रोहित और मेरी छोटी बहन काव्या के बीच बढ़ती वो अनकही नजदीकियां मुझे अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रही थीं। माता-पिता के गुजर जाने के बाद काव्या सिर्फ मेरी बहन नहीं, बल्कि मेरी बेटी जैसी थी। मेरी और रोहित की शादी को पांच साल हो चुके थे और पिछले दो सालों से काव्या हमारे साथ ही रह रही थी। रोहित एक बहुत ही सुलझा हुआ और जिम्मेदार जीवनसाथी था। उसने काव्या को हमेशा एक छोटी बहन का प्यार दिया, लेकिन पिछले कुछ महीनों से घर का माहौल कुछ बदल सा गया था। रोहित अब काव्या की छोटी-छोटी बातों का जरूरत से ज्यादा ख्याल रखने लगा था। काव्या को क्या पसंद है, उसकी कॉलेज की टाइमिंग क्या है, उसे कौन सी किताबें पढ़नी हैं—इन सब बातों का हिसाब रोहित की उंगलियों पर रहने लगा था। यह बदलाव मुझे कहीं न कहीं बहुत गहरे से चुभ रहा था।
मैं जिस बात का आभास कर रही थी, वह किसी भी पत्नी के लिए एक भयानक दुःस्वप्न जैसा था। लेकिन मैं उसका सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। मैं खुद से ही लड़ रही थी। क्या मैं अपनी ही उस छोटी बहन पर शक कर रही थी जिसे मैंने अपने हाथों से निवाला खिलाकर बड़ा किया था? क्या मैं अपने उस पति पर शक कर रही थी जिसने मेरे हर सुख-दुख में मेरा साया बनकर साथ दिया था? मैं काव्या से कुछ कह नहीं पाती थी, लेकिन मेरी उलझनें और मेरी उदासी मेरी आँखों से छलक ही जाती थीं। काव्या बहुत समझदार थी। हम दोनों बहनों के बीच एक ऐसा अनमोल रिश्ता था जिसमें शब्दों की जरूरत नहीं होती थी। उसने मेरी खामोशी और मेरे मन में पनप रहे उस डर को बहुत जल्दी भांप लिया था। इसीलिए शायद वह भी धीरे-धीरे मुझसे कटने लगी थी। उसने अपनी चहचहाहट कम कर दी थी और अक्सर अपने कमरे में ही बंद रहने लगी थी। यह दूरी मुझे और भी डरा रही थी। मुझे लगने लगा था कि शायद सचमुच उन दोनों के बीच कुछ ऐसा है जिसे मुझसे छुपाया जा रहा है।
आज मेरा जन्मदिन था। हर साल इस दिन घर में बहुत चहल-पहल रहती थी। रोहित आधी रात को सरप्राइज देता था और काव्या मेरे लिए अपने हाथों से कार्ड बनाती थी। लेकिन आज सुबह से ही घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। रोहित सुबह जल्दी उठकर ऑफिस चला गया था और काव्या भी नाश्ता करके कॉलेज निकल गई थी। किसी ने मुझे जन्मदिन की बधाई तक नहीं दी थी। मेरे अंदर का डर आज अपने चरम पर पहुंच गया था। मुझे लगा कि अब मैं उनके जीवन में कोई मायने नहीं रखती। मैंने तय कर लिया था कि आज शाम को मैं रोहित से सीधी बात करूंगी। अगर मेरा शक सच साबित हुआ, तो मैं यह घर छोड़कर हमेशा के लिए चली जाऊंगी। मैं अपने कमरे में बैठी पुराने अल्बम पलट रही थी और मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। इन अल्बमों में मेरी बनाई हुई कुछ पुरानी पेंटिंग्स की तस्वीरें भी थीं। शादी से पहले मुझे चित्रकारी का बहुत शौक था, लेकिन घर की जिम्मेदारियों और काव्या की पढ़ाई के खर्चों के बीच मैंने अपने उन रंगों और ब्रश को हमेशा के लिए एक बक्से में बंद कर दिया था।
शाम के करीब छह बज रहे थे जब दरवाजे की घंटी बजी। मैंने आँसू पोंछे और दरवाजा खोला। सामने रोहित और काव्या खड़े थे। दोनों के चेहरों पर एक बड़ी सी मुस्कान थी। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, काव्या ने आगे बढ़कर मेरी आँखों पर एक काली पट्टी बांध दी। "दीदी, आज कोई सवाल नहीं। बस हमारे साथ चलिए," काव्या ने चहकते हुए कहा। मेरी धड़कनें तेज हो गई थीं। मेरा मन गुस्से और डर से भरा हुआ था, लेकिन मैं चुपचाप उनके साथ गाड़ी में बैठ गई।
करीब आधे घंटे बाद गाड़ी रुकी। रोहित ने मेरा हाथ थाम कर मुझे बाहर निकाला और कुछ सीढ़ियां चढ़ाईं। "अब तुम अपनी पट्टी खोल सकती हो," रोहित की प्यार भरी आवाज मेरे कानों में पड़ी।
मैंने जैसे ही पट्टी खोली, मेरे सामने का नज़ारा देखकर मेरी सांसें अटक गईं। मैं शहर के एक बहुत ही खूबसूरत आर्ट गैलरी के बीचों-बीच खड़ी थी। गैलरी की दीवारों पर मेरी वो तमाम पेंटिंग्स लगी हुई थीं जिन्हें मैंने सालों पहले बक्से में बंद कर दिया था। हर पेंटिंग को बहुत ही सुंदर फ्रेम में सजाया गया था। सामने एक बड़ा सा बैनर लगा था जिस पर लिखा था, 'आरंभ - राधिका की कला का नया सफर'।
मैं बुत बनकर खड़ी थी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। तभी रोहित मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला, "राधिका, तुमने काव्या और इस घर के लिए अपने सपनों को मार दिया था। पिछले छह महीनों से काव्या और मैं मिलकर तुम्हारी इन पुरानी पेंटिंग्स को रीस्टोर कर रहे थे। काव्या ने कॉलेज के बाद इस गैलरी के चक्कर काटे, और मैंने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके इस एग्जिबिशन की तैयारी की। हम दोनों चाहते थे कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें तुम्हारी वो खोई हुई पहचान वापस लौटाएं। हमें छुप-छुप कर बातें करनी पड़ती थीं, तुम्हारे सोने के बाद रात को जागकर इन पर काम करना पड़ता था ताकि तुम्हारा यह सरप्राइज खराब न हो।"
काव्या दौड़कर मेरे गले लग गई। उसकी आँखों में भी आँसू थे। "दीदी, मैंने देखा था कि पिछले कुछ महीनों से आप कितनी परेशान थीं। आपको लगता था कि जीजू और मेरे बीच... दीदी, आप मेरी माँ हैं। मैं जानती थी कि आपके मन में क्या चल रहा है, लेकिन मैं आपको बीच में बताकर इस सरप्राइज को खराब नहीं करना चाहती थी। मुझे माफ कर दीजिए दीदी, मेरी वजह से आपको इतना रोना पड़ा।"
मेरे अंदर का सारा डर, सारा शक एक झटके में बह गया। मैं फूट-फूट कर रोने लगी। मैं खुद को रोक ही नहीं पा रही थी। मैंने कितनी बड़ी भूल की थी। जिस पति और बहन ने मेरी खुशियों के लिए दिन-रात एक कर दिया, मैं उन्हीं के रिश्ते पर शक कर रही थी। मेरा मन आत्मग्लानि से भर गया था। मैंने रोहित और काव्या दोनों को कसकर गले लगा लिया। आज मुझे अपने डर का जवाब मिल गया था। रिश्ते हमेशा वैसे नहीं होते जैसा हमारा डरा हुआ मन हमें दिखाता है। आज मुझे मेरी कला तो वापस मिली ही थी, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा, मुझे मेरे परिवार का वो प्यार वापस मिल गया था जिसे मैं अपने ही शक के धुएं में खो चुकी थी।
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