रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और तेज़ हवाओं के कारण बिजली भी गुल हो चुकी थी। मास्टर दीनानाथ अपने छोटे से घर के बरामदे में बैठे लालटेन की लौ को तेज़ हवा से बचाने की कोशिश कर रहे थे। दीनानाथ गाँव के एक साधारण से स्कूल टीचर थे, जिनका जीवन बड़ी सादगी और ईमानदारी से बीत रहा था। उनकी पत्नी कमला अंदर कमरे में सो रही थी और उनका पाँच साल का बेटा आर्यन भी गहरी नींद में था। दीनानाथ और कमला ने पाई-पाई जोड़कर पचास हज़ार रुपये इकट्ठे किए थे, ताकि आर्यन को शहर के एक अच्छे स्कूल में दाखिला दिला सकें। यह रकम एक आम मास्टर के लिए किसी खजाने से कम नहीं थी।
तभी दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। दीनानाथ ने घबराकर दरवाज़ा खोला। सामने एक आदमी खड़ा था, जो बारिश में पूरी तरह से भीग चुका था। उसके कपड़े फटे हुए थे और आँखों में एक अजीब सी दहशत और लाचारी थी।
"मास्टर जी... मुझे बचा लीजिए! मेरी पत्नी शहर के अस्पताल में है। उसे डिलीवरी के दौरान बहुत खून बह गया है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर तुरंत ऑपरेशन नहीं हुआ, तो जच्चा और बच्चा दोनों नहीं बचेंगे। मुझे पचास हज़ार रुपये की ज़रूरत है। मैं गाँव के हर बड़े आदमी के दरवाज़े पर गया, लेकिन किसी ने मेरी मदद नहीं की। सबने कहा कि मुझ जैसे दिहाड़ी मज़दूर को इतने पैसे देना पैसे कुएं में डालने जैसा है। मास्टर जी, मेरी पत्नी मर जाएगी..." वह आदमी दीनानाथ के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा।
दीनानाथ का कलेजा कांप गया। उन्होंने उस आदमी को उठाया, जिसका नाम माधव था। दीनानाथ जानते थे कि घर के संदूक में रखे वो पचास हज़ार रुपये आर्यन के भविष्य की चाबी हैं। अगर उन्होंने वो पैसे दे दिए, तो आर्यन को अच्छे स्कूल में पढ़ाने का उनका सपना टूट जाएगा। तभी कमला भी बाहर आ गई। उसने सारी बात सुनी। कमला एक माँ थी, उसका दिल पसीज गया, लेकिन एक मध्यमवर्गीय पत्नी की चिंता भी उसके चेहरे पर साफ़ थी। उसने दीनानाथ की तरफ देखा।
दीनानाथ ने बिना एक पल गँवाए अंदर गए और संदूक से पैसों की वह पोटली लाकर माधव के हाथों में रख दी। "जाओ भाई, अपनी पत्नी और बच्चे की जान बचाओ। भगवान सब ठीक करेगा," दीनानाथ ने कहा।
माधव ने रोते हुए हाथ जोड़े, "मास्टर जी, मैं ये कर्ज़ ज़िंदगी भर नहीं भूलूंगा। मैं एक-एक पाई चुका दूँगा।" माधव उस तूफानी रात में वहां से चला गया।
जब वो चला गया, तो कमला ने भारी मन से कहा, "सुनते हो, हमने अपने बेटे के भविष्य के पैसे एक अजनबी को दे दिए। क्या वो कभी लौटकर आएगा? दुनिया बहुत स्वार्थी है।"
दीनानाथ ने मुस्कुराते हुए कमला के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत स्वर में बोले, "कमला, किसी का भला करके देखो, हमेशा लाभ में रहोगे, किसी पर दया करके देखो, हमेशा याद में रहोगे। वो पैसे हमारे बेटे की पढ़ाई के लिए थे, लेकिन उस वक़्त किसी की जान बचाना ज्यादा ज़रूरी था। नेकी कभी व्यर्थ नहीं जाती, भगवान इसका हिसाब अपने तरीके से रखता है।"
वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता गया। इस घटना को पंद्रह साल बीत चुके थे। दीनानाथ अब रिटायर हो चुके थे और उनके बालों में पूरी तरह से सफेदी आ गई थी। आर्यन अब बीस साल का हो चुका था और शहर के एक कॉलेज में पढ़ रहा था। माधव कभी लौटकर नहीं आया, और दीनानाथ ने भी कभी उन पैसों का अफ़सोस नहीं किया।
लेकिन एक दिन दीनानाथ के जीवन में एक ऐसा तूफ़ान आया जिसने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। आर्यन को कॉलेज से घर लौटते वक़्त एक भयानक सड़क दुर्घटना का शिकार होना पड़ा। उसके सिर में गहरी चोट आई थी और वह कोमा में चला गया था। दीनानाथ और कमला रोते-बिलखते शहर के सबसे बड़े और महंगे अस्पताल में पहुँचे। डॉक्टरों ने आर्यन की हालत देखकर तुरंत सर्जरी की बात कही।
"देखिए, ऑपरेशन बहुत क्रिटिकल है। आपको तुरंत काउंटर पर पांच लाख रुपये जमा करने होंगे, तभी हम सर्जरी शुरू कर पाएंगे," डॉक्टर ने बेरुखी से कहा।
पाँच लाख रुपये! दीनानाथ के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। एक रिटायर्ड मास्टर के पास इतने पैसे कहाँ से आते? उन्होंने अपने सारे रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन किया, लेकिन किसी ने मजबूरी बताई तो किसी ने फोन ही नहीं उठाया। दीनानाथ अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में ज़मीन पर बैठ गए और फूट-फूट कर रोने लगे। कमला बेसुध होकर दीवार के सहारे बैठी थी। उन्हें लग रहा था कि आज गरीबी उनके इकलौते बेटे की जान ले लेगी।
तभी अस्पताल के गलियारे में तेज़ कदमों की आहट हुई। अस्पताल के सबसे सीनियर डॉक्टर और इस अस्पताल के ट्रस्टी, डॉ. माथुर वहाँ पहुँचे। उन्होंने रोते हुए दीनानाथ को देखा और उनके पास गए।
"बाबा, आप क्यों रो रहे हैं? क्या बात है?" डॉ. माथुर ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
दीनानाथ ने रोते हुए अपनी लाचारी बताई कि कैसे पैसों की कमी के कारण उनके बेटे की सर्जरी नहीं हो पा रही है।
डॉ. माथुर ने दीनानाथ का नाम और उनके गाँव का नाम पूछा। जैसे ही दीनानाथ ने अपना नाम 'मास्टर दीनानाथ' और गाँव का नाम बताया, डॉ. माथुर एकदम सन्न रह गए। उन्होंने दीनानाथ को गौर से देखा। पंद्रह सालों में चेहरा बुढ़ापे की झुर्रियों से भर गया था, लेकिन वो करुणा आज भी उन आँखों में थी।
डॉ. माथुर तुरंत उठे और काउंटर पर गए। उन्होंने स्टाफ को आदेश दिया, "लड़के को तुरंत ऑपरेशन थिएटर में शिफ्ट करो। सर्जरी का एक भी पैसा इस परिवार से नहीं लिया जाएगा। इनका पूरा खर्च मैं अपनी जेब से उठाऊंगा।"
दीनानाथ हैरान थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि शहर का इतना बड़ा डॉक्टर उन पर इतनी बड़ी मेहरबानी क्यों कर रहा है। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "डॉक्टर साहब, आप मेरे लिए भगवान बनकर आए हैं। लेकिन मैं एक अजनबी हूँ, आप मुझ पर इतना बड़ा कर्ज़ क्यों चढ़ा रहे हैं?"
डॉ. माथुर की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने दीनानाथ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और भावुक होकर बोले, "मैं आप पर कर्ज़ नहीं चढ़ा रहा मास्टर जी, मैं तो अपना पंद्रह साल पुराना कर्ज़ उतार रहा हूँ। याद कीजिए वो तूफानी रात, जब एक लाचार मज़दूर अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए आपके दरवाज़े पर आया था। आपने बिना उसे जाने अपनी जीवन भर की जमापूंजी उसे दे दी थी।"
दीनानाथ की आँखें फटी की फटी रह गईं। "तुम... तुम माधव हो?"
"हाँ मास्टर जी," डॉ. माथुर मुस्कुराते हुए रो पड़े। "मैं वही लाचार माधव हूँ। आपके उन पैसों ने उस रात मेरी पत्नी और मेरी बेटी की जान बचा ली थी। उसके बाद मैंने ठान लिया कि मैं ज़िंदगी में इतनी मेहनत करूंगा कि किसी और को कभी पैसों के लिए अपनों को खोना न पड़े। मैंने दिन-रात पढ़ाई की, डॉक्टरी पास की और आज इस मुकाम पर पहुँचा हूँ। मैं आपके गाँव गया था, लेकिन तब तक आप शहर शिफ्ट हो चुके थे। मैंने आपको बहुत ढूँढा। आज भगवान ने मुझे मौका दिया है आपकी नेकी का कर्ज़ चुकाने का।"
कमला, जो अब तक रो रही थी, उसने ये सब सुना तो उसके हाथ जुड़ गए। उसे पंद्रह साल पहले दीनानाथ के कहे गए वो शब्द याद आ गए— 'किसी का भला करके देखो, हमेशा लाभ में रहोगे...'
उस रात आर्यन की सर्जरी सफल रही। कुछ दिनों बाद जब आर्यन को होश आया, तो माधव (डॉ. माथुर) खुद उसे व्हीलचेयर पर बैठाकर बाहर लाए। दीनानाथ और कमला की आँखों में आज जो चमक थी, वो दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं खरीदी जा सकती थी। इंसानियत की एक छोटी सी लौ ने आज एक पूरे परिवार को बुझने से बचा लिया था।
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