सावन का महीना खत्म होने को था और आज रक्षाबंधन का पवित्र दिन था। बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी, लेकिन मेरे घर के अंदर एक अजीब सी उदासी छाई हुई थी। मेरी पत्नी, काव्या, सुबह से ही मशीन की तरह घर के कामों में लगी हुई थी। उसने मेरी पसंद का नाश्ता बनाया, घर को बहुत खूबसूरती से सजाया, लेकिन उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो एक त्योहार के दिन होनी चाहिए। मैं जानता था कि इस खामोशी और उदासी के पीछे का दर्द क्या है। पिछले तीन सालों से काव्या की राखी की थाली सूनी ही रह जाती थी।
काव्या और उसके छोटे भाई कुणाल के बीच कभी बहुत गहरा प्यार हुआ करता था। लेकिन तीन साल पहले, उनके पिता के देहांत के बाद, पारिवारिक संपत्तियों और कुछ कड़वी बातों को लेकर दोनों के बीच ऐसी दरार पड़ी कि बातचीत ही बंद हो गई। काव्या ने शुरुआत में रिश्ते को सुधारने की बहुत कोशिश की। वह हर रक्षाबंधन पर कुणाल को राखी भेजती, लेकिन उधर से कभी कोई जवाब या फोन नहीं आता। काव्या का स्वाभिमान भी चोटिल हुआ था। उसने भी धीरे-धीरे कुणाल का ज़िक्र करना बंद कर दिया था। लेकिन मैं उसका पति हूँ, मैं उस दर्द को समझता था जो वह दुनिया से, यहाँ तक कि मुझसे भी, छिपाने की कोशिश करती थी।
दोपहर हो चुकी थी। काव्या अपने कमरे में खिड़की के पास उदास बैठी बारिश को देख रही थी। मुझे पता था कि वह छुपकर रो रही है। आज मैंने उसे काम से जल्दी फ्री कर दिया था। दरअसल, मैंने कुणाल को कुछ दिन पहले ही फोन किया था। मैंने एक पति होने के नाते अपने अहम् को किनारे रखा और कुणाल से कहा था, "कुणाल, संपत्ति और पैसों की दीवार क्या एक बहन के प्यार से बड़ी हो गई है? तुम्हारे पिता जी चले गए, लेकिन क्या तुम अपनी बहन को भी हमेशा के लिए खोना चाहते हो? वह बाहर से सख्त दिखती है, लेकिन अंदर ही अंदर टूट चुकी है।" कुणाल ने तब फोन पर कुछ नहीं कहा था और चुपचाप कॉल काट दी थी। मुझे लगा कि शायद मेरी कोशिश बेकार गई और वह नहीं आएगा।
तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। काव्या ने खिड़की से नज़र हटाकर मेरी तरफ देखा। मैंने इशारे से उसे दरवाज़ा खोलने को कहा। बेमन से उठकर काव्या ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, वह बुत बनकर वहीं खड़ी रह गई। उसके पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई हो।
दरवाज़े पर कुणाल खड़ा था। बारिश में हल्का भीगा हुआ, हाथों में मिठाई का डिब्बा और शगुन का लिफाफा लिए। तीन सालों की दूरी और अहंकार उसके चेहरे से पूरी तरह धुल चुका था। काव्या उसे देखकर जैसे सदमे में थी, उसने झट से दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की, लेकिन कुणाल ने अपना हाथ आगे अड़ा दिया।
"मैं पिछले तीन साल राखी पर नहीं आया, वह मेरी सबसे बड़ी भूल थी दीदी," कुणाल की आवाज़ में एक गहरा पश्चाताप और कांपन था। "मुझे अपने अहम् ने अंधा कर दिया था। अब जब मैं अपनी गलती मानकर आ गया हूँ, तो क्या तुम ऐसे ही दरवाज़े के पीछे छिपी रहोगी? क्या मुझे अंदर नहीं आने दोगी? क्या आज भी मेरे माथे पर तिलक नहीं लगाओगी?"
कुणाल भीगी आँखों से मेरी तरफ देख रहा था। उसकी वो नज़र मुझसे कह रही थी कि मैंने तो अपना वादा पूरा कर दिया, जहाँ तक मुझे करना था मैंने किया, अपने अहंकार को तोड़कर मैं यहाँ तक आ गया हूँ। अब इससे आगे जो करना है, वो मुझे ही करना है—काव्या को मनाना।
काव्या की आँखों से अब आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा था। जो दर्द और शिकायतें तीन साल से उसके सीने में बर्फ की तरह जमी थीं, वो आज पिघल कर बहने लगी थीं। उसने कुणाल की तरफ एक कदम बढ़ाया और अगले ही पल कुणाल ने अपनी बड़ी बहन को अपनी छाती से कसकर लगा लिया। काव्या एक नन्ही सी बालिका की तरह जार-जार रो पड़ी। वह कुणाल के सीने पर मुक्के मारते हुए सुबक रही थी, "इतने साल क्यों नहीं आया तू? तुझे अपनी इस दीदी की याद नहीं आई? क्या तू इतना पराया हो गया था?" कुणाल भी बच्चों की तरह रो रहा था और बार-बार माफी मांग रहा था।
मैं दूर खड़ा उनकी भावभंगिमा समझ पा रहा था। काव्या अपने हिस्से की कोशिश पहले ही कर चुकी थी, और आज कुणाल ने अपने हिस्से का अहम् तोड़ दिया था। अब बाकी जो बचा था, वो मेरे हिस्से की कोशिश थी—इस परिवार को हमेशा के लिए एक डोर में बांधे रखना और यह सुनिश्चित करना कि भविष्य में कोई गलतफहमी इनके बीच दोबारा दीवार न बन पाए।
मैंने आगे बढ़कर कुणाल के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, "अब दरवाज़े पर ही खड़े-खड़े रोते रहोगे या अंदर आकर राखी भी बंधवाओगे? तुम्हारी दीदी ने सुबह से तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की खीर बना कर रखी है, भले ही ये माने या ना माने।"
काव्या ने अपने आंसू पोंछे और शर्माते हुए मुझे एक हल्की सी डांट पिलाई। वह दौड़कर अंदर गई और अपनी राखी की सजी हुई थाली ले आई। जब कुणाल के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा और उसकी कलाई पर वो रेशमी धागा बंधा, तो पूरे घर का माहौल बदल चुका था। उस दिन मैंने महसूस किया कि खून के रिश्ते किसी भी गलतफहमी से कहीं ज्यादा गहरे होते हैं। उन्हें बस एक छोटे से प्रयास, थोड़े से त्याग और बहुत सारे प्यार की ज़रूरत होती है। मैंने आज केवल अपनी पत्नी की मुस्कान ही वापस नहीं पाई थी, बल्कि एक बिखरे हुए परिवार को फिर से जुड़ते हुए देखा था।
***
दोस्तों, क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है जो महज़ कुछ गलतफहमियों या झूठे अहंकार की वजह से टूट गया है? अगर हाँ, तो आज ही पहल कीजिए, क्योंकि समय रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है और बाद में केवल पछतावा बचता है। आपको यह कहानी कैसी लगी, हमें अपने विचार ज़रूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
***
0 टिप्पणियाँ