काजू की बर्फी

 क्या एक सास की दोहरी मानसिकता उसकी अपनी ही बेटी के वैवाहिक जीवन में तूफ़ान ला सकती है? जब ‘मेहमान’ के नाम पर घर में भेदभाव होता है, तो किस्मत ऐसा तमाचा मारती है जिसकी गूंज बरसों तक सुनाई देती है।


दोपहर के तीन बज रहे थे। लखनऊ के गोमती नगर में स्थित ‘त्रिवेदी निवास’ में सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे अचानक रसोई से आती बर्तनों की खड़खड़ाहट और सरला देवी की तीखी आवाज़ ने तोड़ दिया।


“अरे बहु! ये क्या लिस्ट थमा दी मेरे हाथ में?” सरला देवी ने एक कागज का टुकड़ा हवा में लहराते हुए कहा। उनकी आँखों में गुस्सा और कंजूसी का मिला-जुला भाव था। सामने उनकी बहू, मानसी, सिर झुकाए खड़ी थी।


मानसी ने धीरे से कहा, “माँ जी, वो शाम को मेहमान आने वाले हैं ना… आपने ही तो कहा था कि कुछ खास लोग हैं, तो मैंने सोचा कि नाश्ते में थोड़ी वैरायटी हो जाएगी। समोसे, कचौड़ी, गुलाबजामुन, और थोड़ा नमकीन…”


“चुप कर!” सरला देवी ने उसकी बात काटते हुए डांटा। “तेरे मायके में पेड़ पर पैसे उगते होंगे, यहाँ त्रिवेदी सदन में हम मेहनत की कमाई खाते हैं। इतनी फिज़ूलखर्ची? दस तरह की मिठाई और पकवान? अरे, मेहमान ही तो आ रहे हैं, कोई बाराती थोड़ी आ रहे हैं। और सुन, मुझे पता है तेरे दिमाग में क्या चल रहा है। तू सोच रही है कि तेरे वो दूर के मामा-मामी आ रहे हैं तो उनकी आवभगत में लुटा दे सब कुछ? खबरदार जो एक भी पैसा एक्स्ट्रा खर्च किया तो।”


मानसी ने सफाई देने की कोशिश की, “नहीं माँ जी, वो मामा जी नहीं…”


“बस-बस, ज्यादा जुबान मत चला,” सरला देवी सोफे पर धम्म से बैठ गईं और टीवी का रिमोट उठा लिया। “देख मानसी, साफ बात है। चाय बनेगी, और डब्बे में वो बिस्कुट रखे हैं—मैरी गोल्ड वाले, वो प्लेट में सजा देना। और अगर ज्यादा मन हो तो थोड़े पोहे बना देना। बस! उससे ज्यादा एक पैसा खर्च नहीं होगा। आदत बिगाड़ रखी है तूने अपने रिश्तेदारों की। जब देखो मुँह उठाए चले आते हैं और यहाँ दावतें उड़ती हैं।”


मानसी की आँखों में आँसू तैर गए। उसने कुछ कहना चाहा, बताना चाहा कि फोन किसका आया था, लेकिन सरला देवी ने टीवी की आवाज़ तेज़ कर दी। यह रोज की कहानी थी। सरला देवी का एक ही उसूल था—बहू के मायके वाले आएं तो ‘पानी’ भी गिनकर पिलाओ, और अगर अपनी बेटी (मानसी की ननद) शिखा के ससुराल वाले आएं, तो छप्पन भोग सजा दो।


मानसी चुपचाप रसोई में लौट गई। उसका मन भारी था। उसे पता था कि आज शाम को क्या होने वाला है, लेकिन सास के आगे बोलने की हिम्मत उसमें नहीं थी। उसने चाय का पानी चढ़ाया और डब्बे से सीले हुए बिस्कुट निकालकर प्लेट में रखने लगी। उसे अंदर ही अंदर घबराहट हो रही थी।


शाम के पांच बजे।


सूरज ढलने को था। सरला देवी अपनी पुरानी साड़ी में ही थीं, बाल भी ठीक से नहीं बनाए थे। वो निश्चिंत थीं। उनके दिमाग में यही था कि मानसी के कोई साधारण रिश्तेदार आ रहे होंगे, जिनसे उन्हें कोई खास मतलब नहीं था। वो तो अंदर ही अंदर योजना बना रही थीं कि कैसे मेहमानों के सामने मानसी को दो-चार बातें सुनाएंगी कि “देखो, मेरी बहू घर का काम ठीक से नहीं करती।”


तभी बाहर एक बड़ी गाड़ी रुकने की आवाज़ आई। हॉर्न बजा।


“जा बहु, देख कौन आया है। तेरे वाले ही होंगे, ऑटो-रिक्शा नहीं मिला होगा तो टैक्सी कर ली होगी,” सरला देवी ने ताना मारा।


मानसी ने दरवाजा खोला।


सामने का नज़ारा देखकर सरला देवी के हाथ से रिमोट छूटकर गिर गया।


दरवाजे पर कोई और नहीं, बल्कि उनकी अपनी बेटी शिखा, उसके पति रमन, और सबसे बड़ी बात—शिखा की सास, मिसेज मल्होत्रा खड़ी थीं। मिसेज मल्होत्रा शहर की जानी-मानी हस्ती थीं, बेहद अमीर और रसूखदार। सरला देवी हमेशा उनके सामने अपनी नाक ऊंची रखने के लिए झूठ बोलती थीं कि उनका घर भी किसी राजमहल से कम नहीं है।


“अरे समधन जी! आप?” सरला देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह हड़बड़ा कर उठीं। उन्होंने अपनी साड़ी ठीक की, पल्लू सिर पर रखा। उनके चेहरे का रंग ऐसे उड़ा जैसे किसी ने हल्दी पोत दी हो।


मिसेज मल्होत्रा ने अपनी भारी कांजीवरम साड़ी को संभालते हुए, कृत्रिम मुस्कान के साथ अंदर कदम रखा। “नमस्ते सरला जी। हम बस इधर से गुजर रहे थे, तो शिखा ने कहा कि माँ के हाथ की चाय पिए बहुत दिन हो गए। और वैसे भी, आपने पिछली बार कहा था कि जब भी हम आएंगे, आप अपने हाथों से वो खास समोसे और रसमलाई खिलाएंगी। तो बस, चले आए सरप्राइज देने।”


सरला देवी का गला सूख गया। ‘समोसे और रसमलाई’? यहाँ तो रसोई में बिस्कुट के सिवा चूहा मारने की दवा भी नहीं थी।


“आ… आइए-आइए, बैठिए,” सरला देवी की आवाज़ कांप रही थी। उन्होंने कनखियों से मानसी को देखा। मानसी दरवाजे के पास खड़ी थी, चेहरे पर वही शांत भाव था।


सब लोग सोफे पर बैठ गए। शिखा ने माँ को गले लगाया, लेकिन सरला देवी का ध्यान सिर्फ रसोई की तरफ था।


“मानसी!” सरला देवी ने आवाज़ लगाई, कोशिश की कि आवाज़ में मिठास हो, पर घबराहट साफ झलक रही थी। “बेटा, मेहमान आए हैं। जल्दी से नाश्ता ले आओ।”


फिर वो मानसी के पास रसोई के दरवाजे तक गईं और फुसफुसाते हुए, दाँत पीसकर बोलीं, “जल्दी जा, दौड़कर जा! बाजार से समोसे, काजू कतली, ढोकला… जो मिले ले आ। नौकर को भेज दे।”


मानसी ने अपनी सास की आँखों में देखा और धीमे स्वर में कहा, “माँ जी, नौकर तो आप ही ने छुट्टी पर भेज दिया था कि ‘मेहमानों के लिए खर्चा बचेगा’। और बाजार जाने में कम से कम आधा घंटा लगेगा। ट्रैफिक बहुत है।”


“तो मैं क्या करूँ?” सरला देवी पसीने-पसीने हो गईं। “मेरी नाक कट जाएगी मानसी! कुछ तो कर। फ्रिज में कुछ है?”


“सिर्फ दूध और वो बिस्कुट, जो आपने निकाले थे,” मानसी ने सपाट जवाब दिया।


ड्राइंग रूम से मिसेज मल्होत्रा की आवाज़ आई, “अरे सरला जी, कहाँ रह गईं? बातें नहीं करेंगी हमसे?”


सरला देवी को मरता क्या न करता, वापस लौटना पड़ा। वो आकर सोफे पर बैठ गईं, लेकिन उनकी धड़कनें किसी रेलगाड़ी की तरह भाग रही थीं।


पाँच मिनट बाद मानसी ट्रे लेकर आई।


स्टील की ट्रे में पानी के गिलास, चीनी मिट्टी के कपों में चाय, और बीच में एक छोटी सी प्लेट जिसमें ‘मैरी गोल्ड’ के चार बिस्कुट और दो रस्क रखे थे।


कमरे में सन्नाटा छा गया।


मिसेज मल्होत्रा ने प्लेट को देखा, फिर चाय को, और फिर सरला देवी को। उनकी आँखों में अविश्वास था। जिस सरला देवी ने उनकी शादी की सालगिरह पर बड़ी-बड़ी बातें की थीं कि “हम तो मेहमानों को चांदी की थाली में छप्पन भोग खिलाते हैं”, आज वो सूखी चाय और मरीजों वाले बिस्कुट परोस रही थीं?


शिखा का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा। “माँ? ये क्या है? आपके घर में नमकीन भी नहीं है? सासू माँ को शुगर है, वो बिस्कुट नहीं खातीं। मैंने फोन करके मानसी भाभी को इशारा भी किया था कि हम आ रहे हैं।”


सरला देवी को काटो तो खून नहीं। “फोन? मानसी को?”


मानसी ने चाय का कप मिसेज मल्होत्रा को पकड़ाते हुए बहुत विनम्रता से कहा, “जी ननद जी, आपका फोन आया था। मैंने माँ जी को बताया भी था कि ‘खास मेहमान’ आ रहे हैं। मैंने लिस्ट भी बनाई थी—समोसे, कचौड़ी, रसमलाई की। लेकिन माँ जी ने कहा कि…” मानसी एक पल के लिए रुकी।


कमरे में सबकी साँसें अटक गईं। सरला देवी की आँखों में याचना थी कि ‘चुप रह जा बहु’।


लेकिन मानसी ने अपनी बात पूरी की, “माँ जी ने कहा कि मेहमानों की आदत नहीं बिगाड़नी चाहिए। फिज़ूलखर्ची करने की जरूरत नहीं है, चाय और बिस्कुट काफी हैं। मुझे लगा शायद माँ जी को पता होगा कि आप लोग सादगी पसंद करते हैं।”


तीर कमान से निकल चुका था और सीधा निशाने पर लगा था।


मिसेज मल्होत्रा ने चाय का कप टेबल पर वापस रख दिया। बिना पिए।


“वाह सरला जी,” मिसेज मल्होत्रा की आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक थी। “सादगी और कंजूसी में फर्क होता है। और मेहमानों की कद्र करना संस्कारों में होता है। हमें नहीं पता था कि हम आपके लिए ‘फिज़ूलखर्ची’ हैं। अगर पता होता कि हमारे आने से आपके राशन का बजट बिगड़ जाएगा, तो हम होटल में खाकर आते।”


“नहीं-नहीं, समधन जी, आप गलत समझ रही हैं…” सरला देवी गिड़गिड़ाईं। “वो… वो मुझे लगा कि मानसी के मायके वाले…”


बोलते-बोलते सरला देवी की जुबान लड़खड़ा गई। उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी।


मिसेज मल्होत्रा हँसीं, एक तीखी और व्यंग्यात्मक हँसी। “ओह! तो ये इंतजाम बहू के मायके वालों के लिए था? मतलब अगर बहू के रिश्तेदार आएं तो सूखा बिस्कुट, और अगर बेटी के ससुराल वाले आएं तो काजू कतली? सरला जी, दोहरे पैमाने तो मैंने बहुत देखे हैं, लेकिन इतना गिरा हुआ व्यवहार पहली बार देख रही हूँ।”


शिखा भी अब गुस्से में खड़ी हो गई। “माँ, मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी। आप हमेशा कहती थीं कि मानसी भाभी को आप अपनी बेटी मानती हैं। क्या अपनी बेटी के घर आए मेहमानों का स्वागत आप ऐसे करती हैं? आज आपने मेरी ससुराल में मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी।”


रमन ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा। “चलो शिखा। यहाँ हमारा सम्मान नहीं है। और सरला आंटी, इज्जत पैसे खर्च करने से नहीं, मन बड़ा करने से मिलती है।”


मेहमान बिना चाय पिए उठकर चले गए। गाड़ियों के दरवाज़े बंद होने की आवाज़ किसी धमाके जैसी लगी।


सरला देवी सोफे पर बुत बनकर बैठी थीं। उनकी आँखों से टप-टप आंसू गिर रहे थे। शर्म, अपमान और पछतावे के आंसू।


मानसी ने धीरे से खाली कप और बिस्कुट की प्लेट उठाई।


“माँ जी,” मानसी ने कहा। सरला देवी ने नज़रें उठाकर उसे देखा। आज सास की आँखों में वो रोब नहीं था, सिर्फ हार थी।


“रिश्ते, चाहे बहू के पीहर के हों या बेटी के ससुराल के… उनका वजन तराजू पर नहीं तौला जाता,” मानसी ने बहुत संयत स्वर में कहा। “जब मैंने आपसे कहा था कि ‘मेहमान’ आ रहे हैं, तो आपने यह क्यों मान लिया कि वो ‘गैर’ हैं? अगर आप उस वक्त सिर्फ ‘अतिथि’ समझकर स्वागत की तैयारी करतीं, तो आज यह दिन न देखना पड़ता। वो दस समोसे और आधा किलो बर्फी की कीमत आपकी इज्जत से ज्यादा तो नहीं थी ना?”


सरला देवी का सिर शर्म से झुक गया। आज उनके पास कोई जवाब नहीं था। उनकी कंजूसी और भेदभाव ने आज उन्हें अपनी ही बेटी की नज़रों में गिरा दिया था।


उस शाम, त्रिवेदी निवास में खाना नहीं बना। लेकिन उस सन्नाटे में सरला देवी को एक बहुत बड़ी सीख मिल चुकी थी। उन्होंने मानसी का हाथ पकड़ा।


“मुझे माफ़ कर दे बहु,” उनकी आवाज़ भर्राई हुई थी। “आज मेरी आँखों पर पड़ी पट्टी खुल गई। मैंने हमेशा ‘तेरे’ और ‘मेरे’ रिश्तों में फर्क किया, और भगवान ने आज मुझे उसी फर्क के जाल में फंसा दिया। आज मेरी बेटी भूखी गई, तो मुझे समझ आया कि जब तेरे भाई-बाप आते थे और मैं उन्हें चाय-बिस्कुट देती थी, तो तुझे कैसा लगता होगा।”


मानसी ने सास के कंधे पर हाथ रखा। “माँ जी, सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। बस अब से इस घर का दरवाजा हर मेहमान के लिए बराबर खुले, चाहे वो अमीर हो या गरीब, मेरे मायके का हो या आपकी बेटी के ससुराल का।”


अगले दिन रविवार था। सुबह-सुबह मानसी के पिताजी का फोन आया कि वो मिलने आ रहे हैं। सरला देवी रसोई में थीं।


“मानसी!” सरला देवी ने आवाज़ लगाई।


मानसी डरते-डरते आई। “जी माँ जी?”


“तेरे पिताजी आ रहे हैं ना? सुन, हलवाई की दुकान खुलने ही वाली होगी। जा, ताजे समोसे और जलेबी ले आ। और हाँ, खीर मैं खुद बनाऊँगी, समधी जी को मेरे हाथ की खीर बहुत पसंद है।”


मानसी मुस्कुरा दी। आज घर की फिज़ा बदल चुकी थी। उस एक शर्मनाक शाम ने बरसों पुराने जंग लगे रिश्तों को मांज कर चमका दिया था।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहमान भगवान का रूप होते हैं, और भगवान के साथ भेदभाव नहीं किया जाता। हम अक्सर अपनी बेटियों के ससुराल वालों के लिए तो पलकें बिछा देते हैं, लेकिन घर में आई बहू के माता-पिता को वो सम्मान देना भूल जाते हैं जिसके वो हकदार हैं। याद रखिये, सम्मान एक बूमरैंग (लौटकर आने वाले हथियार) की तरह होता है—आप जो दूसरों को देंगे, वही घूमकर आपके पास वापस आएगा। एक छोटी सी सोच बदलने से घर स्वर्ग बन सकता है।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके साथ या आपके आसपास भी कभी ऐसा हुआ है कि मायके और ससुराल के मेहमानों में फर्क किया गया हो? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।


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