नई बहू, नया रिश्ता

 मीरा देवी बरामदे में बैठी थीं। उनके हाथों में रामचरितमानस थी लेकिन निगाहें पन्नों पर नहीं, कहीं दूर शून्य में अटकी हुई थीं। पति सुरेश बाबू पास ही चारपाई पर बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे।

“जानते हो सुरेश, सच कहूँ तो लगता है हमने कोई पुण्य किए होंगे पिछले जन्म में। तभी तो प्रभु ने हमें इतनी अच्छी बहू दी। अरे, सीमा जैसी बहुएँ तो आजकल देखने को भी नहीं मिलतीं। हमेशा मुस्कुराती रहती है, कभी शिकायत तक नहीं की उसने।”

सुरेश बाबू ने सहमति में सिर हिलाया।
“बिलकुल ठीक कहती हो। वरना आजकल की बहुएँ तो ब्याह के दूसरे ही दिन कह देती हैं—‘अलग घर चाहिए’। पर हमारी सीमा… उसने तो आते ही सबको अपना बना लिया। बेटे-बहू की लव मैरिज पर पहले मुझे चिंता थी, लेकिन अब लगता है जैसे सारा डर बेकार था।”

मीरा देवी के चेहरे पर संतोष झलक आया।

सीमा की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। वह पढ़ी-लिखी, बैंक में काम करने वाली आत्मनिर्भर लड़की थी। लेकिन ससुराल आकर उसने नौकरीपेशा होने का कभी घमंड नहीं दिखाया। घर के काम में भी पूरा हाथ बँटाती।

सुबह उठकर सास-ससुर के लिए चाय बनाती, पति रोहन के लिए टिफ़िन तैयार करती और फिर अपने ऑफिस चली जाती। शाम को लौटते ही बच्चों की तरह सास-ससुर के पास बैठती और दिनभर के किस्से सुनाती।

“मम्मी जी, आज ऑफिस में क्या हुआ जानते हो…”
“पापा जी, आपकी दवाई समय पर ली थी ना?”

उसकी मीठी बोली और अपनापन सबको भा गया था।

रोहन एक प्राइवेट कंस्ट्रक्शन कंपनी में इंजीनियर था। हाल के दिनों में कंपनी के मालिक पर टैक्स चोरी का केस हुआ और अचानक कंपनी बंद हो गई।

“अब क्या होगा?” रोहन मायूस होकर बोला।
“इतनी बड़ी नौकरी चली गई। लोन कैसे चुकाऊँगा? ऊपर से शादी में भी बहुत खर्च हुआ।”

मीरा देवी और सुरेश बाबू दोनों चिंता में डूब गए। घर बनाने के लिए लिया गया बैंक लोन हर महीने भारी किस्त माँग रहा था।

उसी दिन बैंक का नोटिस भी आ गया—“यदि तीन महीने में बकाया नहीं जमा किया गया तो मकान नीलाम कर दिया जाएगा।”

घर में सन्नाटा छा गया। सुरेश बाबू बोले—
“रोहन बेटा, तुम्हें बताना जरूरी है, लेकिन सीमा के सामने यह बातें ठीक नहीं लगेंगी। आखिर अभी नई-नई बहू है, क्या सोचेगी?”

मीरा देवी ने गहरी साँस ली—
“नहीं सुरेश, यह गलत है। सीमा अब इस घर की बेटी है। उसे हर खुशी-दुख का अधिकार है। शायद वही हमें कोई रास्ता दिखा दे।”

शाम को जब सीमा ऑफिस से लौटी, तो उसने घर का बदला-बदला माहौल तुरंत भाँप लिया।

“क्या हुआ मम्मी जी? आप लोग इतने उदास क्यों हैं?”

मीरा देवी टालने लगीं, लेकिन सीमा के बार-बार पूछने पर रोहन ने सारा हाल सुना दिया—नौकरी का जाना, लोन की समस्या और बैंक का नोटिस।

सीमा ने बड़ी शांति से सब सुना। फिर मुस्कुराकर बोली—
“बस इतनी-सी बात? इसके लिए इतना परेशान क्यों हो रहे हैं पापा जी? आप लोग चिंतित मत होइए। मेरी सेविंग्स और फिक्स्ड डिपॉजिट अभी तक untouched हैं। मैं चाहूँ तो कल ही बैंक जाकर आधी रकम चुका सकती हूँ। और बाकी भी हम मिलकर कर लेंगे।”

सुरेश बाबू चौंक गए।
“लेकिन बेटी, यह कैसे हो सकता है? तुम्हारी कमाई तुम्हारे लिए है। हम तुम्हारे पैसों पर हक़ कैसे जमाएँ?”

सीमा ने प्यार से उनके हाथ थाम लिए—
“पापा जी, अब यह घर मेरा भी है। आप लोग मेरे माता-पिता जैसे हैं। अगर घर की दीवारें ही गिरने लगेंगी तो क्या मैं चुप बैठ सकती हूँ? यह मकान केवल ईंट-पत्थर का नहीं, इसमें हमारी साँसें हैं, रिश्तों की खुशबू है। मैं इसे टूटने नहीं दूँगी।”

उसकी बातें सुनकर मीरा देवी की आँखें भर आईं।
“देखा सुरेश, हम सही कहते थे। यह बहू नहीं, लक्ष्मी है हमारे घर की।”

सीमा खिलखिलाई—
“मम्मी जी, रोना बंद कीजिए। हमें चाय पीनी है और उसके बाद सब लोग मिलकर आगे की योजना बनाएँगे।”

उस दिन पहली बार उदासी की जगह उम्मीद की किरण फूटी।

सीमा ने अपने ऑफिस में मैनेजर से बात की और पार्ट-टाइम फ्रीलांस काम भी शुरू कर दिया। रोहन ने भी बेरोजगार बैठने के बजाय ट्यूशन पढ़ाना और प्रोजेक्ट्स लेना शुरू किया।

घर का हर सदस्य मिलकर छोटा-छोटा योगदान करने लगा।

मीरा देवी बोलीं—
“बेटी, मैं भी सिलाई का काम कर सकती हूँ। मोहल्ले की औरतें कपड़े दे जाती हैं।”

सुरेश बाबू ने कहा—
“मैं पुराने ग्राहकों से मिलकर फिर से छोटा काम शुरू करता हूँ। घाटा तो हुआ, लेकिन अनुभव तो अब भी मेरे पास है।”

सीमा ने सबका मनोबल बढ़ाया—
“यही असली परिवार है। संकट आने पर सब मिलकर डटकर खड़े हो जाएँ तो कोई भी दीवार हमें गिरा नहीं सकती।”

कुछ ही महीनों में सबकी मेहनत रंग लाई। लोन की आधी से ज्यादा राशि चुका दी गई। बैंक भी अब किस्तों में बाकी रकम लेने को तैयार हो गया।

मीरा देवी एक शाम सीमा के पास बैठीं और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
“बेटी, सचमुच लगता है तुम हमारी तक़दीर हो। अगर तुम न होती तो हम शायद टूट जाते। बहुएँ घर की दीवार होती हैं, लेकिन तुमने तो छत बनकर हमें आंधी-तूफान से बचा लिया।”

सीमा ने नम्र स्वर में कहा—
“मम्मी जी, ये सब आपके संस्कारों का असर है। आपने मुझे बहू नहीं, बेटी का दर्जा दिया। और जब बेटी अपने घर के लिए कुछ करती है तो उसे त्याग नहीं कहते, अपना फर्ज कहते हैं।”

उस रात पूरा परिवार बरामदे में बैठा हंसी-मज़ाक कर रहा था। चाय के प्याले घूम रहे थे और चिंता की जगह सुकून था।

सुरेश बाबू ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“आज मुझे समझ आया, दौलत घर में तब आती है जब बहुएँ सच्चे दिल से घर को अपना मान लेती हैं। असली लक्ष्मी वही है।”

मीरा देवी ने हंसते हुए जोड़ा—
“और बहुओं को बहू नहीं, बेटी मानना ही सबसे बड़ा पुण्य है।”

सीमा की आँखों में चमक थी और दिल में सुकून।


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