नलिनी देवी, पचपन वर्षीय विधवा महिला, दो बेटों और दो बहुओं के साथ तीन मंजिला घर में रहती थीं। पति का निधन वर्षों पहले हो चुका था। उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी यही घर था, जिसकी पहली मंजिल पर उनका परिवार रहता था और ऊपर की दो मंजिलें किराए पर देकर खर्चे पूरे होते थे।
बड़ा बेटा करण, बैंक में अधिकारी था, उसकी पत्नी प्रज्ञा और उनका सात साल का बेटा आदित्य। छोटा बेटा अरविंद, एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था, उसकी शादी को अभी केवल दस महीने हुए थे और पत्नी वंदना।
नलिनी देवी ने कभी सोचा भी न था कि उनके जीते-जी घर के भीतर का माहौल इतना बिगड़ जाएगा।
प्रज्ञा शुरू से ही घरेलू जिम्मेदारियों में नलिनी का हाथ बंटाती थी। दोनों मिलकर पूरे घर को संभाल लेतीं। लेकिन वंदना के आने के बाद हालात बदल गए। वंदना लेट उठती, काम से जी चुराती, अक्सर मायके चली जाती और घर आए मेहमानों से भी कोई लेना-देना नहीं रखती।
कई बार नलिनी ने उसे समझाने की कोशिश की—
“बेटी, घर एक पेड़ की तरह है। सब मिलकर पानी देंगे तभी ये हरा-भरा रहेगा।”
लेकिन वंदना हर बार बहस करती और रो-रोकर अपनी मां को फोन कर देती। फिर उसकी मां नलिनी को फोन पर सुनातीं,
“आप मेरी बेटी से इतने काम करवाती हैं जैसे वह कोई नौकरानी हो। वह घर में बहू बनकर आई है, दासी बनकर नहीं।”
नलिनी को लगता जैसे कोई उनके गले में पत्थर बांधकर गहरी नदी में धकेल देता हो।
शुरू-शुरू में प्रज्ञा हर काम खुशी-खुशी करती थी, लेकिन जब उसने देखा कि वंदना हर जिम्मेदारी से बचती है और उसकी मां उल्टा नलिनी को ही दोष देती है, तो उसके मन में भी कड़वाहट घर कर गई। अब वह भी कभी-कभी काम से मुंह मोड़ लेती, और किसी भी बात पर अपनी मां को फोन लगाकर शिकायत कर देती।
“मां, यहां मुझे बिल्कुल इज्जत नहीं मिलती। वंदना तो दिनभर मजे करती है और सारा बोझ मुझ पर आ जाता है।”
उसकी मां, अपनी बेटी की कमजोरी देखकर, तुरंत फोन पर नलिनी को डांट देतीं।
इन्हीं हालातों में प्रज्ञा को टाइफाइड हो गया। नलिनी ने घर का सारा बोझ अकेले संभाला। वंदना, मदद करने के बजाय, मायके जाकर बैठ गई।
नलिनी ने सोचा था कि कम से कम इस बार सबको उनकी मेहनत दिखेगी। लेकिन उल्टा हो गया। प्रज्ञा जब मायके गई और वहां उसकी मां ने बेटी की हालत देखी तो तुरंत नलिनी को फोन कर सुनाने लगीं—
“समधन जी, आप मेरी बेटी का बिल्कुल ध्यान नहीं रखतीं। सारी जिम्मेदारी उसी पर डाल दी। फूल जैसी बच्ची की यह हालत कर दी आपने। लेकिन मैं भी जानती हूँ, भला कोई सास बहू का भला चाहती है क्या?”
नलिनी कुछ कहतीं उससे पहले ही फोन काट दिया गया।
उस पल उनके मन में जैसे किसी ने तेज धार का वार कर दिया हो। “जिस बहू को मैंने अपनी बेटी समझकर इतने साल संभाला, उसी की मां मुझ पर उंगली उठा रही है।”
बेटों का पलड़ा
शाम को करण और अरविंद घर लौटे। नलिनी ने दोनों को बुलाकर सारी बात बताई। उम्मीद थी कि बेटे उनकी पीड़ा समझेंगे। लेकिन हुआ उल्टा।
करण ने कहा,
“मां, इसमें प्रज्ञा या उसके माता-पिता की क्या गलती? उदिता (वंदना) भी बहू है, आप दोनों को बराबर समझना चाहिए।”
अरविंद ने जोड़ा,
“भाभी मायके जाकर बैठ गई, इसमें वंदना की क्या गलती? वह तो यहां थी ही नहीं।”
करण फिर बोला,
“क्या प्रज्ञा नौकरानी है, जो दिन-भर घर का काम करती रहे? आखिर वह भी इंसान है।”
अरविंद बोला,
“वंदना नई है मां, उसे समझने में थोड़ा समय लगेगा। आप ही हैं जिन्होंने उसे सिर चढ़ा रखा है। आप चाहे तो उसे समझा सकती हैं, लेकिन आपने कभी सख्ती नहीं की।”
नलिनी सन्न रह गईं। दोनों बेटे उनके खिलाफ खड़े थे। बहुएं तो बहुएं, अब बेटे भी उनके अपने नहीं रहे।
उस रात नलिनी पूरी रात हॉल में बैठी रहीं। आंखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्हें याद आया कि कैसे उन्होंने पति के निधन के बाद अकेले दम पर दोनों बेटों को पढ़ाया, पाला-पोसा, उनकी शादियां कीं। और आज वही बेटे उन पर सवाल उठा रहे हैं।
सुबह होते ही उन्होंने मन ही मन ठान लिया।
अगली सुबह जब घर में सब इकट्ठा हुए, नलिनी ने दृढ़ आवाज में कहा—
“करण और अरविंद, अब मेरी सहनशीलता खत्म हो चुकी है। अपनी-अपनी पत्नियों को कहो कि वे कल तक यहां मौजूद हों। मुझे सबके सामने बात करनी है।”
बेटे अवाक रह गए। उन्होंने पहली बार मां को इस तरह कड़े स्वर में बोलते देखा।
अगले दिन घर के हॉल में पूरा परिवार बैठा था। प्रज्ञा, वंदना, दोनों बेटे और बच्चे। नलिनी बीच में खड़ी हुईं।
“मैंने सोचा था कि यह घर मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी है। लेकिन असल में यह मेरे लिए सबसे बड़ा बोझ बन गया है। मैंने तुम्हें पालने में अपना जीवन लगा दिया, और आज तुम लोग मेरी ही नीयत पर शक करते हो। प्रज्ञा, तेरी सेवा मैंने बहू नहीं, बेटी समझकर की थी। और वंदना, तुझे भी मैंने बेटी मानकर समझाया। लेकिन तुम दोनों ने इस घर को रणभूमि बना दिया। और बेटों, तुम दोनों ने भी मुझे ही गलत ठहराया।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
नलिनी ने आगे कहा—
“अब से घर का हर काम तुम चारों मिलकर करोगे। मैं अब सिर्फ अपना ख्याल रखूंगी। अगर कोई भी बहू काम नहीं करेगी, तो खाना खुद पकाए, खुद खाए। और बेटों, अब अपनी पत्नियों को बचाने के लिए मुझे दोष देने की जरूरत नहीं है। ये घर मेरा है, और यहां के नियम अब मैं ही तय करूंगी। अगर किसी को मंजूर न हो तो दरवाजे खुले हैं।”
उनकी आवाज में ऐसा तेज था कि कोई जवाब न दे सका।
उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा। वंदना को समझ आया कि अब उसकी मां के फोन भी नलिनी को नहीं डिगा सकते। प्रज्ञा ने भी महसूस किया कि सास सिर्फ उसका भला चाहती हैं।
सबसे बड़ी बात यह हुई कि करण और अरविंद को भी एहसास हुआ कि उन्होंने अपनी मां का दिल तोड़ा है।
धीरे-धीरे घर की खींचतान कम हुई। और नलिनी, जो अब तक सबकी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाए थीं, आखिरकार खुद के लिए जीने लगीं।
यह कहानी सिर्फ नलिनी देवी की नहीं थी। यह हर उस मां की कहानी थी, जो अपनी संतान को पालने में जीवन लगा देती है, लेकिन अंत में उसके त्याग को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
नलिनी ने साबित कर दिया—
“घर तभी टिकता है जब सब मिलकर जिम्मेदारी उठाएं। सास हो या बहू, मां हो या बेटा—सम्मान और बराबरी सबसे जरूरी है।”
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