सुषमा जी फोन पर अपनी समधन से बड़े चाव से बातें कर रही थीं। "अरे बहनजी, क्या बताऊँ, दामाद जी तो बिल्कुल देवता हैं। कल रिंकी की तबीयत थोड़ी नासाज़ थी, तो उन्होंने पूरा घर संभाल लिया। खुद खिचड़ी बनाई, बच्चों को स्कूल भेजा। सच में, ऐसा संस्कारी दामाद किस्मत वालों को मिलता है। मेरी बेटी तो राज कर रही है।"
फोन रखकर सुषमा जी के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी। वे गुनगुनाते हुए रसोई की तरफ बढ़ीं। उन्हें प्यास लगी थी। लेकिन रसोई के दरवाजे पर पहुँचते ही उनके कदम ठिठक गए। अंदर का नज़ारा देख उनका गर्व, गुस्से में बदल गया।
उनका बेटा, मयंक, सिंक पर खड़ा बर्तन धो रहा था और बहू, कावेरी, डाइनिंग टेबल पर बैठकर लैपटॉप पर खट-खट कर रही थी।
"मयंक!" सुषमा जी की आवाज़ में कड़वाहट थी। "ये क्या हो रहा है? अब मर्दों के हाथों में विम-बार और जूना शोभा देगा? और महारानी जी आराम से कुर्सी तोड़ रही हैं?"
कावेरी सकपका गई और उठने लगी, लेकिन मयंक ने इशारे से उसे बैठने को कहा। उसने नल बंद किया और हाथ पोंछते हुए माँ की ओर मुड़ा।
"माँ, कावेरी की आज एक ज़रूरी मीटिंग है। उसे देर हो रही थी, तो मैंने सोचा मैं मदद कर दूँ। इसमें क्या बुराई है?"
"बुराई?" सुषमा जी ने माथा पीटा। "बेटा, इसे मदद नहीं, 'जोरू का गुलामी' कहते हैं। मर्द बाहर का काम करते हैं, घर का नहीं। अगर उसे काम था तो सुबह जल्दी उठ जाती। तूने तो मेरी नाक कटवा दी।"
मयंक ने एक गहरी सांस ली। वह जानता था कि यह बहस पुरानी है, लेकिन आज उसे खत्म करना ज़रूरी था।
"माँ, अभी दो मिनट पहले आप रिंकी दीदी के ससुराल वालों से बात कर रही थीं न?" मयंक ने शांत स्वर में पूछा।
"हाँ, तो?"
"मैंने सुना आप कह रही थीं कि जीजाजी ने खिचड़ी बनाई क्योंकि दीदी बीमार थीं। आप उन्हें 'देवता' और 'संस्कारी' कह रही थीं। और मैं यहाँ अपनी पत्नी का हाथ बंटा रहा हूँ क्योंकि वह काम में फंसी है, तो मैं 'गुलाम' और 'नाक कटवाने वाला' हो गया?"
सुषमा जी अवाक रह गईं। "अरे, वो... वो तो अलग बात है। वो दामाद है।"
"फर्क क्या है माँ?" मयंक ने कावेरी के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। "रिंकी भी किसी की बेटी है, कावेरी भी किसी की बेटी है। जीजाजी भी नौकरी करते हैं, मैं भी करता हूँ। रिंकी दीदी भी थकती हैं, कावेरी भी थकती है। अगर दामाद का बेटी की मदद करना 'संस्कार' है, तो बेटे का बहू की मदद करना 'अपराध' कैसे हो गया? क्या कावेरी इस घर की नहीं है?"
सुषमा जी के पास कोई तर्क नहीं था। मयंक ने अपनी बात जारी रखी। "माँ, अगर मैं कावेरी का हाथ नहीं बंटाऊंगा, तो कल को मेरे बच्चे भी यही सीखेंगे कि औरतें सिर्फ खटने के लिए होती हैं। मैं नहीं चाहता मेरा बेटा, जीजाजी जैसा 'देवता' न बनकर, एक ऐसा पति बने जो मदद करने में शर्म महसूस करे। इज्ज़त हाथ बंटाने से कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है।"
कावेरी ने धीरे से कहा, "माँजी, बस दस मिनट का काम है, फिर मैं चाय बनाती हूँ।"
सुषमा जी ने बेटे और बहू को देखा। उनकी आँखों के सामने से दोहरे मापदंड का पर्दा हट रहा था। उन्हें अपनी ही बातों का विरोधाभास समझ आ गया था।
वे धीरे से आगे बढ़ीं, मयंक के हाथ से तौलिया लिया और बोलीं, "रहने दे, तू मीटिंग देख ले इसके साथ। बर्तन मैं धो देती हूँ। आज एहसास हुआ कि दामाद अगर बेटा बन सकता है, तो बेटा भी तो दामाद जैसा 'संस्कारी' हो सकता है।"
लेखक : मुकेश पटेल
0 टिप्पणियाँ