आपको_अपना_बेटा_मुबारक.....

 तिलक की तैयारियॉं चल रहीं थी। चारों तरफ़ हँसी खुशी का माहौल था। समधियों का आपसी मेल मिलाप चल रहा था। तभी औरतों की तरफ़ से शोर उठा। उस शोर की आवाज़ ने पुरूषों का भी ध्यान खींचा। पूछने पर पता चला कि लड़की वाले लड़के की बहन के पति के कपड़े नहीं लाए।

लड़के की मां उन एक जोड़ी कपड़ों के लिए अपने आपे से बाहर हो गई। कया कुछ नही सुनाने लगी। समझा बुझाकर शांत किया गया। कुछ रिश्तेदारो ने लड़की के पिता को कहा कि अाप कपड़ों के पैसे दे दो। ये यहां ले लेगें। लड़की के पिता ने हाथ जोड़कर कहा, “माफ़ करिएगा! काठ की हांडी एक ही बार चूल्हे पर चढ़ती है।

जो एक जोड़ी कपड़ों के लिए तांडव कर सकती हैं और सारा परिवार उसके साथ इस तांडव पर मृदंग बजा रहा हो, वो शादी के बाद ना जाने किस कमी का नाम लेकर बच्ची को बंदरनाच नचाए। आपको अपना बेटा मुबारक,जय रामजी की, और तमाम रिश्तेदारों और मेहमानों के सामने रिश्ते को वही समाप्त करने का एलान कर दिया। पर्दे के पीछे से देख रही बेटी की आँखों मे खुशी और संतुष्टि के भाव थे वही तमाम पक्ष विपक्ष के मेहमानों मे सिवाय लडके और उसके घरवालों के  लडकी के पिता के लिए सम्मान के भाव थे।


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