“पापा, माँ… मुझे आप लोगों से कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है।”
रमन ने ड्राइंग रूम के दरवाजे पर खड़े होकर, अपनी उंगलियों को आपस में उलझाते हुए कहा। उसके माथे पर पसीने की महीन बूंदें थीं, जो एसी की ठंडक में भी सूख नहीं रही थीं।
सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ रहे दीनानाथ जी ने चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसकाया और बेटे की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। पास ही बैठी सुमित्रा जी, जो मटर छील रही थीं, उन्होंने भी हाथ रोक लिया।
“क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है? ऑफिस में कोई परेशानी?” सुमित्रा जी ने चिंतित स्वर में पूछा।
“नहीं माँ, ऑफिस की बात नहीं है। बात… मेरी ज़िंदगी की है,” रमन ने गहरी सांस ली और अंदर आकर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। “मैं किसी को पसंद करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ।”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी ने अखबार तह करके मेज पर रख दिया। उनके चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान उभरी।
“तो इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है? यह तो खुशी की खबर है। कौन है लड़की? तुम्हारे साथ काम करती है?”
“जी नहीं, वह मेरे ऑफिस में नहीं है। उसका नाम काव्या है। वह… वह एक शास्त्रीय गायिका है और बच्चों को संगीत सिखाती है,” रमन ने रुक-रुक कर कहा।
“संगीत सिखाती है? अच्छा है, कला से जुड़ी है। तो फिर समस्या क्या है? क्या वह किसी दूसरी जाति की है?” दीनानाथ जी ने सीधा सवाल किया। उनका परिवार पुराने ख्यालों का न सही, पर सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर थोड़ा सचेत ज़रूर था।
रमन ने नज़रें झुका लीं। “पापा, जाति की बात नहीं है। काव्या… काव्या देख नहीं सकती। वह दृष्टिहीन (blind) है।”
इस बार सन्नाटा भारी और असहज था। सुमित्रा जी के हाथ से मटर की फली छूटकर फर्श पर गिर गई। दीनानाथ जी का चेहरा सख्त हो गया।
“तुम होश में तो हो रमन?” दीनानाथ जी की आवाज़ में कड़वाहट घुल गई। “तुम एक ऐसी लड़की से शादी करना चाहते हो जो अपनी ज़िंदगी के लिए दूसरों पर निर्भर है? तुम क्या सारी उम्र उसके सहारे बनकर जीना चाहते हो? शादी का मतलब बराबरी का साथ होता है, सेवा-टहल नहीं।”
“पापा, आप उसे नहीं जानते। वह किसी पर निर्भर नहीं है। वह अपना सारा काम खुद करती है, वह कुकिंग करती है, वह नौकरी करती है, वह अकेली रहती है। उसकी आँखों में रोशनी नहीं है, पर उसका नज़रिया हम सबसे बहुत साफ है,” रमन ने बचाव में दलील दी, पर उसकी आवाज़ माता-पिता के अविश्वास के सामने कमजोर पड़ रही थी।
सुमित्रा जी ने माथा पीट लिया। “बेटा, अभी तो तुझे लग रहा है कि यह प्रेम है, त्याग है। लेकिन चार दिन बाद जब घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ आएँगी, तब क्या होगा? एक नेत्रहीन बहू इस घर को कैसे संभालेगी? लोग क्या कहेंगे कि दीनानाथ जी को अपने इकलौते इंजीनियर बेटे के लिए कोई ढंग की लड़की नहीं मिली?”
“माँ, मुझे लोगों की परवाह नहीं है। मुझे काव्या चाहिए। आप एक बार मिल लीजिए। सिर्फ एक बार। अगर मिलने के बाद आपको लगे कि वह इस घर के लायक नहीं है, तो मैं दोबारा उसका नाम नहीं लूंगा,” रमन ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा।
काफी बहस और रमन की जिद के आगे आखिरकार माता-पिता को झुकना पड़ा। पर उनकी सहमति में खुशी नहीं, बल्कि एक औपचारिकता थी। उन्होंने तय किया कि वे कल ही जाकर उस लड़की से मिलेंगे और उसे समझा देंगे कि यह रिश्ता संभव नहीं है।
अगले दिन रमन, दीनानाथ जी, सुमित्रा जी और रमन की बड़ी बहन शिखा, काव्या के घर के लिए निकले। शिखा रास्ते भर माँ को समझाती रही कि शायद रमन भावुकता में फैसला ले रहा है, उसे वहां जाकर मना कर देंगे।
शहर के शोर-शराबे से दूर, एक शांत कॉलोनी में काव्या का छोटा सा घर था। घर के बाहर गेंदे और मोगरे के पौधे करीने से लगे थे। जैसे ही रमन ने घंटी बजाई, भीतर से एक मधुर आवाज़ आई, “दरवाजा खुला है, आ जाइए।”
वे अंदर दाखिल हुए। घर की सजावट बेहद सादी लेकिन कलात्मक थी। हर चीज़ अपनी जगह पर सलीके से रखी हुई थी। कहीं कोई बिखराव नहीं। दीनानाथ जी ने चारों ओर नज़र दौड़ाई, कहीं से नहीं लग रहा था कि इस घर में कोई ऐसा व्यक्ति रहता है जिसे दिखाई नहीं देता।
तभी अंदर के कमरे से एक युवती बाहर आई। हल्का बादामी रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें जो स्थिर थीं, और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान। उसने नीले रंग का कुरता पहना हुआ था। वह बहुत सधे हुए कदमों से चलकर सोफे के पास आई और बिना किसी चीज से टकराए सही जगह पर रुक गई।
“नमस्ते, मैं काव्या हूँ। रमन ने बताया था कि आप लोग आने वाले हैं,” उसने हाथ जोड़कर अभिवादन किया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।
सुमित्रा जी उसे देखती रह गईं। देखने में वह किसी अप्सरा से कम नहीं थी, बस उन आँखों में पुतलियों की हरकत नहीं थी।
“नमस्ते बेटा,” दीनानाथ जी ने रूखे स्वर में कहा।
काव्या ने उनकी आवाज़ की दिशा का अनुमान लगाकर चेहरा उस तरफ किया। “आप लोग बैठिए न। रमन, तुम पापा-माँ को सोफे पर बिठाओ, मैं चाय लेकर आती हूँ।”
“तुम? तुम चाय बनाओगी?” शिखा ने आश्चर्य से पूछा।
“जी दीदी, मैं अकेली रहती हूँ, तो अपनी चाय तो खुद ही बनानी पड़ती है। आप लोगों को अदरक वाली पसंद है या इलायची वाली?” काव्या ने मुस्कुराते हुए पूछा।
“रहने दो बेटा, हम बस तुमसे बात करने आए हैं,” सुमित्रा जी ने कहा, उन्हें डर था कि कहीं गर्म चाय उसके ऊपर न गिर जाए।
“माँ जी, आप मेहमान हैं। बिना कुछ लिए कैसे जा सकते हैं? बस पाँच मिनट,” कहकर काव्या रसोई में चली गई। रमन उसके पीछे जाने लगा तो काव्या ने उसे रोक दिया, “रमन, तुम बैठो। मेहमानों के पास रहो।”
ड्राइंग रूम में बैठे चारों लोग रसोई से आती आवाजों को सुन रहे थे। बर्तनों की खनक, गैस जलने की आवाज़, अदरक कूटने की आवाज़—सब कुछ इतना नपा-तुला था जैसे किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जा रहा हो। दस मिनट बाद काव्या एक ट्रे लेकर आई जिसमें चाय के कप और नाश्ता रखा था। उसने बड़ी सावधानी से मेज पर ट्रे रखी और एक-एक करके सबको प्याला पकड़ाया।
चाय पीते हुए दीनानाथ जी ने कड़े सवाल पूछने शुरू किए।
“बेटा, बुरा मत मानना, पर तुम अपनी ज़िंदगी कैसे गुज़ारती हो? मतलब, घर का काम, बाहर जाना, यह सब…?”
काव्या सोफे के किनारे पर बैठी थी। उसने शालीनता से जवाब दिया, “अंकल, ईश्वर जब एक दरवाजा बंद करता है, तो कई खिड़कियां खोल देता है। मेरी आँखें नहीं हैं, पर मेरे कान, मेरी नाक और मेरा स्पर्श मेरी ताकत हैं। मैं बच्चों को संगीत सिखाती हूँ, उससे मेरा खर्चा निकल जाता है। मैं ब्रेल लिपि में पढ़ती हूँ। और रही बात काम की, तो आदत हो गई है। मुझे किसी पर बोझ बनना पसंद नहीं।”
“लेकिन शादी? शादी एक बड़ी जिम्मेदारी है काव्या,” सुमित्रा जी बोलीं। “रमन एक बड़े पद पर है। उसके साथ पार्टियों में जाना होगा, लोगों से मिलना होगा। क्या तुम उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाओगी? क्या तुम एक पत्नी और माँ की जिम्मेदारी निभा पाओगी?”
काव्या के चेहरे पर एक पल के लिए उदासी की छाया पड़ी, लेकिन फिर उसने सिर उठाया। “आंटी जी, कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए आँखों की नहीं, भरोसे की ज़रूरत होती है। मैं दुनिया को वैसे नहीं देख सकती जैसे आप देखते हैं, लेकिन मैं रिश्तों को महसूस कर सकती हूँ। मैं रमन के लिए वह सब कुछ बन सकती हूँ जिसकी उसे ज़रूरत है, सिवाय एक आईने के।”
माहौल गंभीर हो गया था। रमन की आँखों में उम्मीद थी, लेकिन माता-पिता के चेहरे अभी भी सख्त थे। तभी अचानक मौसम बदला। बाहर तेज आंधी चलने लगी और आसमान में काले बादल घिर आए। देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। खिड़कियां खड़खड़ाने लगीं।
अचानक, एक ज़ोरदार कड़कड़ाहट के साथ बिजली गुल हो गई। दिन में भी इतना अंधेरा हो गया क्योंकि बाहर घने बादल थे और काव्या के घर के पर्दे मोटे थे। अनजान घर में अचानक हुए इस अंधेरे से सुमित्रा जी घबरा गईं।
“अरे! यह क्या हुआ? रमन? कहाँ हो तुम? मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा!” सुमित्रा जी की आवाज़ में घबराहट थी।
दीनानाथ जी भी हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगे, “रमन, मोबाइल की टॉर्च जलाओ। हमें यहाँ से निकलना चाहिए।”
शिखा भी डर गई थी, “मेरा फोन पर्स में है और पर्स पता नहीं कहाँ रखा है।”
उस घने अंधेरे और अफरातफरी में केवल एक व्यक्ति शांत था—काव्या।
“आंटी जी, आप घबराइए मत। अपनी जगह पर बैठी रहिए, वरना किसी फर्नीचर से चोट लग जाएगी,” काव्या की स्थिर आवाज़ गूंजी।
अंधेरे में रमन भी अपना फोन ढूंढ रहा था जो कहीं सोफे के पीछे गिर गया था। तभी उन्होंने महसूस किया कि कोई बहुत सधे कदमों से चल रहा है। काव्या बिना किसी सहारे के, बिना किसी से टकराए, कमरे के दूसरे कोने तक गई। उसने दराज खोली, माचिस निकाली और मोमबत्ती जलाई।
मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में सबका चेहरा दिखाई दिया। काव्या मोमबत्ती हाथ में लिए खड़ी थी। उसके चेहरे पर वही सौम्य भाव था। वह धीरे-धीरे चलकर सुमित्रा जी के पास आई और मोमबत्ती मेज पर रख दी।
“माफ़ कीजिएगा, यहाँ इन्वर्टर नहीं है। पर मोमबत्ती काफी देर तक चलेगी,” उसने पानी का गिलास सुमित्रा जी की ओर बढ़ाया। “आंटी, पानी पी लीजिए, आप घबरा गई थीं।”
दीनानाथ जी, सुमित्रा जी और शिखा—तीनों सन्न रह गए। जिस अंधेरे ने उन्हें—जो आँखों वाले थे—पूरी तरह अपाहिज और असहाय बना दिया था, उसी अंधेरे में काव्या महारानी की तरह चल रही थी। उस चंद मिनटों के अंधेरे ने उन्हें बता दिया था कि असली दृष्टिहीनता आँखों में नहीं, बल्कि परिस्थितियों से डरने में होती है।
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। काव्या ने कहा, “लगता है बारिश देर तक होगी। मैं आप लोगों के लिए पकौड़े बना देती हूँ। बारिश में अच्छे लगेंगे।”
वह फिर से अंधेरे रसोईघर की ओर बढ़ गई। सुमित्रा जी ने उसे जाते हुए देखा।
“रुक जाओ काव्या,” सुमित्रा जी की आवाज़ आई।
काव्या रुक गई और मुड़ी।
सुमित्रा जी उठीं और काव्या के पास गईं। उन्होंने काव्या के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “तुम्हें रसोई में अकेले जाने की ज़रूरत नहीं है। मैं चलूँगी तुम्हारे साथ। और रमन…”
उन्होंने मुड़कर रमन और दीनानाथ जी को देखा। दीनानाथ जी की आँखों में जो सख्ती थी, वह अब पिघलकर सम्मान में बदल चुकी थी।
“रमन सही कह रहा था,” सुमित्रा जी ने काव्या के गाल पर हाथ फेरा। “तुम्हारे पास वो नज़र है जो हमारे पास नहीं है। हमने सिर्फ तुम्हारी कमी देखी, पर तुमने हमें अपनी ताकत दिखाई। जब हम अपनी ही आँखों के होते हुए अंधेरे से डर गए, तब तुमने हमारा मार्गदर्शन किया।”
दीनानाथ जी भी पास आए। उन्होंने रमन के कंधे पर हाथ रखा। “बेटा, मुझे माफ़ करना। मैं अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के चश्मे से देख रहा था। काव्या इस घर के लिए कम नहीं, बल्कि बहुत ज़्यादा है। यह घर को रोशन कर देगी।”
काव्या की आँखों से एक आंसू लुढ़क कर गाल पर आ गिरा। उसने झुककर दीनानाथ जी और सुमित्रा जी के पैर छुए।
बारिश बाहर अब भी बरस रही थी, लेकिन घर के अंदर का मौसम बदल चुका था। उस छोटी सी मोमबत्ती की रोशनी में एक नए रिश्ते की शुरुआत हो रही थी, जहाँ अब कोई शर्त नहीं थी, कोई शिकायत नहीं थी—सिर्फ स्वीकार्यता थी।
रमन ने काव्या की ओर देखा और मुस्कुराया। काव्या ने उसे नहीं देखा, पर वह जानती थी कि रमन मुस्कुरा रहा है। क्योंकि कुछ चीजें देखने के लिए आँखों की ज़रूरत नहीं होती, दिल की धड़कन ही काफी होती है।
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