दिल्ली के पॉश इलाके में रहने वाली सुनीता जी अपने इकलौते बेटे आदित्य की शादी से बहुत खुश थीं। बहू – नेहा, पढ़ी-लिखी, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, लेकिन थोड़ी शांत मिज़ाज की।
शुरू-शुरू में सुनीता जी को लगा कि नेहा उन्हें ज़्यादा तवज्जो नहीं देती। न कोई "मम्मीजी आपकी साड़ी कितनी सुंदर है", न ही "आपका रायता तो ग़ज़ब बनता है!"
जबकि पड़ोस की बहुएं अपनी सास की इतनी लल्लो-चप्पो करती थीं कि सासें फूली न समाती थीं।
सुनीता जी को लगता, "नेहा में अपनापन नहीं है। बस काम में लगी रहती है।"
एक दिन उनकी पुरानी सहेली रेखा आई। नेहा ने चुपचाप उनके लिए चाय, गरम गरम पकौड़े और घर में बनी खास इमली की चटनी रख दी।
रेखा बोली, "अरे वाह! नेहा ने तो दिल जीत लिया। बड़ी लजीज़ चटनी बनाई!"
सुनीता जी थोड़ा चौंकीं, "ये चटनी तो मेरी फेवरिट है, नेहा को कैसे पता?"
नेहा मुस्कराई, "मम्मीजी, आपने एक दिन जिक्र किया था… कि पापा जी को ये बहुत पसंद थी। तबसे मैं यू-ट्यूब से देख-देख कर सीख रही हूँ।"
उस दिन सुनीता जी को अहसास हुआ —
नेहा भले ही लल्लो-चप्पो नहीं करती, लेकिन उसका प्यार चुपचाप उसके काम में झलकता है।
वो बहू जो दिल से काम करती है, वो ज़ुबान से तारीफ करने से कहीं ज़्यादा गहरा रिश्ता बना जाती है।
सवर्था अप्रकाशित व मौलिक रचना
लक्ष्मी कानोडिया
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