बहू की अच्छाई

 राजधानी के एक पुराने मोहल्ले की तंग गली में रहने वाली कमला देवी पिछले कुछ महीनों से दुखी रहती थीं।

कारण?
बाहर की दुनिया की खबरें।
रोज़ किसी न किसी पड़ोसन से सुनने को मिलता — कहीं बहू सास को कोस रही है, कहीं सास बहू की जिंदगी खराब कर रही है, कहीं बेटे बीच में फँसकर परेशान, कहीं बेटी-बहू दोनों नौकरी सम्भालते-सम्भालते टूट रही हैं।

कमला देवी जब भी यह सब सुनतीं, उनका दिल बैठ जाता।
उनके बड़े बेटे की शादी तो वे पहले ही चिंता के चलते टाल चुकी थीं।
छोटे के लिए रिश्तों की बात चल रही थी, लेकिन मन में एक डर था—

“अगर घर में वही रोज़ के झगड़े, वही ताने-बाने शुरू हो गए तो?
अगर बहू आई और मेरा बेटा बदल गया तो?
अगर मैं ही किसी के लिए समस्या बन गई तो?”

ऐसे ही सवाल उन्हें हर रात सोने नहीं देते।

पर समय किसी का इंतज़ार थोड़े करता है।
छोटे बेटे राघव का रिश्ता तय हो गया।
लड़की का नाम स्वरा था—शहर की, पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा, लेकिन व्यवहार में शांत।
कमला ने मन ही मन तय कर लिया—

"जो सुना है सब गलत होगा, ये लड़की घर में सुख लेकर आएगी।
और मैं भी अपने आप को बदली हुई सास बनाऊँगी।
न दखल, न टोका-टोकी… बस अपनापन।"

शादी धूमधाम से हुई।
स्वरा घर आई।
कमला ने हर रिश्तेदार से पहले ही कह दिया —
“बहू है, बच्ची है, इंटरफेयर मत करना। जो उसे ठीक लगे वो करे।”

शादी के शुरुआती दिन गुजर गए।
स्वरा शांत, हँसमुख, थोड़ा संकोची स्वभाव की निकली।
कमला देखती कि वह हर काम पूछकर करती—

“माँ, आज कढ़ी बनाऊँ?”
“आज दाल आपकी तरह फेंटकर बनाऊँ?”
“तुलसी की आरती कर लूँ?”

कमला का मन धीरे-धीरे आश्वस्त होने लगा।
घर में कोई टकराव नहीं था।
राघव भी खुश।
स्वरा ऑफिस जाती, आते ही घर संभालने में लग जाती।
जितना हो सकता, वह कमला का हाथ बँटा देती।

और कमला…
वह बार-बार मन ही मन कहतीं—
“चलो, भगवान ने दया की, अच्छा बच्चा मिला है।”

परंतु असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।

एक दिन घर में व्रत था—हरतालिका तीज
कमला को सालों से आदत थी कि सुबह उठते ही पूजा की व्यवस्था कर देतीं।
इस बार वह चाहती थीं कि बहू सारा काम खुद करे, ताकि घर की परंपरा उसका हिस्सा बन जाए।

रात होते-होते कमला को नींद ही नहीं आ रही थी।
बार-बार करवटें बदलती रहीं—
“अगर मैं देर से उठ गई?
अगर पूजा समय पर न हो सकी?
अगर स्वरा को कुछ पता न हो?
अगर बहू ने अनदेखा कर दिया तो?”

लगभग चार बजे आँख लगी और नींद भारी पड़ी।
जब आँख खुली तो घड़ी सात बजा रही थी।

कमला घबरा गईं—
“हे राम! आज तो सब बिगड़ गया!
बेटा दफ्तर चला जाएगा और पूजा अधूरी रह जाएगी!”

वह जल्दी-जल्दी बाहर निकलीं—

पर जैसे ही दहलीज़ पर पहुँचीं, दृश्य देखकर वे ठिठक गईं।

आँगन में तुलसी के चौरे के पास स्वरा खड़ी थी
सुबह-सुबह झाड़ू लगी हुई थी।
दीपक की लौ जल रही थी, धूपबत्ती की सुगंध फैली थी।
पोलेथिन में से पूजा का सामान निकला पड़ा था—फूल, रोली, अक्षत।

स्वरा ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कहा—
“माँ, आप थक जाती हैं… इसलिए आज मैंने सोचा कि तैयारी कर लूं।
आप नहा लें, सब तैयार है।"

कमला की आँखें भर आईं।

उन्होंने पूछा—
“तुझे कैसे पता कि कौन-सी पूजा? कौन-सी विधि?”

स्वरा ने धीरे से कहा—
“माँ, मैं शादी से पहले ही आपकी आदतें जान रही थी।
राघव बताता था कि आप व्रत-पूजा समय पर करती हैं।
सोचा, अगर मैं आपकी परंपरा को निभा सकूँ तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?”

कमला के अंदर कुछ भर आया—संतोष, गर्व, और एक अनकहा रिश्ता।

वे नहा-धोकर आईं, दोनों मिलकर वटवृक्ष की पूजा करने गईं।
मंदिर के रास्ते में कमला मन ही मन सोचती रहीं—

“कहते हैं ना, रिश्तों में किचकिच तभी होती है जब कोई मन छोटा करे।
इस बच्ची ने दिल बड़ा रखा है… तभी आज इसका व्यवहार दिल को छू गया।”

वटवृक्ष के पास स्वरा ने सास का दुपट्टा ठीक से ओढ़ाया, थाली पकड़ा दी।
कमला ने बहू के माथे पर हल्का सा हाथ रखा—
“बहू, तूने आज मेरी वर्षों की चिंता मिटा दी।
मैंने डर-डर कर बेटे की शादी की…
पर आज लगा कि जिस घर में ऐसी बहू आए वो घर खुशियों से भर जाता है।”

स्वरा मुस्कुरा दी—
“माँ, मैं सिर्फ आपकी बहू नहीं हूँ… आपकी बेटी भी हूँ।
एक बेटी अपनी माँ का हाथ कभी नहीं छोड़ती।”

शाम को जब राघव लौटा, उसने माँ के चेहरे पर अलग ही चमक देखी।
पूछा—
“माँ, सब ठीक? कुछ अच्छा हुआ क्या?”

कमला ने कहा—
“हाँ बेटा… आज समझ आया कि बहू केवल घर के काम बाँटने नहीं आती…
वह घर में भरोसा, सम्मान और अपनापन लाती है।
और जब बहू बेटी की तरह हो… तो घर स्वर्ग बन ही जाता है।”

उस दिन पहली बार कमला ने बहू को गले लगाया—
और स्वरा की आँखें भी नम हो गईं।

राघव दूर खड़ा मुस्कुराता रहा।
घर के आँगन में तुलसी की लौ टिमटिमाती रही—
मानो कह रही हो—

“जहाँ सम्मान और प्रेम हो, वहाँ झगड़े पनप ही नहीं पाते।”

कुछ ही दिनों में, मोहल्ले की महिलाओं के बीच कमला की नई कहानी फैल गई—
लेकिन अब उनकी आवाज़ में डर नहीं था…
बल्कि गर्व था।

वे मुस्करा कर कहतीं—
“बहू की अच्छाई वक्त आने पर दिखती है।
बस पहले दिन से नियम मत थोपो…
दिल से स्वीकार करो, विश्वास दो…
बच्चे भी फूल बनकर खिलते हैं।”

और सच यही था—
घर वही था, आँगन वही…
पर अब उसमें एक बेटी की आहट थी, जिसने घर की हवा बदल दी थी।

मूल लेखिका : कंचन श्रीवास्तव


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