**अनकही डोर: एक भाई का पश्चाताप**

 शहर की उस पुरानी और जानी-पहचानी गली में कदम रखते ही रजत के पैरों की गति धीमी हो गई। दस साल बीत गए थे उसे इस घर की दहलीज पार किए हुए। इन दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था। पिताजी का देहांत हो चुका था और मां अब उम्र के उस पड़ाव पर थीं जहां उन्हें सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी। लेकिन रजत के मन में जो एक गांठ सालों पहले बंधी थी, वह आज भी वैसी ही थी। यह गांठ थी सौम्या को लेकर। सौम्या, जिसे उसके माता-पिता ने एक अनाथालय से तब गोद लिया था जब रजत पंद्रह साल का था। रजत की अपनी एक छोटी बहन थी, श्रेया, जिसका एक भयानक बीमारी से निधन हो गया था। माता-पिता ने उस सदमे से उबरने के लिए सौम्या को घर लाया था। लेकिन किशोरवय रजत को लगा कि यह लड़की उसकी प्यारी बहन श्रेया की जगह लेने आई है। वह सौम्या से नफरत करने लगा। वह उससे बात नहीं करता, उसकी दी हुई कोई चीज नहीं खाता और इसी घुटन में उसने पहले हॉस्टल और फिर नौकरी के लिए विदेश का रुख कर लिया। उसने अपने ही घर से एक लंबी दूरी बना ली।


आज जब वह वापस लौटा था, तो घर का भारी लकड़ी का दरवाजा सौम्या ने ही खोला। पच्चीस साल की सौम्या एक सादी सी सूती साड़ी में बिल्कुल किसी संस्कारी बेटी की तरह लग रही थी। रजत को देखते ही उसकी आंखों में एक चमक आ गई। "भैया! आप आ गए?" उसके स्वर में जो अपनापन था, वह रजत के कानों में अजीब सा लगा। उसने कोई जवाब नहीं दिया और अपना बैग वहीं छोड़कर सीधा अपनी मां के कमरे में चला गया। मां बिस्तर पर थीं। उन्होंने रजत को गले लगाया और फूट-फूट कर रोईं। बातों-बातों में मां ने बताया कि कैसे पिताजी के जाने के बाद सौम्या ने ही इस घर को और उन्हें संभाल कर रखा है। उसने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्च भी उठाया और मां की दिन-रात बिना किसी शिकायत के सेवा की। रजत चुपचाप सुनता रहा। उसे अंदर ही अंदर एक अजीब सी ग्लानि महसूस होने लगी, लेकिन उसका अहंकार अभी भी भारी था।


अगले कुछ दिनों तक रजत ने घर के माहौल को बहुत करीब से देखा। सौम्या सुबह से रात तक मशीन की तरह काम करती। वह रजत की पसंद का हर खाना बनाती, उसके कमरे की सफाई करती और उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का बिना कहे ख्याल रखती। लेकिन रजत के सामने आते ही वह थोड़ा सहम जाती थी। रजत को याद आया कि उसने कभी सौम्या को सीधे मुंह 'बहन' कहकर नहीं बुलाया था। वह हमेशा उसे एक बाहरी इंसान ही समझता रहा।


एक शाम, जब बाहर तेज बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी, रजत पानी पीने के लिए अपने कमरे से बाहर आया। उसने देखा कि सौम्या हॉल में पिताजी की तस्वीर के सामने खड़ी है। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे और वह तस्वीर से बातें कर रही थी। 


"बाबूजी, भैया आ गए हैं। अब मां को कोई तकलीफ नहीं होगी। भैया मां को अपने साथ शहर ले जाएंगे। मेरा इस घर में जो सफर था, वह शायद अब पूरा हो गया है। मुझे खुशी है कि भैया लौट आए। मैं कल सुबह ही अपना सामान लेकर वर्किंग विमेंस हॉस्टल चली जाऊंगी, ताकि भैया को मेरी वजह से कोई परेशानी न हो। वो मुझसे कभी खुश नहीं रहे बाबूजी, मैं नहीं चाहती कि मेरी परछाई से भी उनके चेहरे पर कोई शिकन आए।" 


यह सुनकर रजत के पैरों तले जमीन खिसक गई। सौम्या उस घर को छोड़ने की बात कर रही थी जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था, सिर्फ इसलिए ताकि रजत को कोई मानसिक तकलीफ न हो।


रजत का हृदय किसी भारी पत्थर की तरह टूट कर बिखर गया। उसका वह सारा अहंकार, वह सारी झूठी नफरत जो उसने सालों से पाल रखी थी, आज बारिश के इस पानी के साथ जैसे बह गई। उसे अपनी गलती और अपनी छोटी सोच का इतना गहरा अहसास हुआ कि उसकी आंखों से भी आंसू छलक पड़े। वह धीरे-धीरे चलकर सौम्या के पीछे गया। सौम्या ने जब पैरों की आहट पाकर पीछे मुड़कर देखा तो रजत को रोता हुआ पाया। वह घबरा गई, "भैया, क्या हुआ? मेरी कोई बात बुरी लगी क्या आपको? आप रो क्यों रहे हैं?"


रजत ने अपने कांपते हाथों से सौम्या के कंधे पकड़े और उसे रोका। उसने एक गहरी, रुंधी हुई आवाज में कहा, "अपने घर चलो, सौम्या। यह घर भी तुम्हारा है, पगली। लेकिन उस घर में, यानी मेरे दिल में और मेरी जिंदगी में, हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है।"


सौम्या हैरान होकर अपने भाई को देख रही थी। रजत ने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए आगे कहा, "मैं तुम सबसे दूर रहा, वह मेरी सबसे बड़ी गलती थी। मैं अपने ही अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने यह देखा ही नहीं कि तुमने इस घर को कितनी खूबसूरती और त्याग से संभाल कर रखा है। अब मैं वापस आ गया हूं, तो तुम मुझसे दूर मत रहो। मैं हमेशा से भगवान से अपनी श्रेया के जाने के बाद एक बहन मांगा करता था। कुछ खो कर कुछ पाना ही शायद मेरे हिस्से में लिखा था इस तरह। और भगवान ने मुझे तुम्हारे रूप में एक इतनी प्यारी बहन दी, लेकिन मैं ही अभागा उसे पहचान नहीं पाया।"


यह कहते हुए रजत की आवाज पूरी तरह से भर आई। उसने आगे बढ़कर सौम्या के गालों पर बहते हुए आंसुओं को पोंछा और बड़े ही स्नेह से उसका मस्तक चूम लिया। सौम्या, जो सालों से बस एक बार अपने भाई के मुंह से प्यार के दो शब्द सुनने को तरस रही थी, वह फूट-फूट कर रो पड़ी और रजत के गले लग गई। जिस ममत्व और अधिकार से वह रजत के गले लगी थी, उस से यह आभास पूर्ण रूप से हो रहा था उसे कि देर हुई है तो सिर्फ उसी की तरफ से हुई है। सौम्या तो शायद पहले ही दिन से, जब वह पांच साल की उम्र में इस घर की दहलीज पर आई थी, उसे अपना बड़ा भाई मान चुकी थी। आज उस पुराने घर के आंगन में सिर्फ बारिश का पानी नहीं गिर रहा था, बल्कि दो दिलों के बीच जमी सालों की बर्फ पिघल रही थी।


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