ 'जगह' मिलती है, 'पनाह' और 'सुकून' तो अपनी ही छत के नीचे मिलता है, चाहे वह छत टपकती ही क्यों न हो.
"चाय!" नियति ने पीछे से आवाज दी.
कबीर पलटा, और उसे लगा कि यह उसका अब तक का सबसे आलीशान पल है.
मूल लेखिका
विभा गुप्ता
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