नया सवेरा

  "तुम कहती हो कि हम अपनी कमाई का हिस्सा यहाँ भेजते हैं. अरे, मैं जो कमा रहा हूँ, वो मेरा है ही कहाँ? मेरी नींव तो इसी मिट्टी में गड़ी है. अगर भैया ने अपनी जवानी इस मिट्टी में नहीं खपाई होती, तो मैं आज एसी कमरे में बैठकर डील साइन करने लायक नहीं होता. यह जो 'दिवाकर' आज खड़ा है, यह इसी बाग की सबसे कीमती फसल है. और तुम चाहती हो कि मैं उस जड़ को ही काट दूँ जिसने मुझे सींचा है, 

खिड़की के बाहर पसरी अमराई में झींगुरों की आवाज़ गूंज रही थी. दोपहर की उमस भरी गर्मी में भी पुराने सीलिंग फैन की घरघर्राहट के बीच, दिवाकर के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं. वह हाथ में थामे उस मोटे से एग्रीमेंट पेपर को घूर रहा था, जिसके एक हस्ताक्षर से उसकी जिंदगी की दिशा बदलने वाली थी.

"दिवाकर, अब और कितना सोचोगे? बिल्डर शाम को 5 बजे आने वाला है. अगर आज हमने 'हाँ' नहीं की, तो यह डील हाथ से निकल जाएगी," शिखा ने कमरे में आते ही, हाथ में थमे ठंडे पानी के गिलास को मेज पर पटकते हुए कहा. उसके स्वर में एक अधीरता थी, एक ऐसी जल्दबाजी जो पिछले छह महीनों से दिवाकर महसूस कर रहा था.

दिवाकर ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी आँखों को मला. "शिखा, यह सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं है. यह 15 बीघा का बाग और यह पुराना पुश्तैनी मकान... बाबूजी की आत्मा बसती है इसमें."

"आत्मा और जज्बातों से बच्चों की स्कूल फीस नहीं जाती, दिवाकर," शिखा ने कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठते हुए कहा. "तुम खुद देखो, पिछले तीन साल से इस बाग से क्या मुनाफा हुआ है? कभी ओले पड़ जाते हैं, कभी आंधी में आम झड़ जाते हैं. ऊपर से काका और काकी की दवा-दारू का खर्च, घर की मरम्मत... हम अपनी सैलरी का आधा हिस्सा तो इसी 'सफेद हाथी' को पालने में लगा देते हैं. शहर में हमारा अपना फ्लैट लेने का सपना कब पूरा होगा?"

दिवाकर चुप था. शिखा गलत नहीं थी. वह और शिखा दोनों शहर में नौकरी करते थे. दिवाकर एक आईटी कंपनी में मैनेजर था और शिखा एक स्कूल में टीचर. वीकेंड पर वे अक्सर गाँव आते थे, लेकिन यह आना सुकून के लिए कम और जिम्मेदारियों को निभाने के लिए ज्यादा होता था. गाँव में दिवाकर के बड़े ताऊजी के बेटे, निशिकांत भैया और उनका परिवार रहता था. निशिकांत भैया ही इस बाग और खेती-बाड़ी को संभालते थे, लेकिन आमदनी इतनी नहीं थी कि सबका गुजारा हो सके. इसलिए, शहर से दिवाकर को हर महीने एक मोटी रकम भेजनी पड़ती थी.

"देखो दिवाकर," शिखा ने अपनी आवाज़ नरम करते हुए कहा, "बिल्डर पूरे 4 करोड़ दे रहा है. आधा निशिकांत भैया का, आधा हमारा. दो करोड़ में हम मुंबई के पॉश इलाके में घर ले सकते हैं, आरव के लिए फ्यूचर सिक्योर कर सकते हैं. और निशिकांत भैया भी उस पैसे से शहर में कोई छोटा बिजनेस शुरू कर सकते हैं. कब तक वो मिट्टी में खटते रहेंगे?"

दिवाकर ने गहरी सांस ली. "भैया से बात हुई?"

"मैंने भाभी से बात की थी. वो तो तैयार हैं. बस भैया और काका जी को मनाने की देर है. और फैसला तो तुम्हें ही लेना है, आखिर तुम्हारे नाम पर भी तो हिस्सा है."

दिवाकर उठा और कमरे से बाहर निकल गया. वह सीधे पीछे के आंगन से होता हुआ अमराई (आम के बगीचे) में चला गया. जेठ की दुपहरी में भी आम के घने पेड़ों के नीचे एक अजीब सी ठंडक थी. उसने एक पुराने, विशाल दशहरी आम के पेड़ के तने पर हाथ फेरा. उसकी छाल खुरदरी थी, ठीक वैसे ही जैसे उसके पिता के हाथ हुआ करते थे.

तभी उसे वहां निशिकांत भैया दिखाई दिए. वे एक मजदूर के साथ मिलकर नाली ठीक कर रहे थे ताकि पेड़ों की जड़ों तक पानी पहुंच सके. पसीने से लथपथ, मिट्टी में सने निशिकांत ने दिवाकर को देखा तो मुस्कुरा दिए.

"अरे छोटे, तू यहाँ धूप में? अंदर बैठता, मैं बस ये पानी का रास्ता खोलकर आता हूँ," निशिकांत ने गमछे से चेहरा पोंछते हुए कहा.

दिवाकर को अचानक शर्म महसूस हुई. वह एसी ऑफिस में बैठकर उंगलियां चलाता था, और यहाँ उसका बड़ा भाई 45 डिग्री तापमान में कुदाल चला रहा था.

"भैया, रहने दीजिए न. मजदूर कर लेगा," दिवाकर ने कहा.

"मजदूर को क्या पता कि किस पेड़ को कितनी प्यास लगी है, छोटे. ये पेड़ हमारे बच्चे जैसे हैं. देख रहा है इस 'लंगड़ा' आम के पेड़ को? इस बार इस पर गजब का बौर आया है," निशिकांत की आँखों में एक चमक थी, जो शायद करोड़पति बनने के सपने से कहीं ज्यादा गहरी थी.

शाम को ड्राइंग रूम में तनाव पसरा हुआ था. बिल्डर के आने में अभी एक घंटा बाकी था. शिखा ने सारे कागजात तैयार रखे थे. घर के बुजुर्ग, यानी दिवाकर के ताऊजी (जिनको सब 'बड़े बाबा' कहते थे), अपनी आराम कुर्सी पर आंखें मूंदे लेटे थे. निशिकांत भैया एक कोने में सिर झुकाए बैठे थे और भाभी रसोई में बर्तनों को कुछ ज्यादा ही जोर से पटक रही थीं—शायद यह उनका मौन समर्थन था शिखा के प्रस्ताव को.

"बड़े बाबा," शिखा ने हिम्मत करके चुप्पी तोड़ी, "बिल्डर ने रेट बहुत अच्छा लगाया है. आजकल वैसे भी खेती में कुछ बचा नहीं है. यह मौका बार-बार नहीं मिलेगा."

बड़े बाबा ने धीरे से आंखें खोलीं. उनकी नजरें शिखा पर नहीं, बल्कि दिवाकर पर टिकी थीं. "दिवाकर, तू क्या चाहता है बेटा?"

दिवाकर ने शिखा की तरफ देखा, जिसकी आँखों में उम्मीद थी. फिर उसने निशिकांत भैया की तरफ देखा, जो शायद अपने ही घर में बेगाने होने के डर से सिकुड़े जा रहे थे.

"बाबा, शिखा सही कह रही है," दिवाकर ने भारी मन से कहा. "शहर में खर्चे बढ़ रहे हैं. आरव बड़ा हो रहा है. यहाँ से जो थोड़ा बहुत आता है, वो मेंटेनेंस में ही चला जाता है. अगर हम बेच दें, तो सबकी जिंदगी आसान हो जाएगी."

शिखा के चेहरे पर जीत की मुस्कान तैर गई. उसने एग्रीमेंट पेपर दिवाकर की ओर बढ़ाया. "तो फिर ठीक है. पहले तुम साइन कर दो, फिर भैया कर देंगे."

दिवाकर ने पेन उठाया. निब कागज को छूने ही वाली थी कि उसकी नजर सामने दीवार पर टंगी एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर पर पड़ी. वह तस्वीर उसके पिता और बड़े बाबा की थी, जब उन्होंने पहली बार इस बंजर जमीन पर आम के पौधे लगाए थे.

अचानक दिवाकर के दिमाग में एक पुराना दृश्य कौंध गया. वह शायद दस साल का था. उसे बोर्डिंग स्कूल भेजने की बात चल रही थी, लेकिन घर में पैसे नहीं थे. उस साल ओले पड़े थे और फसल बर्बाद हो गई थी. पिता जी हताश बैठे थे. तब बड़े बाबा ने निशिकांत भैया (जो उस वक्त खुद कॉलेज जाने वाले थे) की पढ़ाई रोककर, घर का एक हिस्सा गिरवी रखकर दिवाकर की फीस भरी थी.

दिवाकर का हाथ कांप गया.

"क्या हुआ?" शिखा ने पूछा.

दिवाकर ने पेन नीचे रख दिया. उसने एक लंबी सांस ली और शिखा की आँखों में देखा.

"शिखा, हम ये जमीन बेचकर शहर में पेंटहाउस ले लेंगे. मर्सिडीज भी आ जाएगी. लेकिन एक बात बताओ, उस एग्रीमेंट में एक क्लॉज और डलवा लें?"

"कैसा क्लॉज?" शिखा हैरान थी.

"यही कि इस संपत्ति को बेचने से पहले, मैं अपनी डिग्री, अपनी नौकरी और अपनी यह शानदार कॉर्पोरेट पहचान भी इसी बिल्डर को सौंप दूँ."

"तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो, दिवाकर?" शिखा झुंझला उठी.

दिवाकर अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया. उसकी आवाज में अब कंपन नहीं, बल्कि एक दृढ़ता थी.

"बहकी बातें नहीं, शिखा. गणित लगा रहा हूँ. तुम कह रही हो कि यह बाग और यह घर हम पर बोझ है. हम इसका खर्च उठा रहे हैं. लेकिन सच तो यह है कि यह बाग हमारा बोझ नहीं उठा रहा, बल्कि इसने मुझे इस काबिल बनाया कि मैं बोझ उठा सकूं."

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. भाभी रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं.

दिवाकर ने निशिकांत भैया के कंधे पर हाथ रखा. "तुम्हें याद है शिखा, जब मेरी इंजीनियरिंग के आखिरी साल की फीस भरनी थी, तब घर में पैसे नहीं थे? भैया ने उस साल अपनी शादी के लिए जमा किए गए पैसे मेरी फीस में दे दिए थे और खुद दो साल तक शादी टाली थी. यह बाग उस साल सूखा पड़ा था, लेकिन इन लोगों के स्नेह का स्रोत नहीं सूखा था."

वह शिखा की ओर मुड़ा. "तुम कहती हो कि हम अपनी कमाई का हिस्सा यहाँ भेजते हैं. अरे, मैं जो कमा रहा हूँ, वो मेरा है ही कहाँ? मेरी नींव तो इसी मिट्टी में गड़ी है. अगर भैया ने अपनी जवानी इस मिट्टी में नहीं खपाई होती, तो मैं आज एसी कमरे में बैठकर डील साइन करने लायक नहीं होता. यह जो 'दिवाकर' आज खड़ा है, यह इसी बाग की सबसे कीमती फसल है. और तुम चाहती हो कि मैं उस जड़ को ही काट दूँ जिसने मुझे सींचा है, सिर्फ इसलिए क्योंकि अब मुझे फल बाजार में बेचने हैं?"

शिखा अवाक रह गई. उसने कभी इस नजरिए से सोचा ही नहीं था. उसे हमेशा लगता था कि दिवाकर 'सेल्फ-मेड' है, लेकिन आज उसे समझ आया कि कोई भी पेड़ हवा में नहीं उगता.

"लेकिन दिवाकर... प्रैक्टिकल भी तो होना पड़ेगा. खर्चे..." शिखा ने कमजोर तर्क दिया.

"प्रैक्टिकल ही तो हो रहा हूँ," दिवाकर ने कहा. "हिसाब बराबर कर रहा हूँ. जिस दिन मैं भैया के उस त्याग का मोल चुका दूँगा, जिस दिन मैं बड़े बाबा के उस गिरवी रखे गहनों की कीमत अदा कर दूँगा, उस दिन मैं इस जमीन का मालिक बनूँगा और इसे बेचने का हक रखूँगा. और सच कहूँ? वह कर्ज इतना बड़ा है कि मेरी सात पुश्तें भी नहीं चुका सकतीं."

उसने एग्रीमेंट पेपर उठाया और उसे दो टुकड़ों में फाड़ दिया.

"हम शहर में अपनी जरूरतों को कम कर लेंगे, शिखा. बड़ी गाड़ी नहीं लेंगे, छोटे फ्लैट में रह लेंगे. लेकिन मैं अपनी जड़ों का सौदा करके अपनी छत नहीं खरीदूंगा."

निशिकांत भैया, जो अब तक पत्थर की मूरत बने बैठे थे, अचानक फूट-फूट कर रो पड़े. वे उठकर दिवाकर के गले लग गए. दो भाइयों का यह मिलन सिर्फ प्रेम का नहीं, बल्कि सम्मान और अस्तित्व का मिलन था.

बड़े बाबा की आँखों से भी आंसू बह निकले. उन्होंने कांपते हाथों से अपना चश्मा ठीक किया और बोले, "मुझे लगा था आज मेरा घर ईंट-पत्थरों के भाव बिक जाएगा. लेकिन आज मुझे यकीन हो गया कि मैंने वारिसों को नहीं, बल्कि रखवालों को पाला है."

शिखा चुपचाप खड़ी यह दृश्य देख रही थी. उसे अपनी सोच पर ग्लानि हो रही थी. वह हमेशा 'आज' और 'कल' के बारे में सोचती थी, लेकिन दिवाकर ने उसे 'बीते हुए कल' की अहमियत समझा दी थी.

थोड़ी देर बाद, जब माहौल शांत हुआ, तो शिखा धीरे से निशिकांत भैया के पास गई.

"भैया," उसने संकोच से कहा.

"हाँ बहू?"

"वो... आप कह रहे थे न कि दशहरी वाले पेड़ों पर इस बार बौर अच्छा आया है? अगर हम इस बार ऑर्गेनिक तरीके से आम की पैकेजिंग करके सीधे शहर की सोसायटियों में बेचें तो? मैं मार्केटिंग देख लूँगी."

दिवाकर ने चौंककर शिखा को देखा. शिखा की आँखों में अब लालच नहीं, बल्कि एक नई साझेदारी की चमक थी.

"और हाँ," शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा, "अगले महीने की सैलरी से पहले हम इस घर की छत की मरम्मत करवाएंगे. आखिर, जब जड़ें मजबूत हों, तो पेड़ को हर तूफान से बचाने की जिम्मेदारी भी तो टहनियों की ही होती है."

बाहर अमराई में हवा का एक झोंका आया, जिससे सारे पेड़ एक साथ झूम उठे. ऐसा लगा जैसे वे भी इस फैसले पर तालियां बजा रहे हों. शाम घिर आई थी, लेकिन उस पुराने घर में एक नया सवेरा हो चुका था.


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