भटके पिता की आंख खोल दी

 आज घर लौटने पर चेहरे पर विजयी मुसकान थी .....

रेप दोषी के वकील थे और अपनी करामात से उनहोने केस मे एकबार फिर तारीख डलवा दी थी ...और बाहर निकलते वक्त पीडिता के परिजनों से कह दिया था- की उनके पास बहुत दांवपेंच है वो अपने मुवक्किल को फांसी नही होने देगे...

घर पहुंचे तो पत्नी ने पानी दिया तभी उनकी मासूम बिटिया आकर उनके गले मे बाहें डालकर झूम गई और बोली-पापा क्या आप सचमुच बुरे हो ...

क्या ....ऐसे क्यो बोल रही हो तुम ...

क्योंकि मेरे सभी दोस्त कहते है आप बुरे है क्योंकि आप दोषियों को फांसी से बचा रहे है ...

पापा अगर कल को मेरे साथ भी वैसा कुछ हो गया तो ...क्या तब भी आप ऐसे दोषियों को बचाएंगे ...

अचानक बिटिया के मुंह से सुने शब्द मानो चुभने लगे चेहरे पर हवाइयां सी उड़ने लगी और गले मे झूलते हुए उस के हाथ किसी फांसी के फंदे की भांति गले को कसते हुए से महसूस होने लगे ....

ऐसा लगा मानो गला भीच सा रहा हो

शरीर सुन्न सा पड रहा था ...

कुछ हिम्मत बटोरते तुरंत बिटिया को सीने से लगाकर कहा -नहीं.... मेरी बच्ची ...कभी नही ...मुझे माफ कर दो .....

अब मे उन दोषियों को नही बचाउंगा ....

अगली तारीख पर उन्हें उनके किए की सजा अवश्य होगी ....और आगे से कभी भी ऐसे दोषियों को बचाने की कोशिश भी नही करुंगा... सचमुच आज समझ मे आया जैसे तुम मेरी बेटी हो वैसे वो भी तो....

मुझे माफ करना ....मुझे माफ करना...

कहकर बिटिया को सीने से लगाकर रोने लगे ...

वही पत्नी और बेटी की आँखे भी भीगी थी मगर संतुष्टि लिए हुए की वो एक भटकाव से एक पिता को सही राह तक ले आए थे....

एक दोस्त की सुंदर रचना


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