उम्मीद का एक नया दीया

 पहाड़ों की गोद में बसे एक छोटे से गाँव में शाम की धुंध छाने लगी थी। घर के बरामदे में बैठी बड़ी बहन काव्या रह-रहकर अपने मोबाइल की स्क्रीन देख रही थी। पिछले कई दिनों से घर का माहौल बोझिल था। घर के एक कोने में बैठी उनकी माँ, सुशीला देवी, सूनी आँखों से ढलते सूरज को देख रही थीं। उनके हाथ में वही पुराना स्वेटर था जो वह अपनी छोटी बेटी ईशा के लिए बुन रही थीं, लेकिन पिछले चार दिनों से एक भी फंदा आगे नहीं बढ़ा था।

काव्या ने एक लंबी सांस ली और ईशा का नंबर मिलाया। कई बार घंटी जाने के बाद ईशा ने फोन उठाया, पर उसकी आवाज़ में वह पहले जैसी खनक नहीं थी।

"ईशा, आखिर क्या चल रहा है तुम्हारे मन में? माँ पिछले चार दिनों से निढाल पड़ी हैं। उन्होंने खाना-पीना लगभग छोड़ दिया है। हर बार जब तुम्हारा फोन नहीं आता, वह दरवाजे की ओर ऐसे देखती हैं जैसे तुम अभी आँगन में कदम रखोगी। कम से कम माँ की ममता का तो लिहाज करो," काव्या ने स्वर में थोड़ी सख्ती और ढेर सारी चिंता समेटकर कहा।

"दीदी, मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी। आप लोग अपनी दुनिया में खुश रहिए, मुझे अकेला छोड़ दीजिए," ईशा का स्वर सपाट और बर्फीला था।

"अकेला छोड़ दूँ? ईशा, हम सगी बहनें हैं। माँ ने हम दोनों को अपनी हथेलियों पर छाले की तरह सहेजकर बड़ा किया है। पिताजी के जाने के बाद उन्होंने सिलाई कर-करके हमें पढ़ाया। आज जब तुम शहर में सेटल हो गई हो, तो तुम इतनी बदल कैसे गईं? आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो तुमने माँ का नंबर तक ब्लॉक करने की सोच ली?" काव्या ने तड़पकर पूछा।

ईशा की तरफ से कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर एक कड़वाहट भरी हंसी सुनाई दी। "दीदी, सहेजना और भेदभाव करने में बहुत बारीक लकीर होती है। आपको शायद वह कभी दिखी ही नहीं क्योंकि आप हमेशा उस लकीर के सुरक्षित तरफ रही हैं। माँ ने हमेशा जताया कि वह हम दोनों से प्यार करती हैं, पर उनके फैसलों ने हमेशा कुछ और ही कहानी कही। जब माँ अपनी संतानों के बीच न्याय न कर सकें, तो रिश्तों की डोर अपने आप कमजोर हो जाती है।"

काव्या चौंक गई। उसे कभी महसूस नहीं हुआ था कि ईशा के मन में इतनी गहरी गाँठ बंधी है। उसने धीमे स्वर में पूछा, "ईशा, मैं सच में नहीं समझ पा रही हूँ कि तुम किस भेदभाव की बात कर रही हो। क्या पढ़ाई में, क्या कपड़ों में या क्या प्यार में माँ ने कभी तुम्हें कम समझा?"

"प्यार शब्दों में नहीं, दीदी, त्याग और सुरक्षा में दिखता है," ईशा अब फफक पड़ी थी। "आपको याद है वह पुश्तैनी ज़मीन का हिस्सा जो मामाजी ने वापस किया था? माँ ने वह चुपचाप आपके नाम कर दिया क्योंकि आपकी शादी एक बड़े घर में हो रही थी और उन्हें लगा कि आपकी 'इज्जत' बनी रहे। और मेरे समय? जब मुझे अपने स्टार्टअप के लिए थोड़े से फंड की ज़रूरत थी, तो माँ ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि लड़कियों को इतना जोखिम नहीं लेना चाहिए। क्या यह भेदभाव नहीं है कि एक बेटी का भविष्य संवारने के लिए वह अपनी सारी जमा-पूंजी लगा देती हैं और दूसरी को 'किस्मत' के भरोसे छोड़ देती हैं?"

काव्या निशब्द रह गई। उसे पता था कि ज़मीन उसके नाम हुई है, पर उसे लगा था कि ईशा को भी बराबर का कुछ मिला होगा। वह समझ गई कि माँ ने अपनी ममता में एक बेटी को सुरक्षित करने के चक्कर में दूसरी की स्वावलंबन की आकांक्षाओं को अनजाने में कुचल दिया था।

ईशा आगे बोलती रही, "सिर्फ यही नहीं दीदी, जब भी घर में कोई बड़ा फैसला होता है, माँ हमेशा आपकी राय लेती हैं। जैसे मेरा वजूद इस घर में सिर्फ एक 'छोटी बच्ची' का है जिसकी अपनी कोई समझ ही नहीं। मुझे माँ के फोन से दिक्कत नहीं है, मुझे उनकी उस मानसिकता से दिक्कत है जहाँ मैं हमेशा दूसरे पायदान पर खड़ी रहती हूँ।"

फोन कट गया। काव्या ने पीछे मुड़कर देखा, माँ वहीं चौखट के पास खड़ी सब सुन रही थीं। उनकी आँखों से बहते आँसू उनके पछतावे की गवाही दे रहे थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनका एक तरफा झुकाव छोटी बेटी के मन में इतना ज़हर भर देगा।

सुशीला देवी डगमगाते कदमों से काव्या के पास आईं और उसका हाथ थाम लिया। "काव्या, मैंने गलती कर दी। मुझे लगा ईशा तो समझदार है, वह संभाल लेगी। पर तू... तू नाजुक थी, इसलिए मैंने तुझे सहारा देना चाहा। मुझे नहीं पता था कि मेरा सहारा देना ईशा के लिए उपेक्षा बन जाएगा।"

काव्या ने माँ को गले लगा लिया। उसे समझ आ गया था कि घर की शांति केवल साथ रहने में नहीं, बल्कि हर सदस्य को बराबर का सम्मान और भागीदारी देने में होती है। उसने माँ से कहा, "माँ, अभी देर नहीं हुई है। ईशा को ज़मीन या पैसे नहीं चाहिए, उसे आपका वह विश्वास चाहिए जो आपने मुझ पर दिखाया है। उसे यह एहसास दिलाइए कि वह आपकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि आपकी ताकत है।"

अगले ही पल काव्या ने फिर से ईशा को वीडियो कॉल किया। इस बार माँ भी स्क्रीन के सामने थीं। सुशीला देवी ने कांपते हाथों से कैमरे की ओर देखते हुए कहा, "ईशा, मेरी बच्ची... मुझे माफ़ कर दे। मैंने अपनी ममता में तराज़ू गलत पकड़ लिया था। तू ज़मीन की बात करती है, यह घर, यह जीवन सब तेरा है। तू लौट आ, हम साथ बैठकर उस ज़मीन के कागज़ात फिर से बदलेंगे। मुझे मेरी बेटी चाहिए, उसका हिस्सा नहीं।"

ईशा ने जब माँ का वह बेबस और सच्चा चेहरा देखा, तो उसका सारा गुस्सा बर्फ की तरह पिघल गया। उसे अहसास हुआ कि माँ से नाराज़गी तो हो सकती है, पर उनसे नफरत करना नामुमकिन है।

"मैं आ रही हूँ माँ... पर ज़मीन के कागज़ात बदलने के लिए नहीं, बल्कि आपके हाथ की चाय पीने के लिए। मुझे आपका हिस्सा नहीं, आपका वह पुराना प्यार चाहिए जिसमें कोई शर्त न हो," ईशा ने मुस्कुराते हुए कहा।

आँगन में फिर से रौनक लौटने वाली थी। काव्या ने महसूस किया कि रिश्तों में आई दरारों को केवल सच और स्वीकारोक्ति के मरहम से भरा जा सकता है। उस शाम सूरज तो ढल गया था, पर घर के भीतर उम्मीद का एक नया दीया जल उठा था।


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