अपने-अपने हिस्से का सच

 "राघव बाबू, मेरी एक बात गांठ बांध लीजिए. आज मैं इस वर्कशॉप की देहरी लांघ रहा हूं, तो अब तब तक वापस नहीं लौटूंगा जब तक आप खुद चलकर मेरी चौखट पर नहीं आएंगे. और हां, ये अधूरी मूर्तियां, ये प्रोजेक्ट्स, जिनका दम आप भरते हैं, इन्हें मैं हाथ भी नहीं लगाऊंगा. अब इन्हें आप ही पूरा कीजिए."

माधव ने अपने झोले में छेनी और हथौड़ी डालते हुए बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा. उसकी आवाज़ में वो कंपन नहीं था जो अक्सर डर या दुख में होता है, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था जो किसी बड़े फैसले के बाद आता है.

"तो माधव, तुम भी किसी मुगालते में मत रहना," राघव अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर पीछे की ओर झुकते हुए, हाथ में थामे महंगे सिगार का धुआं उड़ाते हुए बोला. उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित व्यंग्य था. "मैं तुम्हें बुलाने आऊंगा? और वो भी तुम्हारी उस तंग बस्ती में? भूल जाओ. जाना है तो अभी निकल जाओ. और रही बात इन मूर्तियों की, तो ये 'राघव आर्ट स्टूडियो' की संपत्ति हैं. तुम क्या ले जाओगे इन्हें? ये मिट्टी, ये सांचे, ये डिज़ाइन... सब मेरा है. तुम सिर्फ एक कारीगर हो माधव, कलाकार नहीं. कलाकार मैं हूं, जिसके हस्ताक्षर के लिए दुनिया करोड़ों फेंकती है."

माधव ने एक बार मुड़कर उन आदमकद मूर्तियों को देखा जो हॉल में कतार से खड़ी थीं. गीली मिट्टी की सोंधी महक वहां की हवा में रची-बसी थी. पिछले पंद्रह सालों से माधव ने अपना पसीना इस मिट्टी में मिलाया था. राघव दुनिया के लिए एक बड़ा मूर्तिकार था, लेकिन स्टूडियो की चारदीवारी के भीतर का सच सिर्फ ये बेजान मूर्तियां जानती थीं. राघव तो बस ऑर्डर्स लाता था, मीडिया में इंटरव्यू देता था और फिनिशिंग टच के नाम पर नीचे अपना नाम खोद देता था. असल में मिट्टी गूंधने से लेकर उसे रूप देने तक का सारा काम माधव का था.

"आप सही कह रहे हैं राघव बाबू," माधव ने फीकी मुस्कान के साथ कहा. "मैं तो बस एक मजदूर हूं. लेकिन याद रखिएगा, जब नींव का पत्थर खिसक जाता है, तो कंगूरे का अहंकार भी उसे गिरने से नहीं बचा पाता."

"दफा हो जाओ! चार दिन में जब रोटी के लाले पड़ेंगे, तो नाक रगड़ते हुए वापस आओगे. तब मैं सोचूंगा कि तुम्हें दोबारा रखना है या नहीं," राघव ने चिल्लाकर कहा.

माधव बिना कुछ बोले बाहर निकल गया. बाहर शहर का शोर था, लेकिन उसके भीतर एक गहरा सन्नाटा छा गया था. उसने पीछे मुड़कर उस आलीशान स्टूडियो को नहीं देखा, जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था.

माधव के जाने के बाद राघव ने एक गहरी सांस ली और व्हिस्की का ग्लास भर लिया. उसे लगा कि यह रोज की चिकचिक खत्म हुई, अच्छा ही हुआ. "सस्ता मजदूर था, सिर पर चढ़ गया था," उसने खुद को तसल्ली दी. "बाज़ार में बहुत कारीगर मिल जाएंगे."

अगले दिन से राघव ने नए कारीगरों की भर्ती शुरू कर दी. शहर के बड़े-बड़े आर्ट कॉलेजों से लड़के आए. राघव ने उन्हें काम समझाया. प्रोजेक्ट बड़ा था—नगर निगम के लिए 'शहीद स्मारक' की पांच विशाल प्रतिमाएं तैयार करनी थीं. डेडलाइन में सिर्फ दो महीने बचे थे.

नए लड़कों ने काम शुरू किया. राघव उन्हें निर्देश देता—"नाक थोड़ी और तीखी करो," "आंखों में वो भाव नहीं आ रहा," "मांसपेशियों का उभार सही नहीं है."

लड़के मेहनत करते, लेकिन परिणाम वो नहीं आता जो माधव के हाथों से निकलता था. माधव को निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वो मिट्टी को छूता था तो मिट्टी उसे बताती थी कि उसे किस रूप में ढलना है. इन नए लड़कों के काम में तकनीक तो थी, पर 'रूह' गायब थी.

एक हफ्ता बीता, फिर दूसरा. राघव का धैर्य जवाब देने लगा. एक दिन उसने गुस्से में एक लड़के द्वारा बनाई गई मूर्ति का चेहरा बिगाड़ दिया. "ये कचरा बना रहे हो तुम लोग? इसमें दर्द कहां है? इसमें वो त्याग कहां है जो एक शहीद की आंखों में दिखना चाहिए? ये तो किसी पुतले जैसा लग रहा है!"

लड़के डर गए. धीरे-धीरे काम की रफ्तार धीमी पड़ने लगी. जो मूर्तियां माधव ने आधी छोड़ी थीं, उन्हें पूरा करने में किसी के हाथ नहीं चल रहे थे. माधव का काम इतना बारीक था कि उस स्तर को मैच करना किसी साधारण कलाकार के बस की बात नहीं थी. राघव ने खुद कोशिश की. उसने सालों बाद मिट्टी हाथ में ली. लेकिन जैसे ही उसने छेनी चलाई, मूर्ति के गाल पर एक दरार आ गई. राघव के हाथ कांपने लगे. उसे अहसास हुआ कि पिछले दस सालों में उसने सिर्फ 'बिजनेस' किया है, 'आर्ट' तो माधव के हाथों में सुरक्षित थी, जो अब जा चुका था.

उधर, शहर से चालीस किलोमीटर दूर, अपने गांव के कच्चे मकान में माधव अपनी पुरानी चाक (Potter's wheel) को ठीक कर रहा था. उसकी पत्नी, सुमित्रा, ने उसे चिंता से देखा.

"अब क्या होगा जी? शहर से तो आप खाली हाथ चले आए. बच्चों की स्कूल की फीस, घर का खर्च..."

माधव ने चाक घुमाते हुए गीली मिट्टी का एक लोदा उस पर रखा. "चिंता मत करो सुमित्रा. कला कभी भूखी नहीं मरती. राघव बाबू को लगता था कि वो मुझे पाल रहे हैं, पर सच तो ये है कि मेरी कला उन्हें पाल रही थी."

माधव ने कुल्हड़ और दीये बनाना शुरू किया. उसने कोई बड़ी मूर्ति नहीं बनाई. उसने मिट्टी के छोटे-छोटे खिलौने, सजावटी गमले और सुराही बनाना शुरू किया. लेकिन उन साधारण चीजों में भी एक असाधारण बात थी. उसकी बनाई सुराही की गर्दन इतनी नफासत से मुड़ी होती थी कि देखने वाला देखता रह जाए. उसके बनाए खिलौनों में बच्चों की मासूमियत जीवंत हो उठती थी.

गांव के हाट में जब माधव अपना सामान लेकर बैठा, तो पहले ही दिन सब बिक गया. लोग उसकी कला की बारीकी देखकर दंग थे. धीरे-धीरे आसपास के गांवों में उसकी चर्चा होने लगी. शहर के कुछ कला प्रेमी, जो असली हस्तशिल्प की कद्र करते थे, माधव के घर तक पहुंचने लगे.

एक महीना बीत गया. राघव आर्ट स्टूडियो में हड़कंप मचा हुआ था. 'शहीद स्मारक' के प्रोजेक्ट की डेडलाइन सिर पर थी और मूर्तियां अभी तक ढांचे से आगे नहीं बढ़ पाई थीं. क्लाइंट्स का दबाव बढ़ रहा था. निगम के अधिकारी दो बार विजिट कर चुके थे और काम की धीमी रफ्तार देखकर राघव को अल्टीमेटम दे चुके थे—"अगर अगले पंद्रह दिनों में काम पूरा नहीं हुआ, तो कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल और हर्जाना अलग से."

राघव की रातों की नींद उड़ गई. उसका अहंकार अब डर में बदल रहा था. उसने शहर के सबसे महंगे शिल्पकारों को मुंहमांगी कीमत पर बुलाया, लेकिन माधव जैसा हाथ किसी का नहीं था. माधव के काम में एक निरंतरता (flow) थी, जिसे बीच से पकड़ना किसी और के लिए संभव नहीं था. वो अधूरी मूर्तियां मानो राघव को मुंह चिढ़ा रही थीं. वे कह रही थीं—"हम अनाथ हैं, हमारा पिता हमें छोड़कर चला गया और तुम सिर्फ हमारे सौतेले मालिक हो."

एक शाम, राघव अपने ऑफिस में हताश बैठा था. तभी उसका मैनेजर, सुरेश, दबे पांव अंदर आया.

"सर, वो... निगम के कमिश्नर साहब का फोन आया था. वो कह रहे थे कि परसों वो फाइनल इंस्पेक्शन के लिए आ रहे हैं."

राघव ने सिर पकड़ लिया. "सुरेश, मुझे माधव चाहिए. किसी भी कीमत पर."

"लेकिन सर, आपने तो उसे..."

"मुझे पता है मैंने क्या कहा था!" राघव चिल्लाया. "लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं है. गाड़ी निकालो."

राघव की आलीशान मर्सिडीज जब माधव के गांव की ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हिचकोले खाती हुई पहुंची, तो पूरा गांव इकट्ठा हो गया. माधव अपने घर के आंगन में बैठा एक बड़े मिट्टी के घड़े पर नक्काशी कर रहा था. उसके हाथ सधे हुए थे और चेहरे पर एक परम शांति थी.

राघव गाड़ी से उतरा. उसके जूते धूल से सन गए. माधव ने उसे देखा, लेकिन हाथ नहीं रोका. वह अपने काम में मग्न रहा.

"माधव," राघव ने आंगन के गेट से आवाज़ दी. उसकी आवाज़ में वो पुरानी हेकड़ी नहीं थी, बल्कि एक मजबूरी थी.

माधव ने धीरे से सिर उठाया. "आइए राघव बाबू. पानी पिएंगे? घड़े का पानी है, फ्रिज से ज्यादा ठंडा होता है."

राघव अंदर आया और एक टूटी हुई खाट पर बैठ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि बात कैसे शुरू करे. जिस माधव को उसने 'दफा हो जाओ' कहा था, आज उसी के सामने वह याचक बनकर बैठा था.

"माधव, वापस चलो," राघव ने सीधे मुद्दे की बात की. "मैं तुम्हारी तनख्वाह दोगुनी... नहीं, तीन गुनी कर दूंगा. पिछला सारा हिसाब भी चुकता कर दूंगा. बस चलो."

माधव ने नक्काशी पूरी की और छेनी नीचे रखी. उसने गमछे से हाथ पोंछे और राघव की आंखों में देखा.

"पैसों की बात तो है ही नहीं राघव बाबू. बात सम्मान की थी. आपने कहा था कि मैं सिर्फ एक मजदूर हूं. मजदूर को आप पैसे से खरीद सकते हैं, लेकिन एक कलाकार को नहीं."

"गलती हो गई मुझसे," राघव ने कहा, हालांकि यह शब्द उसके गले में कांटे की तरह चुभा. "मैं गुस्से में था. प्रोजेक्ट फंस गया है माधव. मेरी साख मिट्टी में मिल जाएगी. उन मूर्तियों को सिर्फ तुम ही पूरा कर सकते हो. वो तुम्हारे... तुम्हारे बच्चों जैसी हैं, है ना?"

माधव हंसा. एक सूखी, विरक्त हंसी.

"नहीं साहब. वो बच्चे मेरे नहीं थे. वो 'राघव आर्ट स्टूडियो' के प्रोडक्ट थे. मेरे बच्चे तो ये हैं..." उसने अपने आंगन में रखे दीयों और खिलौनों की ओर इशारा किया. "ये भले ही छोटे हैं, सस्ते हैं, लेकिन इन पर मेरा नाम है. इन्हें बनाते वक्त मुझे कोई ये नहीं कहता कि 'तुम कुछ नहीं हो'. यहां मैं राजा हूं, और ये मिट्टी मेरी प्रजा."

"तो तुम नहीं जाओगे?" राघव की आवाज में हताशा थी. "तुम चाहते हो मैं बर्बाद हो जाऊं?"

"मैं किसी का बुरा नहीं चाहता साहब. लेकिन मैं उस पिंजरे में वापस नहीं जाऊंगा जहां मेरी कला का दम घुटता हो. वहां मैं मशीन बन गया था. यहां मैं इंसान हूं."

राघव ने अपना आखिरी पत्ता फेंका. उसने जेब से चेकबुक निकाली और एक खाली चेक पर साइन करके माधव के सामने रख दिया. "अमाउंट तुम भर लो. बस अगले 15 दिन के लिए आ जाओ. उसके बाद जो मर्जी आए करना."

माधव ने उस चेक को देखा. इतनी रकम कि उसकी गरीबी हमेशा के लिए मिट सकती थी. सुमित्रा भी रसोई की ओट से यह सब देख रही थी. माधव ने चेक उठाया. राघव के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आने ही वाली थी कि माधव ने उस चेक को मोड़कर वापस राघव की जेब में रख दिया.

"साहब, अगर आज मैं पैसे के लिए वापस आ गया, तो मेरी कला हमेशा के लिए मर जाएगी. और रही बात उन अधूरी मूर्तियों की... तो एक सलाह देता हूं. उन्हें तोड़ दीजिए. और खुद अपने हाथों से, अपनी रूह से नई मूर्तियां बनाइए. शायद तब आपको समझ आए कि मिट्टी में जान फूंकने के लिए अहंकार का त्याग कितना जरूरी होता है."

राघव सन्न रह गया. उसे उम्मीद थी कि गरीबी माधव को तोड़ देगी, लेकिन यहां तो माधव के स्वाभिमान ने राघव के अहंकार को चकनाचूर कर दिया था.

राघव चुपचाप उठा और गाड़ी की ओर बढ़ गया. जब वह जा रहा था, तो उसने देखा कि माधव ने दोबारा अपनी छेनी उठा ली है और मिट्टी के साथ एकलय हो गया है. उस कच्चे घर में, उस साधारण से आंगन में, राघव को वो 'दिव्यता' दिखाई दी जो उसके करोड़ों के एयर-कंडीशंड स्टूडियो में गायब थी.

वापस लौटते वक्त राघव की गाड़ी में सन्नाटा था. उसने ड्राइवर से कहा, "गाड़ी रोको."

उसने गाड़ी से उतरकर सड़क के किनारे एक खेत से थोड़ी गीली मिट्टी उठाई. उसने उसे मुट्ठी में भींचा. मिट्टी ठंडी थी, मुलायम थी. उसे याद आया कि आखिरी बार उसने ऐसे मिट्टी को कब महसूस किया था—शायद पंद्रह साल पहले, जब उसने स्टूडियो शुरू नहीं किया था, जब वह भी माधव जैसा ही एक जुनून लेकर शहर आया था.

राघव की आंखों से आंसू गिरकर उस मिट्टी पर पड़े.

अगले दिन राघव ने कमिश्नर को फोन किया और कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल कर दिया. उसने भारी हर्जाना भरा, अपनी साख खो दी, लेकिन एक अजीब सा बोझ उसके सीने से उतर गया.

उसने स्टूडियो का नाम बदल दिया. अब वहां बड़े बोर्ड पर 'राघव आर्ट्स' नहीं लिखा था. उसने स्टूडियो के दरवाजे बंद किए, सारे असिस्टेंट्स को छुट्टी दी, और खुद, अकेले, उस हॉल के बीचोबीच बैठ गया जहां अधूरी मूर्तियां खड़ी थीं. उसने माधव की बनाई मूर्तियों को नहीं छुआ. उसने एक नया, बेडौल मिट्टी का ढेर अपने सामने रखा और अपनी टाई खोलकर फेंक दी.

उसे पता था कि रास्ता मुश्किल होगा. उसे पता था कि उसकी उंगलियां अब वैसी नहीं चलतीं. लेकिन उसे यह भी पता था कि माधव ने उसे जो सबक सिखाया है, वह किसी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता.

उधर गांव में, माधव ने एक बहुत सुंदर, छोटी सी मूर्ति बनाई थी—एक गुरु और शिष्य की. उसने उसे अपने घर के सबसे ऊंचे ताक पर रखा. उसे पता था कि राघव वापस नहीं आएगा, और न ही माधव कभी जाएगा. लेकिन दोनों के बीच मिट्टी का एक अदृश्य धागा अब भी जुड़ा था—फर्क सिर्फ इतना था कि अब दोनों अपने-अपने हिस्से का सच जी रहे थे.

शाम हो गई थी. माधव के आंगन में बनाए गए दीये जल उठे थे. उनका प्रकाश भले ही कम था, लेकिन वह उसका अपना था, उधार का नहीं. और उस मद्धम रोशनी में माधव का चेहरा किसी तपस्वी की तरह चमक रहा था, जिसने सब कुछ खोकर, सब कुछ पा लिया था.


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