वो कोना जहाँ उजाला नहीं था

 अपनी हाई-प्रोफाइल पार्टी में पिता के पुराने कपड़े देखकर बेटे और बहू ने उन्हें स्टोर रूम में छिपा दिया, लेकिन जब शहर का सबसे बड़ा आदमी उस पार्टी में आया, तो उसने कुछ ऐसा किया जिसने उस आलीशान घर की नींव हिला दी।


दिवाली की रात थी। शहर की सबसे पॉश सोसायटी, ‘रॉयल रेजीडेंसी’ की 18वीं मंजिल पर फ्लैट नंबर 1804 रोशनी से नहाया हुआ था। लेकिन उस घर के अंदर जो अंधेरा पनप रहा था, उसे बाहर की झालरें नहीं मिटा पा रही थीं।


समीर और उसकी पत्नी नताशा ने आज एक ग्रैंड दिवाली पार्टी रखी थी। शहर के बड़े-बड़े बिजनेसमैन, समीर के बॉस, और नताशा की किटी पार्टी की सारी ‘हाई-क्लास’ सहेलियां आने वाली थीं। घर को इटालियन मार्बल और विदेशी फूलों से सजाया गया था।


लेकिन इस सजावट के बीच एक चीज़ थी जो नताशा की आँखों में खटक रही थी—समीर के पिता, दीनानाथ जी।


दीनानाथ जी गाँव से आए थे। सीधा-सादा धोती-कुर्ता, पैरों में हवाई चप्पल और हाथ में एक पुरानी लाठी। उनके चेहरे पर झुर्रियां थीं और आँखों में अपने बेटे से मिलने की चमक। वो कल ही आए थे, यह सोचकर कि दिवाली बेटे-बहू और पोते के साथ मनाएंगे।


शाम के 6 बज रहे थे। नताशा अपने डिज़ाइनर गाउन में तैयार होकर ड्राइंग रूम का जायजा ले रही थी। तभी दीनानाथ जी अपने कमरे से बाहर आए। उन्होंने एक धुला हुआ लेकिन पुराना कुर्ता पहना था।


“बहू, मैं यहाँ सोफे पर बैठ जाऊँ? अंदर जी घबरा रहा है,” दीनानाथ जी ने संकोच से पूछा।


नताशा की त्योरियां चढ़ गईं। उसने समीर को आवाज़ दी, जो अभी टाई लगा रहा था।


“समीर! ज़रा इधर आना!”


समीर बाहर आया। नताशा उसे कोने में ले गई और फुसफुसाते हुए, लेकिन सख्ती से बोली, “समीर, मिस्टर मल्होत्रा और उनकी वाइफ आने वाले हैं। तुम्हें पता है न वो कितने क्लास-कॉन्शियस हैं? अगर उन्होंने तुम्हारे पापा को इस हाल में, इन पुराने कपडों में बीच ड्राइंग रूम में बैठे देखा, तो हमारा क्या इम्प्रेशन पड़ेगा? मेरी तो नाक कट जाएगी सोसायटी में!”


समीर ने पिता की ओर देखा। उसे भी लगा कि पिताजी का हुलिया उसकी मॉडर्न पार्टी के साथ ‘मैच’ नहीं कर रहा।


“तो क्या करूँ नताशा? अब उन्हें घर से बाहर तो नहीं निकाल सकता न?” समीर ने झुंझलाते हुए कहा।


“बाहर नहीं, पर अंदर तो कर सकते हो,” नताशा ने एक उपाय सुझाया। “किचन के पीछे जो छोटा स्टोर रूम है, जिसे हमने सर्वेंट क्वार्टर बना रखा है पर अभी खाली है… पापा जी को वहां शिफ्ट कर दो आज रात के लिए। कह देना कि बाहर बहुत शोर होगा, एसी भी तेज चलेगा जिससे उन्हें ठंड लग सकती है। वहां वो आराम से रहेंगे। मैं खाना वहीं भिजवा दूँगी।”


समीर का दिल एक पल के लिए कांपा। वो स्टोर रूम बमुश्किल 6 बाई 6 का था। उसमें पुराने अखबारों के रद्दी, वैक्यूम क्लीनर और टूटी कुर्सियां रखी थीं। क्या अपने पिता को, जिन्होंने खेत बेचकर उसे इंजीनियर बनाया, वहां रखना सही है?


लेकिन फिर उसे मिस्टर मल्होत्रा का चेहरा याद आया, अपनी प्रमोशन याद आई। उसने अपने ज़मीर का गला घोंट दिया।


समीर, दीनानाथ जी के पास गया।


“पापा,” समीर ने नज़रें चुराते हुए कहा, “वो… आज बहुत बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं। शराब भी चलेगी, शोर-शराबा होगा। आप तो पूजा-पाठ वाले आदमी हैं, आपको असहज लगेगा। और यहाँ एसी बहुत तेज़ रहेगा, आपकी पुरानी खाँसी फिर शुरू हो जाएगी।”


दीनानाथ जी ने बेटे की आँखों में देखा। वो अनपढ़ नहीं थे, वो बाप थे। वो बेटे की मजबूरी और बहू की नफरत, दोनों को एक पल में पढ़ गए।


“तो मुझे क्या करना चाहिए बेटा?” उन्होंने शांत स्वर में पूछा।


“आप… आप उस पीछे वाले कमरे में आराम कर लीजिये। वो शांत है। मैं वहीं खाना भिजवा दूँगी,” नताशा ने जल्दी से बात काटी।


दीनानाथ जी की आँखों की चमक बुझ गई। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और धीरे से बोले, “ठीक है बेटा। तेरी खुशी में ही मेरी खुशी है। मैं वहीं बैठ जाऊँगा।”


दीनानाथ जी उस छोटे, बिना खिड़की वाले स्टोर रूम में चले गए। वहां एक टूटी हुई प्लास्टिक की कुर्सी थी। वो उसी पर बैठ गए। बाहर से दरवाजा बंद कर दिया गया। जैसे किसी पुरानी, बेकार चीज़ को कबाड़खाने में डाल दिया गया हो।


थोड़ी देर में पार्टी शुरू हुई। महंगे इत्र की खुशबू, व्हिस्की के गिलासों के टकराने की आवाज़ और झूठी हंसी के ठहाके गूंजने लगे। वेटर चांदी की ट्रे में कबाब लेकर घूम रहे थे।


स्टोर रूम के अंदर, दीनानाथ जी अपनी जेब से एक छोटी सी डिब्बी निकालकर देख रहे थे। उसमें एक सोने की अंगूठी थी जो वो अपने पोते आरव के लिए लाए थे। अपनी पत्नी की आखिरी निशानी बेचकर बनवाई थी। उन्होंने सोचा था कि पार्टी में सबके सामने पोते को पहनाएंगे। लेकिन अब वो अंधेरे में बैठे आँसू पोंछ रहे थे।


तभी पार्टी में एक हलचल हुई। शहर के सबसे बड़े समाजसेवी और बिजनेस टाइकून, सर जे.के. सिंघानिया पधारे थे। समीर की कंपनी को उनका बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिलने वाला था। समीर और नताशा दौड़कर उनके स्वागत के लिए गए।


“वेलकम सर! आपने आकर हमारे घर की शोभा बढ़ा दी,” समीर ने झुककर हाथ मिलाया।


जे.के. सिंघानिया एक बहुत ही ज़मीन से जुड़े व्यक्ति थे। उन्होंने मुस्कुराकर सबका अभिवादन स्वीकार किया। पार्टी अपने शबाब पर थी। थोड़ी देर बाद जे.के. सिंघानिया को एक ज़रूरी कॉल आया। शोर बहुत ज़्यादा था।


“समीर, कहीं कोई शांत जगह है? मुझे एक बहुत ज़रूरी कॉल लेनी है,” सिंघानिया ने पूछा।


समीर हड़बड़ा गया। बेडरूम में लेडीज थीं, बालकनी में स्मोकिंग चल रही थी।


“सर, आप… आप इधर आ जाइये,” समीर उन्हें किचन की तरफ ले गया। उसे याद ही नहीं रहा कि स्टोर रूम पास में ही है।


सिंघानिया किचन के पास खड़े होकर बात करने लगे। तभी उनकी नज़र आधे खुले स्टोर रूम के दरवाजे पर पड़ी। अंदर एक बूढ़ा व्यक्ति, सिकुड़कर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था, हाथ में एक छोटी सी डिब्बी थी।


सिंघानिया की फोन पर बात रुक गई। उन्होंने गौर से देखा। वो चेहरा… वो चमक… उन्हें कुछ याद आया। वो कॉल होल्ड पर रखकर स्टोर रूम की तरफ बढ़े।


समीर ने जब उन्हें उधर जाते देखा तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वो दौड़कर आया।


“सर… सर, उधर मत जाइये। वो… वो बस एक…” समीर बोलने ही वाला था कि ‘फालतू सामान है’ या ‘नौकर है’, लेकिन शब्द गले में अटक गए।


सिंघानिया स्टोर रूम का दरवाजा पूरा खोल चुके थे। दीनानाथ जी ने घबराकर सिर उठाया।


सिंघानिया एक पल के लिए ठिठके, और फिर अचानक झुककर दीनानाथ जी के पैरों में गिर पड़े।


पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। नताशा का वाइन का ग्लास हाथ से छूटकर गिर गया। समीर पत्थर की मूरत बन गया। शहर का सबसे अमीर आदमी, एक ‘फालतू’ बूढ़े के पैरों में?


“मास्टर जी? आप?” सिंघानिया की आवाज़ भर्राई हुई थी। “आप यहाँ? इस कोठरी में?”


दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक करते हुए गौर से देखा। “जुगनू? तुम?”


सिंघानिया ने दीनानाथ जी का हाथ अपने माथे से लगाया। “हाँ सर, आपका जुगनू। आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। अगर आपने उस दिन मेरी स्कूल फीस न भरी होती और मुझे गणित न पढ़ाया होता, तो मैं आज भी सड़कों पर भीख मांग रहा होता। सर, मैंने आपको कितना ढूंढा गांव में, पता चला आप शहर आ गए हैं।”


सिंघानिया की आँखों में आँसू थे। वो मुड़े और समीर की तरफ देखा। उनकी आँखों में अब सम्मान नहीं, अंगारे थे।


“ये… ये तुम्हारे पिता हैं समीर?” सिंघानिया ने कड़क आवाज़ में पूछा।


समीर का गला सूख चुका था। “जी… जी सर।”


“और तुमने… तुमने मेरे गुरु, एक विद्वान, एक देवता समान इंसान को इस कबाड़खाने में बैठा रखा है? क्यों? क्योंकि इनके कपड़े तुम्हारे सोफे से मैच नहीं करते?” सिंघानिया ने चारों तरफ फैली चकाचौंध को हिकारत से देखा। “लानत है ऐसी अमीरी पर समीर। जिस बाप ने तुम्हें इस काबिल बनाया कि तुम ये फ्लैट खरीद सको, आज उसी बाप के लिए तुम्हारे घर में जगह नहीं है?”


सिंघानिया ने दीनानाथ जी का हाथ पकड़ा। “सर, चलिए। यह जगह आपके लायक नहीं है। मेरा घर, मेरी गाड़ियां, सब आपका है। आप मेरे साथ चलिए। वहां आपको वो सम्मान मिलेगा जिसके आप हकदार हैं।”


दीनानाथ जी ने प्यार से सिंघानिया के सिर पर हाथ फेरा, फिर समीर की तरफ देखा। समीर और नताशा सर झुकाए खड़े थे। पूरे समाज के सामने उनकी इज्जत की धज्जियां उड़ चुकी थीं। जिसे वो छिपाना चाहते थे, वही उनकी सबसे बड़ी शर्मिंदगी बन गया था।


“नहीं जुगनू,” दीनानाथ जी ने शांत भाव से कहा। “बेटा तो मेरा यही है। खून तो यही है। गलती इसकी नहीं, मेरी है। मैं भूल गया था कि पेड़ जब बहुत ऊंचे हो जाते हैं, तो अपनी जड़ों को ही ज़मीन के नीचे दबा देते हैं ताकि वो दिखाई न दें।”


दीनानाथ जी ने वो छोटी डिब्बी समीर के हाथ में रख दी।


“यह आरव के लिए है बेटा। और हाँ, नताशा बहू, चिंता मत करना। मैं जा रहा हूँ। मेरे लिए मेरा गाँव ही सही है। वहां बिजली भले ही कम आती हो, लेकिन रिश्तों में इतना अंधेरा नहीं होता।”


दीनानाथ जी ने अपनी लाठी उठाई और दरवाजे की तरफ बढ़ गए।


“पापा! पापा प्लीज रुक जाइये! मुझसे गलती हो गई!” समीर रोते हुए उनके पीछे भागा। नताशा भी रो रही थी।


लेकिन दीनानाथ जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो लिफ्ट में चले गए।


जे.के. सिंघानिया ने समीर को एक विजिटिंग कार्ड दिया और कहा, “समीर, प्रोजेक्ट तो भूल जाओ। जिस इंसान को अपनी जड़ों की कद्र नहीं, वो मेरी कंपनी की नींव क्या संभालेगा? तुमने आज सिर्फ एक पिता नहीं खोया, अपना भविष्य भी खो दिया।”


सिंघानिया चले गए। मेहमान भी कानाफूसी करते हुए निकलने लगे।


समीर और नताशा उस आलीशान, सजे-धजे, लेकिन एकदम खाली घर में अकेले रह गए। स्टोर रूम का दरवाजा अब भी खुला था, जैसे मुँह चिढ़ा रहा हो कि असली कबाड़ कमरे के अंदर नहीं, बल्कि इस घर के मालिकों के दिलों में भरा था।


दीनानाथ जी वापस गांव चले गए। उन्होंने फिर कभी शहर का रुख नहीं किया। समीर ने कई बार माफी मांगी, फोन किए, लेकिन वो रिश्ता, वो विश्वास जो उस रात स्टोर रूम के अंधेरे में टूटा था, वो फिर कभी नहीं जुड़ पाया। क्योंकि कांच और विश्वास, जब टूटते हैं तो चुभते ही हैं, जुड़ते नहीं।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी किसी एक समीर या नताशा की नहीं है। यह आज के उस मॉडर्न समाज की कड़वी सच्चाई है जहाँ हम 'स्टेटस' के नाम पर अपनों को ही पराया कर देते हैं। हमारे पास मेहमानों के लिए ड्राइंग रूम है, जूतों के लिए रैक है, कुत्तों के लिए अलग बिस्तर है, लेकिन बूढ़े माँ-बाप के लिए दिल में जगह नहीं है। याद रखिये, आप अपने बच्चों को जो सिखा रहे हैं, कल वही आपके साथ भी होगा। जो आज स्टोर रूम में हैं, कल वो आप भी हो सकते हैं।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपने कभी अपनी झूठी शान के लिए अपनों को नजरअंदाज किया है? या कभी ऐसा होते देखा है? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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**अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल पर दस्तक दी, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें ताकि किसी और बुजुर्ग को 'स्टोर रूम' या 'किचन' में न सोना पड़े। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही दिल को झकझोर देने वाली कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।**


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