सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। शर्मा परिवार के घर से तेज आवाजें बाहर गली तक सुनाई दे रही थीं। मोहल्ले के लोग अब इस बात के आदी हो चुके थे कि हर दूसरे-तीसरे दिन यहां बहस छिड़ जाती है।
आज भी वही हुआ। साठ साल की सावित्री देवी और उनके पति रामलाल शर्मा बहू संध्या पर ऊंची आवाज में नाराज़ हो रहे थे। वजह वही—घर की "बरकत" और "रीति-रिवाज"।
संध्या की शादी को अब एक साल पूरा हो चुका था। शुरू के महीनों में उसने पूरी कोशिश की थी कि सास-ससुर की हर बात माने। जब उन्होंने कहा कि “सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नहा-धोकर ही रसोई में जाना चाहिए”, तो उसने पालन किया। जब कहा गया कि “मंगलवार को सिर मत धोना, बुधवार को हरे या लाल कपड़े पहनना और गुरुवार को पीला रंग ही पहनना चाहिए”, तो उसने वही किया।
लेकिन धीरे-धीरे संध्या को महसूस होने लगा कि ये परंपराएं उसके लिए बोझ बनती जा रही हैं। कभी भूल से सिर धो लिया तो सास का ताना—
“बरकत चली जाएगी, बहू ने घर अशुद्ध कर दिया।”
कभी जल्दीबाजी में पहले चावल पका दिए, तो ससुर की डांट—
“दाल से पहले चावल? इसी वजह से आजकल घर में मनमुटाव हो रहे हैं।”
संध्या का धैर्य टूटने लगा।
संध्या का सौभाग्य यह था कि उसका पति विकास उसके साथ खड़ा था। कई बार वह बीच-बचाव करता—
“मां, ये सब पुराने जमाने की बातें हैं। आजकल इन्हें मानना मुश्किल है। संध्या नौकरी भी करती है, घर भी संभालती है। आप लोग क्यों उस पर इतना दबाव डालते हैं?”
पर माता-पिता बेटे की बात को तवज्जो ही नहीं देते।
“तू चुप रह, बहुएं ही घर की बरकत लाती हैं। ये तो तेरी परवरिश का दोष है कि तू हमें समझाने चला है।”
विकास निराश होकर चुप हो जाता, पर संध्या को हमेशा कहता—
“देखो, सही और गलत की पहचान खुद करनी होगी। ज्यादा दबाव मत लो।”
संध्या ने कई बार कोशिश की कि माहौल शांत रहे। लेकिन रोज ही कोई नया नियम थमा दिया जाता।
“सोमवार को लोहे के बर्तन मत छुओ।”
“शनिवार को सरसों के तेल से चूल्हा मत जलाओ।”
“शुक्रवार को झाड़ू मत लगाओ।”
संध्या के लिए ये सब असंभव था। कभी वह भूल जाती तो सावित्री देवी ताने देतीं—
“तेरे मां-बाप ने तुझे कुछ सिखाया नहीं? घर चलाने का यही तरीका है।”
रामलाल भी जुड़ जाते—
“आजकल की लड़कियां नास्तिक हो गई हैं। पूजा-पाठ से कोई लेना-देना नहीं। तभी तो घर में शांति नहीं है।”
एक दिन संध्या की तबीयत खराब हो गई। तेज बुखार में भी वह उठकर चाय बनाने लगी, क्योंकि उसे पता था कि अगर बिना नहाए रसोई में गई तो विवाद होगा।
विकास ने उसे रोकते हुए कहा—
“अरे! नहीं होता तो मत करो। मैं बना देता हूँ।”
पर संध्या ने कमजोर आवाज में कहा—
“नहीं, मम्मी-पापा को बुरा लगेगा।”
विकास ने गुस्से में कहा—
“तुम्हारी अच्छाई का फायदा उठाया जा रहा है। यह बरकत नहीं, जुल्म है।”
उस दिन सावित्री देवी आंगन में बैठी मुंह फुलाए थीं। तभी पड़ोस की शांति काकी आईं।
“क्या हुआ जीजी? आज पूजा-पाठ नहीं?”
सावित्री ने तुनककर कहा—
“अरे बहू के आने के बाद भी क्या मैं सब करूँगी? नास्तिक निकली है। बिना नहाए रसोई में घुस गई। घर की बरकत चौपट कर दी।”
शांति काकी ने समझाने की कोशिश की—
“थोड़ा ढील दो। बहू नई है।”
सावित्री का गुस्सा और भड़क गया—
“नई? एक साल हो गया शादी को। बेटा भी उसी के साथ मिला हुआ है। मेरी किस्मत ही खराब है जो ऐसी बहू पल्ले पड़ी।”
इतना कहते ही विकास और संध्या बाहर आ गए। संध्या की आंखों से आंसू बह निकले।
विकास ने मां से सीधा कहा—
“मां, आप गलत कर रही हैं। संध्या बीमार थी, फिर भी आपके लिए चाय बनाने गई। आप खुद बना सकती थीं, लेकिन उसे ही दोष दे रही हैं। यह कैसी इंसानियत है?”
सावित्री चुप रह गईं। बात उनके दिल में चुभ गई।
विकास ने संध्या से कहा—
“देखा? मैंने कहा था न, तुम्हें आवाज उठानी होगी। मेरी मां-बाप हैं तो क्या, गलत तो गलत है। सेवा करो, पर अपनी इज्जत खोकर नहीं।”
उस दिन के बाद संध्या ने फैसला कर लिया। वह वही करेगी जो उसे सही लगेगा। पूजा-पाठ और सेवा करना उसे बुरा नहीं लगता था, लेकिन अंधविश्वासों में जीना अब वह स्वीकार नहीं करेगी।
अब वह सुबह समय से उठती, पर तभी जब उसकी तबीयत ठीक होती। नहाकर रसोई में जाना जरूरी समझती, लेकिन बीमारी या काम की जल्दी में नियम को नहीं मानती। कपड़े पहनने में रंगों की बंदिश मानना उसने छोड़ दिया।
धीरे-धीरे सावित्री देवी और रामलाल को भी समझ आने लगा कि बेटे और बहू की बातों में दम है। मोहल्ले में भी लोग कहते—
“संध्या पढ़ी-लिखी है, नौकरी भी करती है और घर भी। उसे बेवजह तानों से परेशान मत करो।”
कई महीनों बाद सावित्री देवी ने खुद स्वीकार किया—
“बरकत घर में बहू के नहाने या कपड़े के रंग से नहीं आती। बरकत तो तब आती है जब घर में प्यार और शांति हो।”
रामलाल ने भी सिर झुका दिया।
संध्या मुस्कुरा दी। उसके त्याग और धैर्य ने आखिरकार बदलाव ला ही दिया।
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