रिद्धि जब पहली बार इस घर की दहलीज़ पर आई थी, उसके पाँव में पायल बजी थी और मन में उम्मीदों का उजाला। बड़े संस्कारों के साथ, जिम्मेदारियों को दिल से निभाने का भाव उसके चेहरे पर साफ दिखाई देता था। शादी के बाद कुछ महीनों में ही सास सुनीता देवी उसकी तारीफों के पुल बाँधने लगी थीं। रिश्तेदार भी कहते— “भाग्य है आपका कि ऐसी बड़ी बहू मिली है, इतनी संयमी और मेहनती!” रिद्धि यह सुनकर बस मुस्कुरा देती, क्योंकि उसके लिए यह सब घर का कर्तव्य था, कोई अहसान नहीं।
समय बीतता गया। पाँच वर्षों तक घर की पूरी ज़िम्मेदारी रिद्धि ने ही संभाली। सुबह के नाश्ते से लेकर रात की रोटियों तक, घर की सफ़ाई से लेकर परिवार के बुज़ुर्गों की दवाइयों तक— हर काम वह मन से करती। उसे कभी नहीं लगा कि यह बोझ है; उसे लगता यह घर उसका है और इसे सँभालना उसका प्यार है।
लेकिन पाँच साल बाद परिवार में दो और शादियाँ हुईं। मंझले बेटे की पत्नी— दिव्या, और छोटे बेटे की पत्नी— सोनल घर में आईं। शुरू में दोनों ने रिद्धि की खूब प्रशंसा की, उससे सीखने की कोशिश भी की। पर जल्दी ही उन्हें लगा कि घर में रिद्धि की बहुत चलती है और सास भी उसी की सुनती है।
धीरे-धीरे उनमें जलन जन्म लेने लगी।
मंझली बहू दिव्या और छोटी बहू सोनल आपस में ज्यादा घुल-मिल गईं। रिद्धि का स्वभाव शांत था, वह दूसरों के काम में दखल नहीं देती थी। लेकिन उसी के शांत स्वभाव का फायदा उठाकर, दोनों ने सुनीता देवी के मन में जहर भरना शुरू कर दिया।
“माँ जी, पता है रिद्धि भाभी क्या कहती हैं? कि आप बस डांटने में तेज़ हैं, काम तो उसे ही करना पड़ता है।”
“माँ, वो सोनल को ताने मारती रहती हैं। हम तो सह जाते हैं, पर आप क्यों सहें?”
बातें छोटी थीं लेकिन असर धीरे-धीरे गहरा होता गया। सुनीता देवी, जो पहले रिद्धि पर पूरी तरह विश्वास करती थीं, अब हर बात को शक की नजर से देखने लगीं। रिद्धि समझ नहीं पा रही थी कि अचानक सास के व्यवहार में इतना बदलाव क्यों आ गया। कभी-कभी बात-बात पर शिकायत, कभी किसी काम में कमी निकालना, कभी ताने— ये सब रिद्धि को भीतर तक चुभता, पर वह चुप रहती।
एक दिन सुनीता देवी मायके से लौट रही थीं। रास्ते में ही दिव्या और सोनल ने मौका देखकर सास के सामने रिद्धि की खूब बुराई की।
“माँ, आप तो जानती हैं, हमारे मन में कोई ईर्ष्या नहीं। पर हमसे छोटी होकर भी वो हमसे भारी काम करवाती है।”
“जब आप मायके गई थीं, उसने कोई काम सही से नहीं करने दिया, बस आदेश देती रहती थी।”
“और माँ, एक बात और… सोनल को मत बताना कि मैंने बताया— वो माँ बनने वाली है। ऐसे में उससे रिद्धि काम करवाती रही। हम तो डरते रहे कहीं कुछ हो न जाए।”
सुनीता देवी की आँखें फैल गईं।
“क्या? सोनल गर्भवती है और रिद्धि से काम करवाती है?”
दोनों बहुओं ने मजबूरी का चेहरा बनाकर गर्दन हिला दी।
सुनीता देवी का दिल तड़प उठा। उन्हें लगा रिद्धि ने उनका विश्वास तोड़ दिया है। मायके की दहलीज से घर तक आते-आते उनका मन गुस्से से भर चुका था।
जैसे ही उन्होंने घर में कदम रखा, रिद्धि ने मुस्कुराते हुए चरण छुए,
“माँ, थक गए होंगे, आप बैठिए—”
लेकिन सुनीता देवी ने हाथ झटकते हुए कहा,
“नाटक करने की जरूरत नहीं है! यह सब मुझे दिखाई नहीं देता क्या?”
रिद्धि हड़बड़ा गई।
“क्या हुआ माँ?”
“जिस बहू पर भरोसा करके मैं घर छोड़ा, उसी ने गर्भवती सोनल से भारी काम करवाया! क्या यही तुम्हारी इंसानियत है? तुमने मंझली और छोटी को परेशान किया! तुम घर तोड़ने पर तुली हो क्या?”
रिद्धि सन्न रह गई। उसे तो सोनल की प्रेग्नेंसी की खबर तक नहीं थी।
“माँ, मैं… मैं कुछ नहीं समझी—”
“मैं कह रही हूँ, तुम्हारी वजह से घर में झगड़े हुए! निकल जाओ यहाँ से! तुम्हारा स्वभाव ही बुरा है!”
इतना सुनते ही रिद्धि का कलेजा फट पड़ा। वह चुप रही, क्योंकि बोलने से बात और बिगड़ती। आँखों में आँसू भरकर वह वहीं बैठ गई।
उधर उसका पति— अर्जुन— जो इतने दिनों से शांत था, माँ की झूठी बातें और रिद्धि की टूटती हालत देखकर सह नहीं पाया।
वह आगे बढ़ा और बोला,
“बस माँ। बहुत हो गया। सात साल से मैं अपनी पत्नी को देख रहा हूँ। उसने कभी किसी से ऊँची आवाज में बात नहीं की, किसी की निंदा नहीं की। घर को उसने अपने हाथों से सींचा है। और आज आप कह रही हैं कि वही घर तोड़ रही है? नहीं माँ… इस बार मैं चुप नहीं रहूँगा।”
सुनीता देवी ने तिरस्कार भरी नजर से देखा,
“तो तुम भी उसकी तरफदारी करोगे?”
“अगर सच बोलना तरफदारी है, तो हाँ। अगर इस घर में रिद्धि के लिए इज़्ज़त नहीं है, तो हम दोनों यहाँ से जा रहे हैं।”
सुनीता देवी हक्की-बक्की रह गईं।
“तो बहू बेटा दोनों मुझे छोड़कर जा रहे हो? यही संस्कार दिए तुमने उसे?”
अर्जुन ने बस इतना कहा—
“अगर प्यार को अपराध मान लिया जाए, तो हम दोषी ही सही।”
उस दिन रिद्धि और अर्जुन घर छोड़कर चले गए। रिद्धि टूट चुकी थी लेकिन फिर भी उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक साल तक वह अपने मायके में रही। अर्जुन ने नौकरी के कारण दूसरी जगह छोटा-सा घर ले लिया। दोनों अपने जीवन को नए सिरे से सँभालने लगे।
घर में उधर हर दिन नया ड्रामा होता। सुनीता देवी को धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि रिद्धि की गैर मौजूदगी में घर संभालना कितना मुश्किल है। दिव्या और सोनल शुरू में तो खुश हुईं, लेकिन कुछ महीनों में ही एक-दूसरे से लड़ने लगीं।
सुनीता देवी को रिश्तेदारों से खबरें मिलतीं—
“दोनों बहुएँ आपस में खूब झगड़ती हैं।”
“खाना समय पर नहीं मिलता।”
“घर गंदा रहता है।”
“दवाइयाँ तक समय पर नहीं मिल रहीं।”
छोटी बहू सोनल, जिस पर उन्होंने आँख मूँदकर भरोसा किया था, वही अब उन्हें ताने मारती।
“सासू जी, हम नौकरानी थोड़ी हैं!”
“हमने आपका घर संभालने का ठेका नहीं लिया!”
धीरे-धीरे घर बिखरने लगा।
सुनीता देवी बीमार पड़ने लगीं।
उन्हें रिद्धि की कमी महसूस होने लगी— उसकी शांत आवाज़, उसकी सेवा, उसका धैर्य।
एक दिन वह रोते-रोते अर्जुन को फोन किया।
“बेटा… मैं बहुत बड़ी गलती कर बैठी।
जिसे सोना समझना चाहिए था, उसे पत्थर समझ लिया।
जिसने घर को दिल से संभाला, उसे मैंने ही घर से निकाल दिया।
अगर हो सके… रिद्धि को कहो कि वापस आ जाए।
मेरी राह देख रहा है घर… मैं भी देख रही हूँ।”
अर्जुन ने फोन रिद्धि को दिया।
रिद्धि की आँखें भर आईं।
सुनीता देवी के स्वर में जो पश्चाताप था, वह सच्चा था।
पर यह जीत किसी के हारने से नहीं,
रिद्धि की सच्चाई, धैर्य और चरित्र के बल से मिली थी।
रिद्धि ने धीरे से कहा,
“माँ… गलती आपकी नहीं, हालात की थी।
हम वापस आएँगे।”
सुसंध्या की रोशनी में रिद्धि और अर्जुन जब अपने पुराने घर की ओर लौटे, सुनीता देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं—
आँखों में वही पछतावा, वही प्यार,
और दिल में वही प्रेम…
जो वर्षों से दबे रहने के बाद आज अपना रास्ता खोज चुका था।
कभी-कभी जीत शोर से नहीं मिलती,
बल्कि चुप रहकर सही वक्त पर सच सामने आता है।
और वहीं से घर फिर से बनता है—
धीरे-धीरे,
प्यार से,
और सच्चाई की नींव पर।
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