अस्पताल के उस ठंडे कमरे में मशीनें बीप-बीप कर रही थीं, लेकिन दिनेश के कानों में चंदा के उन झुमकों की खनक गूँज रही थी जो अब उसके पास नहीं थे। वह गरीबी की मार से उतना नहीं टूटा था, जितना अपनी पत्नी की विवशता देखकर टूट गया था।
तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला। गायत्री जी (दिनेश की माँ) अंदर आईं। उनके हाथ में एक छोटा सा टिफिन था। उन्होंने आते ही देखा कि दिनेश की आँखें नम हैं और चंदा नजरें चुरा रही है। गायत्री जी बहुत समझदार और ममतामयी स्त्री थीं। उन्होंने चंदा के सूने कान और दिनेश का उतरा हुआ चेहरा देख लिया था।
गायत्री जी ने कुछ नहीं कहा, बस चंदा के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, "बहू, तू घर जा और थोड़ा आराम कर ले। मैं रात भर यहाँ दिनेश के पास रुकती हूँ।" चंदा ने मना करना चाहा, पर गायत्री जी की आँखों के दृढ़ निश्चय के आगे वह हार गई।
ममता का मौन साक्षात्कार
जब चंदा चली गई, तो गायत्री जी दिनेश के बेड के पास बैठ गईं। उन्होंने बड़े प्यार से उसके माथे को सहलाया। दिनेश ने माँ का हाथ पकड़ लिया और सुबकते हुए बोला, "माँ, मैं बहुत अभागा हूँ। चंदा ने अपनी शादी की इकलौती निशानी, वे झुमके बेच दिए जो आपने उसे मुँह दिखाई में दिए थे। और मैं... मैं बिस्तर पर पड़ा देख रहा हूँ।"
गायत्री जी की आँखें भी भर आईं। उन्हें याद आया कि चंदा ने उनसे भी झूठ बोला था कि महेश ने पैसे भेजे हैं। उन्हें अपनी बहू पर गर्व भी हुआ और उसके लिए दुख भी। उन्होंने दिनेश को ढांढस बँधाया, "बेटा, गहने मिट्टी के ढेले हैं, अगर इंसान सलामत रहे। चंदा ने जो किया, वह प्रेम है, त्याग नहीं। और तू चिंता मत कर, समय सब ठीक कर देगा।"
रात भर गायत्री जी सोई नहीं। वे सोचती रहीं कि चंदा ने पूरे परिवार की लाज रख ली, लेकिन एक माँ होने के नाते क्या उनका कोई फर्ज नहीं?
महेश का आगमन और कड़वा सच
दो दिन बाद, छोटा बेटा महेश अस्पताल आया। गायत्री जी ने उसे फोन करके सख्त लहजे में बुलाया था। महेश शहर में अच्छी नौकरी करता था, लेकिन अपनी चकाचौंध भरी जिंदगी में घर-परिवार को भूल चुका था।
जब वह वार्ड में दाखिल हुआ, तो गायत्री जी ने उसे बाहर गैलरी में बुलाया।
"महेश, तूने सुना होगा कि तेरे बड़े भाई अस्पताल में हैं?" गायत्री जी ने पूछा।
महेश ने लापरवाही से कहा, "हाँ माँ, सुना था, पर ऑफिस में बहुत काम था। और फिर चंदा भाभी ने फोन पर कहा था कि पैसों का इंतजाम हो गया है, तो मुझे लगा सब ठीक है।"
गायत्री जी का पारा चढ़ गया। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से एक पुरानी पोटली निकाली और महेश के सामने खोल दी। उसमें उनकी शादी के पुराने सोने के कंगन थे।
उन्होंने कहा, "महेश, यह ले कंगन। इन्हें शहर जाकर बेच दे और इन पैसों से वह झुमके वापस लेकर आ जो चंदा ने अपनी ममता और इस परिवार की इज्जत बचाने के लिए बेचे हैं। तेरी भाभी ने झूठ बोला कि तूने पैसे भेजे हैं, ताकि तेरे भाई की नजरों में तेरी इज्जत कम न हो। पर तू... तू इतना गिर गया कि तुझे अपनी भाभी का त्याग भी नहीं दिखा?"
महेश सन्न रह गया। उसे अपने व्यवहार पर शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे लगा जैसे उसकी माँ के शब्द नहीं, बल्कि पत्थर बरस रहे हों। उसे अपनी उस भाभी की याद आई जो उसे छोटे भाई से बढ़कर बेटा मानती थी।
त्याग का नया अध्याय
अगले कुछ दिन घर में अजीब सी खामोशी रही। दिनेश ठीक होकर घर आ गया था, लेकिन वह अभी भी चंदा के सूने कानों को देखकर अंदर ही अंदर घुटता था।
एक शाम, जब पूरा परिवार ड्राइंग रूम में बैठा था, गायत्री जी ने सबको आवाज दी। रामकिशोर जी भी वहां मौजूद थे। गायत्री जी ने चंदा को अपने पास बुलाया। उनके हाथ में एक लाल मखमल का डिब्बा था।
"माँ जी, यह क्या है?" चंदा ने आश्चर्य से पूछा।
गायत्री जी ने डिब्बा खोला। उसमें वही झुमके थे जो चंदा ने बेचे थे। चंदा के साथ-साथ दिनेश की आँखें भी फटी की फटी रह गईं।
चंदा ने कांपते हाथों से उन्हें छुआ और बोली, "यह... यह आपके पास कैसे आए? मैंने तो इन्हें सुनार को..."
तभी महेश पीछे से आया और अपनी भाभी के पैरों में गिर गया। "भाभी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा था। माँ ने मुझे मेरी असलियत दिखाई। ये झुमके मैं उसी सुनार से वापस लेकर आया हूँ। माँ ने अपने कंगन देने की बात कही थी, पर उन कंगनों की चमक ने मेरी आँखों का अंधकार दूर कर दिया। मैंने अपनी बचत से इन्हें वापस लिया है।"
चंदा ने महेश को उठाया और उसके सिर पर हाथ रखा। वह रो पड़ी।
ममता की पूर्णता
रामकिशोर जी, जो अब तक चुप थे, बोले, "गायत्री, आज तुमने साबित कर दिया कि घर सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति संवेदनाओं से चलता है। चंदा ने दिनेश के लिए त्याग किया, तुमने अपनी बहू के मान के लिए अपने कंगन दांव पर लगा दिए, और महेश ने अपनी गलती सुधार कर इस परिवार के बिखराव को रोक लिया।"
गायत्री जी ने चंदा के कानों में खुद वे झुमके पहनाए। उन्होंने कहा, "बहू, तूने इस घर के 'चिराग' को बचाने के लिए खुद को अँधेरे में रखा। यह गहने अब तेरा श्रृंगार नहीं, बल्कि इस घर के सम्मान का प्रतीक हैं।"
दिनेश की आँखों से अब जो आँसू गिरे, वे दुख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे। उसने महसूस किया कि वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी है, क्योंकि उसके पास ऐसी माँ और ऐसी पत्नी है जिनका हृदय सोने से भी ज्यादा खरा है।
उपसंहार: 1500 शब्दों का सारांश और जीवन दर्शन
यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार में एक सदस्य का त्याग अक्सर दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है। गायत्री जी, जो पहले अपने बेटे के प्रति आसक्ति से भरी थीं, अब अपनी बहू के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान से भर चुकी थीं। उन्होंने समझ लिया था कि बहू केवल घर का काम करने वाली स्त्री नहीं, बल्कि वह धुरी है जिस पर पूरा परिवार टिका होता है।
रामकिशोर जी का घर अब खुशियों से चहक रहा था। महेश बदल चुका था, वह अब नियमित रूप से माता-पिता और भाई का हाल पूछता था। चंदा के कानों के वे झुमके अब उसकी सादगी में चार चाँद लगा रहे थे, पर उन झुमकों के पीछे छिपी जो कहानी थी, वह इस परिवार की आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत बन गई।
प्रेम जब आसक्ति से ऊपर उठकर 'समर्पण' बनता है, तो वह इसी तरह के चमत्कार करता है। गायत्री और चंदा के रिश्ते ने समाज के उस खोखले डर को भी खत्म कर दिया था कि सास-बहू कभी माँ-बेटी नहीं हो सकतीं। उस घर में अब लक्ष्मी का वास था, क्योंकि जहाँ स्त्री का सम्मान और उसके त्याग की कद्र होती है, वहाँ ईश्वर स्वयं निवास करते हैं।
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