पत्थर की जुबान

 बुराई करना बहुत आसान है, क्योंकि उसमें सिर्फ जुबान चलती है; लेकिन अच्छाई को स्वीकार करने के लिए जिगर चाहिए होता है। क्या एक सास अपनी ही बनाई हुई 'खलनायिका' की छवि को तोड़कर सच बोल पाएगी?

 

"अरे विमला बहन, क्या बताऊँ! कल तो हद ही हो गई। महारानी जी ने ऑनलाइन खाना मंगवा लिया। कहती हैं, 'मम्मी जी, आज बहुत थक गई हूँ, खाना बनाने की हिम्मत नहीं है।' अब तुम ही बताओ, एसी (AC) ऑफिस में बैठकर कौन थकता है? हम तो भरी दुपहरी में चूल्हा फूँकते थे, तब तो कभी नहीं थके। बस, बहाने चाहिए काम से बचने के," सुमित्रा जी ने पान चबाते हुए बड़े चटखारे लेकर कहा।

पास बैठी विमला और कांता ने भी सुर में सुर मिलाया। "हाँ बहन, आजकल की लड़कियों को बस फैशन और घूमने से मतलब है। घर-गृहस्थी तो इनके बस की बात नहीं। भगवान बचाए ऐसी बहुओं से।"

सुमित्रा जी को बड़ा सुकून मिलता था जब सब उनकी हाँ में हाँ मिलाते थे। उन्हें लगता था कि दुनिया की सबसे पीड़ित सास वही हैं। अवनि एक बैंक में मैनेजर थी। सुबह जल्दी निकल जाती और शाम को देर से लौटती। सुमित्रा जी को अवनि की यह 'नौकरी' फूटी आँख नहीं सुहाती थी, भले ही उसी नौकरी की तनख्वाह से घर की किश्तें जा रही थीं।

एक दिन, सुमित्रा जी की बेटी, यानी अवनि की ननद 'रिया', दो दिन के लिए मायके आई। रिया के आते ही सुमित्रा जी का चेहरा खिल गया।

"आ गई मेरी लाडो! देख, मैंने तेरे लिए तेरे पसंद के बेसन के लड्डू बनाए हैं," सुमित्रा जी ने प्यार लुटाते हुए कहा।

शाम को डाइनिंग टेबल पर सुमित्रा जी ने फिर वही पुराना राग छेड़ दिया।

"रिया, तू तो किस्मत वाली है जो तुझे इतनी अच्छी सास मिली। यहाँ देख, मेरी किस्मत ही फूटी है। अवनि को तो घर का कोई होश ही नहीं रहता। कल देखो, मेरे घुटने में दर्द था, पर मजाल है जो इसने एक बार भी पूछा हो कि 'मम्मी जी, बाम लगा दूँ?' बस अपने लैपटॉप में घुसी रहती है।"

अवनि रसोई में थी। वह सब सुन रही थी। उसकी आँखों में आंसू थे, पर वह चुपचाप रोटियां सेकती रही। वह जानती थी कि जवाब देने का मतलब है घर में महाभारत छिड़ जाना।

रिया ने माँ की बात सुनी और चुप रही। अगले दिन रिया वापस चली गई।

हफ्ता बीता और सुमित्रा जी के जीवन में एक ऐसा तूफ़ान आया जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया।

उनके बेटे, रोहित, को कंपनी के काम से एक महीने के लिए विदेश जाना पड़ा। अवनि और सुमित्रा जी घर में अकेले थे। सुमित्रा जी ने मन ही मन सोचा, "अब तो यह मुझे भूखा ही मार देगी।"

दो दिन बाद, रात के करीब दो बजे सुमित्रा जी को सीने में तेज़ दर्द हुआ। पसीना छूटने लगा और सांस उखड़ने लगी। उन्होंने पानी पीने की कोशिश की, पर गिलास हाथ से छूटकर गिर गया। आवाज़ सुनकर अवनि, जो अपने कमरे में सो रही थी, हड़बड़ा कर उठी।

वह दौड़कर सुमित्रा जी के कमरे में आई। सुमित्रा जी ज़मीन पर गिरी तड़प रही थीं।

"मम्मी जी!" अवनि चीखी।

उसने एक पल भी नहीं गंवाया। रोहित का फोन नेटवर्क क्षेत्र से बाहर था। अवनि ने तुरंत एम्बुलेंस बुलाई और पड़ोसियों को जगाने के बजाय, अपनी पूरी ताकत लगाकर सुमित्रा जी को उठाया और कुर्सी पर बैठाया। उसने अपनी कार निकाली और अकेले ही सुमित्रा जी को लेकर अस्पताल भागी।

डॉक्टर ने बताया कि उन्हें 'माइनर हार्ट अटैक' आया है। समय पर लाने से जान बच गई।

अगले दस दिन सुमित्रा जी अस्पताल में रहीं।

रोहित विदेश में फंसा था, वह चाहकर भी तुरंत नहीं आ सकता था। सुमित्रा जी की वही सहेलियाँ—विमला और कांता—एक बार अस्पताल आईं, 'get well soon' का कार्ड दिया, दो-चार झूठी तसल्ली की बातें कीं और चलती बनीं। उन्होंने कहा, "बहन, हमें भी शुगर-बीपी की बीमारी है, ज्यादा देर अस्पताल में नहीं रुक सकते, इन्फेक्शन का डर है।"

अब वहां सिर्फ अवनि थी।

अवनि ने अपनी बैंक से 15 दिन की छुट्टी ले ली थी—बिना वेतन के। वही अवनि, जिसे सुमित्रा जी 'कामचोर' कहती थीं, अब एक पैर पर खड़ी थी।

सुमित्रा जी बेड पर लेटे-लेटे सब देख रही थीं।

अवनि सुबह उठकर उन्हें स्पंज (गीले तौलिये से साफ़) करती, क्योंकि वह बाथरूम नहीं जा सकती थीं। वह उनके गंदे कपड़े बदलती। जब सुमित्रा जी को अस्पताल का खाना बेस्वाद लगता, तो अवनि घर भागकर जाती और उनके लिए पतला दलिया और सूप बनाकर लाती।

एक रात, सुमित्रा जी को उल्टियां होने लगीं। पूरा बिस्तर गंदा हो गया। बदबू के मारे वॉर्ड बॉय भी नाक सिकोड़कर बाहर खड़ा हो गया।

सुमित्रा जी शर्म से पानी-पानी हो गईं। उन्हें लगा अवनि अब चिल्लाएगी, गुस्सा करेगी।

लेकिन अवनि ने बिना एक शब्द बोले, बिना नाक सिकोड़े, अपने हाथों से सब साफ़ किया। उसने सुमित्रा जी का मुँह पोंछा और माथे पर प्यार से हाथ फेरा।

"घबराइए मत मम्मी जी, दवाई का असर है, ठीक हो जाएगा," अवनि ने मुस्कराते हुए कहा।

उस रात सुमित्रा जी सो नहीं पाईं। उनकी आँखों के सामने वो सारे मंज़र घूम रहे थे जब उन्होंने पार्क में बैठकर अवनि की धज्जियां उड़ाई थीं। "यह मॉडर्न है", "इसे संस्कार नहीं पता", "यह बड़ों की इज़्ज़त नहीं करती"।

आज वही 'मॉडर्न' बहू उनकी गंदगी साफ़ कर रही थी, जबकि उनकी अपनी 'संस्कारी' सहेलियां और रिश्तेदार दूर खड़े थे।

पंद्रह दिन बाद सुमित्रा जी घर लौटीं। वह अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं थीं, पर खतरे से बाहर थीं।

अगले दिन शाम को विमला, कांता और मोहल्ले की बाकी औरतें सुमित्रा जी का हालचाल लेने उनके घर आ धमकीं।

हॉल में फिर वही महफिल सजी।

विमला ने सहानुभूति जताते हुए कहा, "हाय सुमित्रा, बड़ा बुरा हुआ तेरे साथ। और सुन, इस हालत में तो तुझे और दिक्कत हो रही होगी। तेरी बहू तो ऑफिस वाली है, अब कौन करेगा तेरी सेवा? वो तो चिढ़ती होगी न तेरे पास बैठने से?"

कांता ने भी नमक छिड़का, "हाँ बहन, मैंने सुना है आजकल बहुएं बीमार सास को ओल्ड ऐज होम छोड़ने की बात करने लगती हैं। तू ध्यान रखना, कहीं तेरे बेटे के पीछे अवनि तुझे..."

सुमित्रा जी का खून खौल उठा। आज तक इन बातों में उन्हें रस आता था, लेकिन आज ये बातें उन्हें तेज़ाब जैसी लग रही थीं। उन्होंने देखा कि अवनि ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर आ रही है। अवनि के चेहरे पर थकान थी, आँखों के नीचे काले घेरे थे, फिर भी वह मुस्कुराकर मेहमानों का स्वागत कर रही थी।

सुमित्रा जी ने विमला की बात बीच में ही काट दी।

"बस करो विमला!" सुमित्रा जी की आवाज़ में एक ऐसी कड़क थी कि हॉल में सन्नाटा छा गया।

उन्होंने अपनी कांपती उंगली अवनि की तरफ उठाई।

"तुम सबने मेरी बहू के बारे में बहुत कुछ सुना है, क्योंकि मैंने ही सुनाया था। मैंने बताया था कि वो 9 बजे उठती है, मैंने बताया था कि वो ऑनलाइन खाना मंगाती है। लेकिन आज मैं वो बताउंगी जो मैंने कभी नहीं बताया, और जो शायद तुम सब सुनना भी नहीं चाहतीं।"

अवनि ठिठक गई। उसे लगा आज फिर कोई शिकायत होने वाली है।

सुमित्रा जी की आँखों में आंसू आ गए।

"जब मुझे अटैक आया, तो मेरा बेटा हज़ारों मील दूर था। मेरी बेटी अपनी ससुराल में थी। तुम सब अपने घरों में सो रही थीं। तब यही अवनि थी जिसने मुझे अपनी पीठ पर लादकर कार तक पहुँचाया। पिछले दस दिनों से इसने अपने बाल नहीं झाड़े हैं, ठीक से खाना नहीं खाया है। अस्पताल में जब मैंने बिस्तर पर गंदगी कर दी थी, तो मेरी अपनी बेटी होती तो शायद नाक सिकोड़ लेती, लेकिन अवनि ने मेरे पैर धोए, मेरे कपड़े बदले।"

सुमित्रा जी का गला भर आया।

"तुम लोग कहती हो ना कि नौकरी वाली बहुएं घर नहीं जोड़तीं? मेरी बहू ने अपनी 15 दिन की तनख्वाह कटवा ली सिर्फ इसलिए ताकि वो मुझे अपने हाथों से सूप पिला सके। मेरी जान मेरे बेटे ने नहीं, मेरी बहू ने बचाई है। उसने मेरा 'काम' नहीं किया, उसने मेरी 'माँ' बनकर सेवा की है।"

विमला और कांता के चेहरे शर्म से झुक गए।

सुमित्रा जी ने अवनि को अपने पास बुलाया और उसका हाथ पकड़कर अपने सीने से लगा लिया।

"दुनिया भर में अपनी बहू की बुराई करने वालों, एक बार यह भी बताना मत भूलना कि जब तुम लाचार थे, तो उसी बहू ने तुम्हारी लाठी बनकर तुम्हें सहारा दिया था। उसकी एक कमी गिनाने से पहले, उसकी सौ अच्छाइयों को याद कर लेना। मुझे माफ़ कर दे अवनि... मैं एक सास ही बनी रही, कभी माँ नहीं बन पाई। पर तूने साबित कर दिया कि तू बहू नहीं, बेटी से बढ़कर है।"

अवनि सुमित्रा जी के गले लगकर रो पड़ी। वो आंसू दुख के नहीं, उस सम्मान के थे जिसके लिए वह बरसों से तरस रही थी।

उस दिन गुलमोहर पार्क की उस बेंच पर एक नई कहानी लिखी गई थी। सुमित्रा जी ने सिर्फ अवनि का सच नहीं बताया था, बल्कि समाज के उस दोहरे चेहरे को बेनकाब किया था जो बहू की कमियों का तो ढिंढोरा पीटता है, पर उसके त्याग को 'फर्ज़' के नाम पर दफना देता है।


कहानी का संदेश:

अक्सर हम अपने पूर्वाग्रहों (prejudices) और समाज की बातों में आकर अपने घर की लक्ष्मी को पहचान नहीं पाते। सास-बहू का रिश्ता खट्टा-मीठा हो सकता है, लेकिन इसे ज़हरीला बनाना या अमृत, यह हमारी जुबान और नज़रिए पर निर्भर करता है। शिकायतों का शोर इतना न बढ़ाएं कि सेवा की खामोश आवाज़ दब जाए।

अंत में आपसे एक सवाल:

क्या सुमित्रा जी ने सही समय पर अपनी गलती सुधारी? क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसी अवनि है जो बिना किसी तारीफ के अपना फर्ज़ निभा रही है?

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