"एक पिता ने अपने परिवार को दुनिया की हर खुशी देने के लिए दिन-रात एक कर दिया, मगर जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि उसका घर तो 'महल' बन गया है, लेकिन उसमें रहने वाले 'रिश्ते' बेघर हो गए हैं। पढ़िए पैसे और प्यार के बीच फंसे एक परिवार की आँखें खोल देने वाली कहानी।"
शाम के आठ बज रहे थे। 45 वर्षीय शेखर अपनी स्टडी में बैठा किसी विदेशी क्लाइंट पर चिल्ला रहा था। "मुझे बहाने नहीं चाहिए! डील कल तक फाइनल होनी चाहिए, चाहे जो कीमत लगे।"
दूसरे कमरे में उसकी पत्नी, माया, अपने हीरे के कंगन को आईने में निहार रही थी, लेकिन उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो उन हीरो में थी। वो उदास थी क्योंकि आज उनकी शादी की बीसवीं सालगिरह थी, और शेखर को शायद याद भी नहीं था। याद होता भी तो क्या? वो कोई महंगा तोहफा भिजवा देता, जैसे पिछले साल भिजवाया था।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। नौकर ने दरवाजा खोला। सामने शेखर की बूढ़ी माँ, कावेरी देवी खड़ी थीं। हाथ में एक पुराना सा झोला और चेहरे पर गाँव की वही पुरानी झुर्रियां, जिनमें सुकून और चिंता दोनों एक साथ रहती थीं।
"माँ जी, आप?" नौकर ने हैरानी से पूछा।
माया दौड़कर बाहर आई। "अरे माँ जी! आपने बताया नहीं? हम ड्राइवर भेज देते।"
कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए माया के सिर पर हाथ रखा। "अरे बेटा, सरप्राइज देने का मन था। सोचा सालगिरह है तुम दोनों की, तो अपने हाथ की बनी खीर खिला आऊं।"
शेखर भी शोर सुनकर बाहर आ गया। माँ को देख वो थोड़ा चौंका, फिर घड़ी देखते हुए बोला, "माँ, आप आ गईं, अच्छी बात है। पर आज घर में थोड़ी भीड़ रहेगी। मैंने कुछ बिजनेस एसोसिएट्स को डिनर पर बुलाया है। सालगिरह भी है, तो सेलिब्रेशन के साथ नेटवर्किंग भी हो जाएगी।"
कावेरी देवी का चेहरा थोड़ा उतर गया, लेकिन उन्होंने बेटे की ख़ुशी के लिए हामी भर दी।
रात को पार्टी शुरू हुई। घर को फूलों और महंगें झाड़-फानूसों से सजाया गया था। शहर के बड़े-बड़े लोग आए थे। हर तरफ महंगी शराब और विदेशी खाने की खुशबू थी। शेखर और माया मेहमानों के बीच ऐसे मुस्कुरा रहे थे जैसे दुनिया का सबसे खुशहाल जोड़ा वही हो।
कावेरी देवी एक कोने में सोफे पर सिकुड़ कर बैठी थीं। उनकी साधारण सूती साड़ी और हवाई चप्पलें वहां मौजूद लोगों के डिज़ाइनर कपड़ों के बीच अलग ही दिख रही थीं।
तभी एक मेहमान ने खीर की कटोरी उठाई। यह वो खीर नहीं थी जो कावेरी देवी लाई थीं, बल्कि वो थी जो फाइव स्टार होटल से मंगवाई गई थी—केसर और पिस्ते से लदी हुई।
मेहमान ने एक चम्मच खाया और तारीफ की, "वाह शेखर! क्या स्वाद है। तुम्हारे पास तो दुनिया की हर लक्ज़री है भाई। पैसा हो तो इंसान क्या नहीं खरीद सकता।"
शेखर ने गर्व से सीना चौड़ा किया। "बिल्कुल! मैंने यही तो सीखा है कि जीवन में सब कुछ पैसे से ही चलता है।"
पार्टी खत्म हुई। मेहमान चले गए। शेखर और माया थके हुए सोफे पर गिर पड़े। घर फिर से शांत हो गया। नौकर सफाई कर रहे थे।
कावेरी देवी उठीं और रसोई में गईं। उन्होंने अपने झोले से वो टिफिन निकाला जिसमें वो गाँव से खीर बनाकर लाई थीं। उन्होंने तीन कटोरियों में खीर निकाली और ड्राइंग रूम में ले आईं।
"शेखर, माया... थक गए होगे। लो, थोड़ा मुँह मीठा कर लो। मेरे हाथ की खीर है," कावेरी देवी ने प्यार से कहा।
शेखर ने चिड़चिड़ाते हुए कहा, "माँ, अभी तो इतना खाया। पेट भरा हुआ है। आप भी न, पुरानी आदतें नहीं छोड़तीं। अब हम वो गाँव वाले नहीं रहे जो हर छोटी बात पर खीर खाएं।"
कावेरी देवी ने कुछ नहीं कहा। बस कटोरी मेज़ पर रख दी। "एक चम्मच खा ले बेटा। शगुन होता है।"
मन रखने के लिए शेखर ने चम्मच उठाया और खीर मुंह में डाली। अगले ही पल उसने थूक दिया।
"छी! माँ यह क्या है? इसमें तो चीनी की जगह नमक है! और वो भी इतना ज़्यादा? क्या हो गया है आपको? उम्र के साथ स्वाद भी भूल गई हैं क्या?" शेखर चिल्लाया।
माया ने भी चखा और चेहरा बिगाड़ लिया। "हाँ माँ जी, यह तो बहुत खारा है। कोई खीर में नमक डालता है क्या?"
कावेरी देवी शांत रहीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी गंभीरता थी। उन्होंने धीरे से कहा, "अरे! गलती हो गई शायद। चीनी के डिब्बे की जगह नमक का डिब्बा उठा लिया होगा। पर बेटा, फेंक मत। इसमें काजू-बादाम डाले हैं, दूध भी गाढ़ा है। महंगा है सब। खा ले न थोड़ा।"
"क्या बात कर रही हैं आप?" शेखर का पारा चढ़ गया। "महंगा है तो क्या ज़हर खा लें? स्वाद ही बिगड़ गया तो काजू-बादाम किस काम के? यह तो कचरा है अब।"
कावेरी देवी ने शेखर की आँखों में सीधे देखा और वो बात कही जिसने शेखर के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
"यही तो मैं तुझे समझाना चाहती हूँ शेखर। देख बेटा, पैसा जीवन में नमक की तरह होता है। ज़रूरी है, बहुत ज़रूरी है। उसके बिना ज़िंदगी फीकी लगती है। लेकिन तूने... तूने अपनी ज़िंदगी की खीर में पैसा रूपी नमक इतना ज़्यादा डाल दिया है कि अब रिश्तों की मिठास, सुकून का स्वाद और अपनों का प्यार... सब कड़वा हो गया है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। शेखर अवाक रह गया।
कावेरी देवी ने आगे कहा, "मैं कोने में बैठी देख रही थी। तू माया के साथ खड़ा था, पर तेरा ध्यान उसके चेहरे पर नहीं, तेरे क्लाइंट की बातों पर था। माया ने नया हार पहना था, पर तूने एक बार भी उसकी तारीफ नहीं की। तेरे 12 साल के बेटे रोहन ने तुझे अपनी ड्राइंग दिखानी चाही, तो तूने उसे 2000 रुपये देकर कहा—'जाओ कुछ खरीद लो'। बेटा, तूने घर को सोने का पिंजरा बना दिया है। सब कुछ है यहाँ—महंगे सोफे, एसी, गाड़ियाँ... पर 'स्वाद' नहीं है। ठीक इस खीर की तरह। इसमें भी दूध है, मेवे हैं, सब महंगा है... पर नमक ज़्यादा होने से यह किसी काम की नहीं रही।"
शेखर की नज़रें झुक गईं। उसे अचानक अपने बचपन की याद आ गई। जब उनके पास छोटा सा घर था, पैसे कम थे, लेकिन हर शाम वो सब साथ बैठकर चाय पीते थे। तब ठहाके असली होते थे। आज उसके पास करोड़ों थे, पर वह अपनी पत्नी के साथ दो मिनट सुकून से बात करने को तरसता था।
माया की आँखों से आंसू बह निकले। "माँ जी सही कह रही हैं शेखर। हमारे पास सब कुछ है, पर हम खुश नहीं हैं। हम बस भाग रहे हैं... और पैसा जमा कर रहे हैं। पर किसके लिए?"
शेखर ने कांपते हाथों से माँ का हाथ थाम लिया। "माँ... मैं... मैं भटक गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ ठीक कर देगा।"
कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए दूसरी डिब्बी खोली। "घबरा मत। माँ हूँ न, मुझे पता था मेरे बेटे को कड़वी दवा की ज़रूरत है। असली खीर यह रही।"
उन्होंने एक और टिफिन खोला। उसमें से इलायची और गुड़ की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी।
"यह ले। इसमें सब नपा-तुला है। मिठास भी और स्वाद भी।"
शेखर ने उस खीर का एक चम्मच खाया। वही पुराना स्वाद! वही बचपन का सुकून! उसकी आँखों से आंसू टपक कर खीर में गिर गए। उसने माया को भी खिलाया। उस रात उस आलीशान पेंटहाउस में पहली बार 'अमीरी' नहीं, बल्कि 'तृप्ति' महसूस हुई।
अगले दिन सुबह, शेखर ने अपनी महत्वपूर्ण मीटिंग कैंसिल कर दी।
"कहाँ जा रहे हैं सर?" सेक्रेटरी ने फ़ोन पर घबराते हुए पूछा। "करोड़ों का नुकसान हो जाएगा।"
शेखर ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ और पत्नी की तरफ देखा, जो बालकनी में बैठकर धूप सेक रही थीं। "नुकसान तो तब होता जब मैं आज भी मीटिंग में जाता। आज मैं अपनी 'ज़िंदगी का स्वाद' वापस लाने जा रहा हूँ। आज हम सब पिकनिक पर जा रहे हैं।"
उस दिन शेखर को समझ आ गया कि नमक सिर्फ़ चुटकी भर ही अच्छा लगता है। मुट्ठी भर नमक से समंदर तो बन सकता है, पर उसे पिया नहीं जा सकता। प्यास बुझाने के लिए तो मीठे पानी के झरने की ही ज़रूरत होती है—और वह झरना है 'परिवार'।
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अक्सर हम पैसे कमाने की दौड़ में यह भूल जाते हैं कि पैसा 'साधन' है, 'साध्य' नहीं। अगर आपके पास दुनिया भर की दौलत है लेकिन उसे बांटने के लिए परिवार और सुकून नहीं, तो वह दौलत उस खारी खीर की तरह है जिसे निगला नहीं जा सकता।
याद रखिये, जीवन में संतुलन ही सबसे बड़ी संपत्ति है।
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