झूठी शान की दीवारें और प्यार का आंगन

 श्रेया आईने के सामने खड़ी अपनी परछाई को निहार रही थी। आज उसने वही लाल रंग का सलवार सूट पहना था, जो रोहन को बहुत पसंद था। शादी के बाद उसने अपना हेयरस्टाइल भी बदल लिया था, जो उसके चेहरे पर एक नई चमक और आत्मविश्वास बिखेर रहा था। उसके गले में सुहाग की निशानी के तौर पर कोई भारी-भरकम मंगलसूत्र नहीं था, बल्कि उसकी जगह एक बेहद साधारण सा, पतले मोतियों और सोने की चेन वाला नेकलेस चमक रहा था। रोहन का मानना था कि प्यार और रिश्ते की गहराई दिलों में होती है, गले में लदे भारी गहनों में नहीं। श्रेया की आँखों में आज एक अजीब सी नमी थी। शादी को छः महीने बीत चुके थे, लेकिन मायके की यादों का वो धुंधला सा पर्दा आज भी उसकी आँखों से हटा नहीं था।

रोहन के घर में श्रेया को कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि वह एक बहू है। रोहन की माँ, सरला जी, सुबह उठते ही सबसे पहले श्रेया के लिए चाय बनाती थीं। ससुर जी उसे अपनी बेटी से भी बढ़कर लाड़ करते थे। रोहन एक बहुत ही सुलझा हुआ, पढ़ा-लिखा और प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाला नौजवान था। उसने श्रेया को वो हर खुशी दी थी, जिसका सपना कोई भी लड़की अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के लिए देखती है। लेकिन इस खुशहाल आँगन के बाहर, श्रेया की ज़िंदगी का एक पन्ना ऐसा था, जिसे याद करते ही उसके दिल में हज़ारों सुइयां चुभने लगती थीं। वह पन्ना था उसके अपने माता-पिता का, जिन्होंने उसे जीते-जी अपने लिए मार दिया था।

श्रेया के पिता, ठाकुर भवानी सिंह, अपने शहर के एक रसूखदार इंसान थे। उनके लिए उनका रुतबा, उनकी जाति और समाज में उनकी नाक ही उनका भगवान था। जब श्रेया ने पहली बार डरते-डरते उन्हें रोहन के बारे में बताया था, तो हवेली में जैसे कोई भूचाल आ गया था। रोहन में कोई कमी नहीं थी। वह संस्कारी था, ऊंचे ओहदे पर था और सबसे बड़ी बात, वह श्रेया को अपनी पलकों पर बिठाकर रखता था। लेकिन भवानी सिंह के लिए रोहन की सबसे बड़ी 'खामी' यह थी कि वह उनकी जाति का नहीं था।

"मेरी बेटी होकर तूने एक दूसरी जात के लड़के को अपना दिल दे दिया? इससे अच्छा तो मैं तुझे जहर दे देता!" भवानी सिंह के वो कड़वे शब्द आज भी श्रेया के कानों में गूंजते थे। श्रेया ने बहुत मिन्नतें की थीं। रोहन के पिता खुद चलकर भवानी सिंह के दरवाज़े पर गए थे और अपनी पगड़ी उनके पैरों में रख दी थी। उन्होंने कहा था कि वे श्रेया को अपनी पलकों पर रखेंगे, लेकिन भवानी सिंह के सिर पर तो झूठी शान का भूत सवार था। उन्होंने रोहन के पिता का तिरस्कार करके उन्हें घर से निकाल दिया था।

अंततः श्रेया को वो कदम उठाना पड़ा, जो कोई भी बेटी कभी नहीं उठाना चाहती। उसने रोहन का हाथ थाम लिया। रोहन के परिवार ने इस प्रेम विवाह को बहुत ही खुशी-खुशी और पूरे सम्मान के साथ अपनी स्वीकृति दी। उन्होंने श्रेया का इस तरह स्वागत किया जैसे उनके घर में साक्षात लक्ष्मी आ गई हो। लेकिन भवानी सिंह ने उसी दिन श्रेया के नाम का श्राद्ध कर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी, देवकी को भी कसम दे दी कि अगर उसने अपनी बेटी से कोई संपर्क रखा, तो वह उनका मरा मुंह देखेगी।

श्रेया की माँ, देवकी, जो हमेशा से अपने पति के आदेशों की गुलाम रहीं, उस दिन भी सिर्फ एक कोने में खड़ी होकर आँसू बहाती रही थीं। देवकी ने छुपकर एक दिन श्रेया को फोन किया था और रोते हुए कहा था, "मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। तेरे बाबूजी की जिद के आगे मेरा मातृत्व हार गया। तू जहाँ भी रहना, खुश रहना।" वो फोन कॉल श्रेया के लिए किसी गहरे घाव पर नमक की तरह था।

एक तरफ वो परिवार था जिसने उसे जन्म दिया, लेकिन जाति की झूठी दीवार के खातिर उसे बेगाना कर दिया। और दूसरी तरफ वो परिवार था जिसने उसे न जन्म दिया, न ही उनके खून का कोई रिश्ता था, लेकिन उन्होंने उसे अपना सर्वस्व मान लिया था। समाज की ये कैसी विडंबना है? हम पढ़-लिख गए हैं, बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर ली हैं, लेकिन जब बात शादी-ब्याह की आती है, तो आज भी हमारी सोच सदियों पुरानी उसी संकीर्ण मानसिकता में जाकर कैद हो जाती है। भवानी सिंह जैसे लोग समाज में कोई अपवाद नहीं हैं। ऐसे हज़ारों परिवार हैं जो अपनी झूठी शान की वेदी पर अपने ही बच्चों की खुशियों की बलि चढ़ा देते हैं। वे यह नहीं देखते कि जिस लड़के को वे नकार रहे हैं, वह उनकी बेटी को रानी बनाकर रखेगा। वे सिर्फ यह देखते हैं कि समाज क्या कहेगा।

आज दीवाली का दिन था। रोहन के घर में दीपों की जगमगाहट थी, लेकिन श्रेया का मन बार-बार अपने मायके की उस हवेली की तरफ भाग रहा था। क्या वे भी आज रो रही होंगी? क्या बाबूजी का दिल एक बार भी अपनी लाडली के लिए नहीं पसीजा होगा? ये सवाल उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहे थे। तभी रोहन पीछे से आया और उसने श्रेया के कंधों पर हाथ रख दिया।

"रो रही हो?" रोहन ने प्यार से उसके आँसू पोंछते हुए पूछा। "मैं जानता हूँ श्रेया, तुम आज उन्हें बहुत याद कर रही हो। लेकिन तुम खुद सोचो, क्या वो प्यार सच्चा होता है जो जातियों के तराजू में तौला जाए? तुम्हारे बाबूजी को यह समझना चाहिए था कि इंसान की पहचान उसके कर्मों से, उसकी शिक्षा और उसके व्यवहार से होती है, उसकी जाति से नहीं। मैंने तुम्हें तुम्हारी जाति देखकर प्यार नहीं किया था, मैंने तुम्हारी रूह से प्यार किया था।"

श्रेया ने रोहन के सीने पर सिर रख दिया। उसे अहसास हुआ कि रोहन बिल्कुल सही कह रहा है। जिस समाज और जिस जाति के डर से उसके पिता ने उसे ठुकरा दिया, क्या वो समाज उनके बुढ़ापे में उनके आंसू पोंछने आएगा? क्या वो झूठी शान उन्हें वो खुशी दे पाएगी, जो एक बेटी की किलकारी उनके घर में देती थी? आज के इस आधुनिक युग में, जहाँ लोग चाँद पर पहुँच रहे हैं, वहीं कुछ लोग आज भी जाति-पाति की उन सड़ी-गली बेड़ियों में जकड़े हुए हैं जो सिर्फ घर तोड़ना जानती हैं।

श्रेया ने एक गहरी साँस ली और अपने मन को शांत किया। उसने तय किया कि वह अब उन लोगों के लिए अपने आंसू नहीं बहाएगी, जिन्होंने उसके प्यार और रोहन जैसे हीरे की कद्र नहीं की। वह खुशकिस्मत है कि उसे एक ऐसा परिवार मिला है जहाँ इंसानियत को जाति से ऊपर रखा जाता है। जहाँ एक बहू को बेटी का दर्जा दिया जाता है। शायद किसी दिन भवानी सिंह के अहंकार की बर्फ पिघलेगी और उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा। और अगर ऐसा नहीं भी हुआ, तो भी श्रेया अपने इस नए आँगन में, जहाँ सिर्फ प्यार और सम्मान है, अपनी एक नई दुनिया बसा लेगी।


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