क्या एक बहू का धर्म सिर्फ ‘हाँ’ कहना है, चाहे उसका शरीर बुखार में जल रहा हो? देखिये कैसे एक सास ने अपनी ही बेटी को वह सबक सिखाया जो शायद पूरी उम्र उसे कोई और नहीं सीखा पाता।
घड़ी की सुइयां रात के डेढ़ बजे का इशारा कर रही थीं। बाहर सन्नाटा था, लेकिन घर के अंदर, रिया के माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उसका शरीर 103 डिग्री बुखार में तप रहा था। वह कंबल में लिपटी हुई सोफे पर निढाल पड़ी थी, लेकिन उसके सामने खड़ी उसकी ननद, स्नेहा, के तेवर कुछ और ही कह रहे थे।
“भाभी! मैं ऐसा बेस्वाद खाना नहीं खा सकती!!” स्नेहा ने खाने की प्लेट टेबल पर सरकाते हुए चिढ़कर कहा।
रिया ने कांपती आवाज़ में जवाब दिया, “स्नेहा, प्लीज… आज मैनेज कर लो। मेरी हिम्मत नहीं हो रही है। डॉक्टर ने मुझे बेड रेस्ट बोला है। ये मूंग की दाल और चावल मैंने शाम को ही बना दिए थे…”
“तो क्या हुआ?” स्नेहा ने तुनक कर कहा। वह कॉलेज की छात्रा थी और घर की लाडली भी। “आप जानती हैं न कि मुझे रात को पढ़ाई करते वक्त कुछ चटपटा चाहिए होता है? यह उबला हुआ खाना तो बीमारों के लिए है। आप बीमार हैं, मैं नहीं। मुझे भूख लगी है। प्लीज उठिये और मेरे लिए फ्राइड राइस या कुछ अच्छा सा बना दीजिये। बस 15 मिनट ही तो लगेंगे।”
रिया की आँखों में आंसू आ गए। उसका सिर फट रहा था। उसे लगा जैसे उसका शरीर अब जवाब दे देगा। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन चक्कर खाकर वापस सोफे पर गिर गई।
“हद है भाभी,” स्नेहा ने पैर पटकते हुए कहा। “भैया होते तो कभी मना नहीं करते। आप बस बहाने बना रही हैं।”
तभी, अंदर के कमरे का दरवाजा खुला। सावित्री देवी, रिया की सास, बाहर आईं। उनकी आँखों में नींद थी, लेकिन चेहरे पर एक सख्त भाव। वह धीरे-धीरे चलते हुए हॉल में आईं।
स्नेहा ने अपनी माँ को देखते ही तुरंत शिकायत शुरू कर दी, “माँ, देखो न! भाभी को कब से कह रही हूँ कि भूख लगी है, कुछ बना दें। पर ये हैं कि बस लेटी हुई हैं। अब क्या मैं भूखी सो जाऊं?”
सावित्री देवी ने पहले मेज पर रखी खाने की प्लेट को देखा, फिर सोफे पर पड़ी रिया को, जो बुखार से लाल हो रही थी। रिया ने सास को देखकर घबराहट में उठने की कोशिश की।
“माँ जी… वो… मैं अभी…” रिया लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई।
“खबरदार जो तू अपनी जगह से हिली!” सावित्री देवी की आवाज़ में बिजली जैसी कड़क थी।
स्नेहा के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उसे लगा माँ भाभी को डांट रही हैं।
सावित्री देवी स्नेहा की ओर मुड़ीं। उनकी आँखों में वह गुस्सा था जो स्नेहा ने पहले कभी नहीं देखा था।
“तुझे भूख लगी है ना?” सावित्री देवी ने बेहद शांत लेकिन खौफनाक आवाज़ में पूछा।
“हाँ माँ, बहुत जोर से,” स्नेहा ने लाड़ में आकर कहा।
“तो चल मेरे साथ,” सावित्री देवी ने स्नेहा का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए रसोई की तरफ ले गईं।
“माँ? क्या कर रही हो? आप बनाओगी क्या?” स्नेहा हैरान थी।
रसोई में पहुँचकर सावित्री देवी ने गैस नहीं जलाई। उन्होंने स्नेहा का हाथ छोड़ा और फ्रिज की ओर इशारा किया।
“निकाल सब्जियां,” उन्होंने आदेश दिया।
“क्या?”
“मैंने कहा सब्जियां निकाल! और चाकू उठा,” सावित्री देवी चिल्लाईं। “तुझे भूख लगी है न? तुझे चटपटा खाना है न? तो बना। अभी बना। और सिर्फ अपने लिए नहीं, पूरे घर के लिए बना।”
स्नेहा सन्न रह गई। “माँ, मुझे खाना बनाना नहीं आता। और रात के दो बज रहे हैं, मुझे नींद आ रही है।”
सावित्री देवी ने एक भगोना ज़ोर से स्लैब पर रखा। “नींद आ रही है? तुझे नींद आ रही है, जबकि तू हट्टे-कट्टे शरीर की मालकिन है। और वो लड़की, जो बाहर 103 डिग्री बुखार में जल रही है, उसे नींद नहीं आ रही होगी? तुझे शर्म नहीं आई स्नेहा? तू उसे उठाने की जिद कर रही थी?”
“माँ, वो तो भाभी हैं… उनका काम है…” स्नेहा ने दबी जुबान में तर्क देना चाहा।
“क्या काम है उसका?” सावित्री देवी अब स्नेहा के बिल्कुल करीब आ गईं। “मशीन है वो? रोबोट खरीद कर लाए थे हम? या इंसान ब्याह कर लाए थे? जब तुझे पिछले महीने वायरल हुआ था, तो इसी भाभी ने पूरी रात जागकर तेरे माथे पर पट्टियां रखी थीं। तब तुझे याद नहीं आया कि भाभी को भी नींद आती होगी? आज उसे जरूरत है, तो तुझे मूंग की दाल में नखरे दिख रहे हैं?”
हॉल में लेटी रिया यह सब सुन रही थी। उसकी आँखों से अब जो आंसू बह रहे थे, वे दुख के नहीं, राहत के थे। आज पहली बार किसी ने उसके दर्द को समझा था।
रसोई में स्नेहा की सिट्टी-पिट्टी गुम थी।
सावित्री देवी ने अपनी बात जारी रखी, “सुन ले कान खोलकर। रिया इस घर की बहू बाद में है, इंसान पहले है। जिस दिन हम अपनी बेटियों को यह सिखाना बंद कर देंगे कि बहुएं सेवा करने के लिए होती हैं, उसी दिन यह समाज सुधरेगा। तू मेरी बेटी है, इसका मतलब यह नहीं कि तू राजकुमारी है और वो दासी।”
सावित्री देवी ने गैस का लाइटर स्नेहा के हाथ में थमाया।
“अब जला इसे। और बना अपने लिए खाना। और याद रख, अगर आवाज़ आई या बर्तन खड़के, और रिया की नींद टूटी, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
स्नेहा की आँखों में आंसू आ गए। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, या शायद अपनी माँ के रौद्र रूप का डर था। उसने कांपते हाथों से गैस जलाई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।
सावित्री देवी वहीं दरवाजे पर खड़ी रहीं, पहरेदार की तरह।
दस मिनट बाद, स्नेहा ने गैस बंद कर दी। उसने न मैगी बनाई, न फ्राइड राइस। उसने एक गिलास में गर्म पानी लिया और फ्रिज से ठंडी पट्टियों का कटोरा निकाला।
वह धीरे-धीरे हॉल में गई। सावित्री देवी पीछे-पीछे थीं।
स्नेहा, रिया के पास सोफे पर बैठ गई। रिया ने घबराकर आँखें खोलीं।
“भाभी…” स्नेहा की आवाज़ भर्राई हुई थी। “सॉरी।”
रिया ने कुछ कहना चाहा, लेकिन स्नेहा ने उसे रोक दिया।
“माँ ने सही कहा भाभी। मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी। मुझे लगा कि आप तो बस… मतलब, आप तो मैनेज कर ही लोगी। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि आपको कैसा लग रहा होगा।”
स्नेहा ने ठंडे पानी में पट्टी भिगोई और रिया के तपते माथे पर रख दी। ठंडक मिलते ही रिया को सुकून मिला।
“आप सो जाओ भाभी। मैं यहीं बैठी हूँ। जब तक बुखार नहीं उतरता, मैं नहीं सोऊंगी। और भूख… भूख तो मिट गई मेरी,” स्नेहा ने शर्मिंदा होकर कहा।
सावित्री देवी दरवाजे पर खड़ी यह दृश्य देख रही थीं। उनके चेहरे का गुस्सा अब गायब हो चुका था। उसकी जगह एक संतोष ने ले ली थी। वह जानती थीं कि आज उन्होंने अपनी बेटी को जो सबक सिखाया है, वह किसी किताब में नहीं मिलता। वह सबक था—संवेदना का, इंसानियत का।
अगली सुबह जब रिया की आँख खुली, तो उसका बुखार उतर चुका था। उसने देखा कि स्नेहा सोफे के नीचे कालीन पर ही सिर रखकर सो गई थी और उसके हाथ में अभी भी पानी की पट्टी थी। पास ही टेबल पर एक नोट रखा था जो शायद सावित्री देवी ने रखा था।
उस पर लिखा था: *“रिया बेटा, आज रसोई में मत जाना। मैंने और स्नेहा ने मिलकर नाश्ता बना लिया है। आज तेरी छुट्टी है। और हाँ, अगर स्नेहा तंग करे, तो बस एक बार मुझे आवाज़ लगा देना।”*
रिया की आँखों में आंसू आ गए। उसे लगा जैसे आज उसका ससुराल सच में उसका ‘मायका’ बन गया है। उसने झुककर स्नेहा के सिर पर हाथ फेरा। स्नेहा नींद में ही मुस्कुरा दी।
उस दिन के बाद उस घर में कभी रात के अंधेरे में किसी बहू को चूल्हे के सामने नहीं जलना पड़ा। क्योंकि उस घर की सास ने समझ लिया था कि घर की लक्ष्मी को खुश रखकर ही घर स्वर्ग बन सकता है। और ननद ने समझ लिया था कि भाभी कोई दूसरी नहीं, बल्कि उसी का अक्स होती है—एक औरत, जिसे प्यार और सम्मान की उतनी ही जरूरत है जितनी किसी और को।
**समापन:**
दोस्तों, हम अक्सर अपने घरों में देखते हैं कि बहुओं से सुपरवूमन होने की उम्मीद की जाती है। उन्हें बीमार होने का, थकने का या ना कहने का हक़ नहीं दिया जाता। और दुख की बात यह है कि यह दबाव अक्सर घर की दूसरी औरतें ही डालती हैं। सावित्री देवी जैसी सास हर घर में होनी चाहिए जो सही और गलत का फर्क सिर्फ अपनी बेटी के नजरिए से न देखें, बल्कि इंसानियत के नजरिए से देखें। रिश्ते खून से नहीं, अहसास से बनते हैं।
**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके घर में भी बहुओं को बीमार होने पर आराम मिलता है या उनसे काम की उम्मीद की जाती है? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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