शुरुआत एक नए रिश्ते की

 टैक्सी की खिड़की से बाहर दौड़ते हुए पेड़-पौधों को देखते हुए मीरा के हाथ ठंडे पड़ रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, बिल्कुल वैसी ही उथल-पुथल उसके मन के भीतर भी मची थी। उसने अपनी गीली हथेलियों को साड़ी के पल्लू से पोंछा और एक नज़र अपने बगल में बैठे राघव पर डाली। राघव की आँखें बंद थीं, शायद वह थकान मिटाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके माथे पर पड़ी लकीरें बता रही थीं कि चिंता उसे भी कम नहीं थी।

“राघव...” मीरा की आवाज़ बमुश्किल गले से बाहर आई।

राघव ने आँखें खोलीं और मीरा का ठंडा हाथ अपने हाथ में ले लिया। “क्या हुआ मीरा? तुम काँप रही हो।”

“मुझे बहुत अजीब लग रहा है। हम शहर से इतना दूर आ गए हैं। तुम्हारे वो ऊँचे रसूख वाले खानदान की कहानियाँ जो मैंने सुनी हैं, वे मुझे डरा रही हैं। मैं एक साधारण स्कूल मास्टर की बेटी और तुम ‘रघुवंशी सदन’ के इकलौते वारिस। क्या यह बेमेल संगम तुम्हारे घर की देहरी लांघ पाएगा? मुझे डर है कि कहीं मेरे कारण तुम्हें अपने परिवार से दूर न होना पड़े।”

राघव ने गहरी साँस ली और मीरा की आँखों में झाँका। “मीरा, रिश्ते हैसियत से नहीं, दिल से बनते हैं। और रही बात मेरे परिवार की, तो अम्मा थोड़ी सख्त जरूर हैं, पुरानी रीतियों को मानती हैं, लेकिन वे पत्थर नहीं हैं। बाबूजी तो वैसे भी मेरी खुशी में ही अपनी खुशी देखते हैं। तुम देखना, तुम्हारा यह सरल स्वभाव ही उनकी नफरत को पिघला देगा। मैंने तुमसे शादी किसी जिद में नहीं, बल्कि तुम्हारे व्यक्तित्व से प्रभावित होकर की है। तुम वह हो जो मुझे पूरा करती हो।”

गाड़ी एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुक गई। गेट के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—'रघुवंशी सदन'। बिजली कड़की और उस रोशनी में वह पुरानी हवेली किसी किले जैसी डरावनी लग रही थी। मीरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

जैसे ही वे दोनों गाड़ी से उतरे और बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़े, सामने का भारी भरकम लकड़ी का दरवाज़ा खुला। वहां कोई नौकर नहीं, बल्कि स्वयं राघव की माँ, सुमित्रा देवी खड़ी थीं। उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। पीछे राघव की छोटी बहन, तान्या और पिता, हरिशंकर जी खड़े थे।

राघव आगे बढ़ा, “अम्मा, हम आ गए। यह मीरा है...”

“रुक जाओ वहीं!” सुमित्रा देवी की आवाज़ में इतनी कड़क थी कि हवा का शोर भी थम गया। “इस लड़की को लेकर तुम इस घर में कदम नहीं रख सकते राघव। मैंने पहले ही फोन पर कह दिया था कि अगर अपनी मर्जी चलानी है, तो मेरे मरे मुँह पर आना। यह लड़की, जिसका न कोई कुल है, न गोत्र, न हमारे बराबर की हैसियत, यह रघुवंशी सदन की बहू बनेगी? यह कभी नहीं हो सकता।”

मीरा की आँखों में आँसू तैरने लगे। वह अपमान के घूंट पीकर भी चुप रही। उसे अपने पिता के संस्कार याद आ गए—बड़ों का जवाब देना अपमान माना जाता है।

राघव ने संयम बनाए रखा, “अम्मा, मीरा अब मेरी पत्नी है। हमने मंदिर में पूरे विधि-विधान से शादी की है। इसका अपमान मेरा अपमान है। अगर आप इसे नहीं अपना सकतीं, तो मुझे भी यह घर छोड़ना होगा।”

तभी पीछे से हरिशंकर जी आगे आए। उन्होंने अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखा। “सुमित्रा, तमाशा मत करो। बाहर गाड़ी खड़ी है, ड्राइवर देख रहा है। पड़ोसियों के कान खड़े हो गए होंगे। जो होना था, वह हो चुका है। अब अगर बेटे को घर से निकाला, तो समाज में जो थू-थू होगी, उसे तुम बर्दाश्त नहीं कर पाओगी। फिलहाल इन्हें अंदर आने दो।”

सुमित्रा देवी ने अपने पति को घूरकर देखा, फिर घृणा से मुँह फेरते हुए बोलीं, “ठीक है, अगर आपकी यही मर्जी है। लेकिन याद रखना राघव, मैंने इसे बहू नहीं माना है। यह इस घर में रह सकती है, पर मेरे दिल में इसके लिए कोई जगह नहीं है।”

वे पैर पटकती हुई अंदर चली गईं। कोई गृह-प्रवेश नहीं हुआ, कोई आरती नहीं उतरी। मीरा ने जब दहलीज पार की, तो उसे लगा जैसे वह कांटों पर चल रही हो।

रघुवंशी सदन जितना बाहर से भव्य था, अंदर से उतना ही ठंडा और खामोश। मीरा को मेहमानों वाले कमरे में जगह दी गई, जो राघव के कमरे से अलग था। यह सुमित्रा देवी का पहला फरमान था—जब तक वे नहीं मानतीं, यह रिश्ता उनके लिए अधूरा है।

दिन बीतने लगे। मीरा ने खुद को उस माहौल में ढालने की पूरी कोशिश की। वह सुबह पांच बजे उठ जाती, नहा-धोकर पूजा की तैयारी करती। रसोइये को हटाकर खुद सबके लिए नाश्ता बनाती। लेकिन डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा पसरा रहता।

सुमित्रा देवी खाने की थाली को एक ओर सरका देतीं और ताना मारतीं, “राजू! यह कैसा फीका खाना बनाया है? लगता है बनाने वाले को मसालों की परख नहीं है। गरीबों के घर में तो बस पेट भरने के लिए उबाला जाता है, स्वाद का उन्हें क्या पता?”

मीरा रसोई में खड़ी सब सुनती, पर उफ तक न करती। राघव कई बार विरोध करना चाहता, पर मीरा उसे आँखों से रोक देती। उसे लगता था कि बहस करने से दूरियाँ और बढ़ेंगी।

तान्या, जो अभी कॉलेज में थी, वह भी अपनी माँ की ही भाषा बोलती। एक दिन मीरा ने तान्या की बिखरी हुई किताबों को समेट कर रैक में रखा। तान्या ने कमरे में आते ही हंगामा खड़ा कर दिया।

“भाभी! आपने मेरी चीज़ों को हाथ कैसे लगाया? आप समझती क्या हैं? यह घर आपका वो छोटा सा स्कूल नहीं है जहाँ आप कुछ भी इधर-उधर कर दें। मेरी किताबों का एक सिस्टम है, जो शायद आपकी समझ से बाहर है।”

मीरा ने धीमे स्वर में कहा, “माफ़ करना तान्या, मुझे लगा बिखर गई हैं तो...”

“आपको लगने या न लगने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी हद में रहिए,” तान्या ने दरवाज़ा उसके मुँह पर बंद कर दिया।

मीरा की यह चुप्पी, उसका यह धैर्य, ससुराल वालों को उसकी कमजोरी लगने लगा था। सुमित्रा देवी को लगने लगा था कि यह लड़की दब्बू है, इसमें स्वाभिमान नाम की चीज़ नहीं है, इसलिए वे और ज्यादा कठोर होती गईं। वे जानबूझकर उसे ऐसे काम सौंपतीं जो घर के नौकर करते थे—बगीचे की सफाई, पुराने बर्तनों की घिसाई। मीरा सब करती रही, इस उम्मीद में कि शायद उसकी सेवा उनका दिल जीत ले।

लेकिन पानी सिर से ऊपर तब चला गया जब राघव के जन्मदिन की पार्टी रखी गई। शहर के तमाम बड़े लोग आए हुए थे। सुमित्रा देवी ने मीरा को एक पुरानी, साधारण सी साड़ी पहनने को मजबूर किया और मेहमानों के सामने उसका परिचय ‘दूर की रिश्तेदार’ कहकर करवाया।

एक अमीर महिला ने सुमित्रा देवी से पूछा, “अरे सुमित्रा, सुना है राघव ने शादी कर ली है? बहू कहाँ है? उसे मिलाया नहीं?”

सुमित्रा देवी ने हँसते हुए, लेकिन ज़हर बुझे शब्दों में कहा, “अरे क्या बताऊँ विमला, लड़कों को आजकल दया बहुत जल्दी आ जाती है। किसी गरीब बेचारी को देखा होगा, तो ब्याह ले आए। अब उसे समाज में लाने लायक तो होना चाहिए न? अभी उसे तौर-तरीके सिखा रहे हैं, गँवार जो ठहरी।”

वहाँ खड़ी मीरा के हाथों से जूस की ट्रे लगभग छूटते-छूटते बची। उसके कानों में ‘गँवार’ और ‘दया’ शब्द पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। वह राघव की ओर देखी, जो दूर किसी गेस्ट से बात कर रहा था और उसने यह नहीं सुना था।

उस रात मीरा अपने कमरे में बहुत रोई। उसने तय किया कि वह राघव को सब बता देगी और वे यहाँ से चले जाएंगे। लेकिन अगली सुबह कुछ ऐसा हुआ जिसने कहानी का रुख ही बदल दिया।

सुबह के चार बजे थे। पूरा घर गहरी नींद में था। अचानक सुमित्रा देवी के कमरे से कुछ गिरने की आवाज़ आई। मीरा, जो अक्सर जल्दी उठ जाती थी, दौड़कर उनके कमरे की ओर गई। दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं था।

अंदर का नज़ारा देखकर उसके होश उड़ गए। सुमित्रा देवी ज़मीन पर पड़ी थीं, उनका शरीर पसीने से लथपथ था और वे सीने को पकड़कर तड़प रही थीं। हार्ट अटैक।

“मां जी!” मीरा चिल्लाई। उसने तुरंत उन्हें सहारा देकर पलंग पर लिटाया।

उसने राघव को आवाज़ लगाई, लेकिन राघव शायद गहरी नींद में था या आवाज़ उस तक नहीं पहुँची। घर के लैंडलाइन और इंटरकॉम खराब पड़े थे। मीरा जानती थी कि एम्बुलेंस का इंतज़ार करने में बहुत देर हो जाएगी। उसने अपनी घबराहट को एक पल में झटक दिया।

उसने सुमित्रा देवी की नब्ज टटोली। धीमी थी। मीरा ने तुरंत अपनी हथेली उनके सीने पर रखी और सीपीआर (CPR) देना शुरू किया। वह एक स्कूल टीचर थी और उसने प्राथमिक चिकित्सा की ट्रेनिंग ली हुई थी।

“साँस लीजिए मां जी, हिम्मत मत हारिए,” वह लगातार उनके सीने को दबा रही थी और बीच-बीच में कृत्रिम साँस दे रही थी। लगभग पाँच मिनट की मशक्कत के बाद सुमित्रा देवी ने एक ज़ोरदार हिचकी ली और उनकी साँसें थोड़ी स्थिर हुईं।

तब तक मीरा ने दौड़कर राघव को जगा दिया था। गाड़ी निकाली गई और उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

डॉक्टरों ने बताया कि अगर मीरा ने समय पर सीपीआर न दिया होता, तो सुमित्रा देवी का बचना नामुमकिन था। अगले तीन दिन तक मीरा अस्पताल में ही रही। न उसने कपड़े बदले, न ठीक से खाना खाया। वह बस आईसीयू के बाहर कांच की दीवार से टकटकी लगाए खड़ी रहती।

जब सुमित्रा देवी को होश आया और उन्हें जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया, तो उन्होंने सबसे पहले मीरा को ढूंढा। मीरा एक कोने में स्टूल पर बैठी ऊंघ रही थी।

राघव माँ के पास बैठा था। सुमित्रा देवी ने कमजोर आवाज़ में पूछा, “वह... वह कहाँ है?”

राघव ने मीरा की ओर इशारा किया।

सुमित्रा देवी की आँखों से आँसू बह निकले। यह वही लड़की थी जिसे उन्होंने ‘गँवार’ कहा था, जिसे उन्होंने कभी अपनाया नहीं, जिसकी चुप्पी को उन्होंने कमजोरी समझा। आज उसी ‘अनपढ़’ समझी जाने वाली लड़की ने अपनी सूझबूझ से उनकी जान बचाई थी, जबकि उनकी अपनी बेटी तान्या घबराहट में केवल रो रही थी।

सुमित्रा ने हाथ बढ़ाकर इशारा किया। राघव ने मीरा को जगाया। मीरा हड़बड़ा कर उठी और पास आई। “जी मां जी? आपको पानी चाहिए?”

सुमित्रा देवी ने उसके हाथ को अपने कमज़ोर हाथों में थाम लिया। उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी, “मुझे माफ़ कर दो बेटा... मैंने तुम्हें क्या-क्या नहीं कहा। मैंने तुम्हारी खामोशी को तुम्हारी लाचारी समझा, जबकि वह तो तुम्हारा संस्कार था। तुम गँवार नहीं, तुम तो मुझसे भी ज्यादा समझदार निकली।”

मीरा ने उनके हाथ पर अपना माथा टेक दिया और रो पड़ी। “नहीं मां जी, आप बस ठीक हो जाइए। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”

हरिशंकर जी और तान्या भी कमरे में थे। तान्या का सिर शर्म से झुका हुआ था। उसे अपनी पढ़ाई और आधुनिक होने का बहुत घमंड था, लेकिन संकट के समय वह बिल्कुल बेकार साबित हुई थी।

हफ्ते भर बाद जब सुमित्रा देवी घर लौटीं, तो नज़ारा बदल चुका था। गाड़ी से उतरते ही उन्होंने सबसे पहले मीरा को बुलाया।

“रुको,” सुमित्रा देवी ने कहा। “उस दिन जिस तरह तुम इस घर में आई थीं, वह गलत था। आज तुम वैसे आओगी, जैसे इस घर की लक्ष्मी को आना चाहिए।”

उन्होंने नौकरों को आवाज़ दी। थाली सजाई गई। आरती का दीया जलाया गया। सुमित्रा देवी ने खुद झुककर मीरा के पैरों के पास कलश रखा।

“आओ बहू, अपने घर को संभालो,” सुमित्रा देवी ने आरती उतारते हुए कहा।

मीरा ने चावल से भरे कलश को दाहिने पैर से गिराया और लाल रंग से सने पैरों के साथ घर में प्रवेश किया। इस बार हवेली की दीवारें उसे काटने को नहीं दौड़ रही थीं, बल्कि स्वागत कर रही थीं।

राघव मुस्कुरा रहा था। उसने मीरा के कान में फुसफुसाया, “मैंने कहा था न, रिश्ते दिल से बनते हैं।”

मीरा मुस्कुराई। उसे समझ आ गया था कि उसकी चुप्पी कमजोरी नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसा बीझ था जिसे वक्त आने पर सम्मान का वृक्ष बनना ही था। लेकिन अब वह जानती थी कि सम्मान पाने के लिए केवल चुप रहना काफी नहीं, कभी-कभी अपनी काबिलियत का परिचय देना भी ज़रूरी होता है, बिना एक शब्द बोले।

रघुवंशी सदन अब भी वही था, लेकिन उसके अंदर की हवा बदल चुकी थी। अब वहां सन्नाटा नहीं, बल्कि एक नए रिश्ते की गुनगुनाहट थी।


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