दरकती दीवारें और नीलाम होते रिश्ते

 शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी राघवेन्द्र ने अपनी जिंदगी के पच्चीस साल अपने परिवार को एक मजबूत छत देने में खपा दिए थे। छोटी सी उम्र में माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद, राघवेन्द्र ने अपने दोनों छोटे भाइयों— सुमित और अमित— को कभी यतीम होने का एहसास नहीं होने दिया। खुद दिन-रात एक करके, अपनी जवानी की परवाह किए बिना उसने एक बड़ा व्यापार खड़ा किया और 'आशीर्वाद' नाम का एक आलीशान तीन मंजिला मकान बनवाया। दोनों भाइयों को उच्च शिक्षा दिलाई, उनकी शादियाँ बड़े घरानों में करवाईं और उन्हें अपने ही व्यापार में बराबर का हिस्सेदार बना लिया। राघवेन्द्र की पत्नी, सुभद्रा, एक अत्यंत सरल और समझदार महिला थी। वह अक्सर राघवेन्द्र से कहती थी कि अपने भविष्य और बुढ़ापे के लिए कुछ पैसे अलग रख लें, लेकिन राघवेन्द्र हमेशा हंस कर टाल देता था। उसका मानना था कि उसके भाई ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी हैं। भारतीय पारिवारिक मूल्यों में रचे-बसे राघवेन्द्र के लिए परिवार ही उसका मंदिर था।


लेकिन समय का पहिया हमेशा एक सा नहीं रहता। व्यापार में एक बहुत बड़ा घाटा हुआ। उनके सबसे भरोसेमंद मुनीम ने करोड़ों का गबन किया और बाजार के भारी कर्ज के तले राघवेन्द्र का पूरा साम्राज्य रातों-रात ढह गया। जिस दिन यह खबर पुख्ता हुई, राघवेन्द्र अंदर से पूरी तरह टूट चुका था। वह थका-हारा, बिखरा हुआ घर लौटा। रात के समय उसने सुमित और अमित को अपने कमरे में बुलाया। हमेशा एक मजबूत चट्टान की तरह दिखने वाला बड़ा भाई आज बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो रहा था। 


राघवेन्द्र ने अपने भाइयों के सामने अपने दिल का हर दर्द, अपनी बेबसी और अपना खोखलापन रख दिया। उसने रोते हुए कहा, "मेरे पास अब कुछ नहीं बचा है। मैं पूरी तरह से टूट चुका हूँ। बाजार का इतना कर्ज है कि शायद मुझे अपनी जान देनी पड़े। अब तुम दोनों ही मेरा सहारा हो। मुझे इस दलदल से निकाल लो।"


राघवेन्द्र को लगा था कि उसके इस दर्द को देखकर उसके भाई उसे गले लगा लेंगे, उसका हौसला बढ़ाएंगे। उस रात दोनों भाइयों ने सांत्वना तो दी, लेकिन राघवेन्द्र की इस कमजोरी और टूटन ने उनके मन में एक अलग ही खेल शुरू कर दिया था। 


जैसे ही सुमित और अमित को यह एहसास हुआ कि जिस बड़े भाई के साये से वे डरते थे, वह अब एक शक्तिहीन और टूटा हुआ इंसान बन चुका है, उनके तेवर बदलने लगे। अगले ही दिन से घर का माहौल बदलने लगा। जो देवरानियां सुभद्रा के सामने ऊंची आवाज़ में बात नहीं करती थीं, वे अब खुलेआम ताने मारने लगीं। "बड़े भैया ने तो सारा पैसा डुबा दिया, अब क्या हमें भी सड़क पर लाएंगे?" 


सुमित और अमित ने चालाकी से कर्ज चुकाने का बहाना बनाकर राघवेन्द्र से उन दोनों छोटी दुकानों के कागजात पर दस्तखत करवा लिए जो इस घाटे से बच गई थीं। उन्होंने कहा कि वे इन्हें बेचकर बाजार का कर्ज उतारेंगे, लेकिन असल में उन्होंने वे दुकानें अपनी पत्नियों के नाम करवा लीं। जब राघवेन्द्र ने अपनी बेटी की कॉलेज की फीस के लिए सुमित से कुछ पैसे मांगे, तो सुमित ने रूखेपन से जवाब दिया, "भैया, जब पैसा था तब तो आपने उड़ा दिया। अब हम कहाँ से लाएं? हम पर भी अपने बच्चों की जिम्मेदारी है।"


राघवेन्द्र अवाक रह गया। जिस इंसान ने अपना निवाला छोड़कर इन भाइयों का पेट भरा था, आज वो चंद रुपयों के लिए उनके सामने गिड़गिड़ा रहा था और वे उसे दुत्कार रहे थे। 


हद तो तब हो गई जब छह महीने बाद, एक सुबह सुमित और अमित एक वकील के साथ घर में दाखिल हुए। उन्होंने 'आशीर्वाद' भवन के बंटवारे के कागजात राघवेन्द्र के सामने फेंक दिए। उस आलीशान घर का सबसे छोटा और सीलन भरा कमरा राघवेन्द्र को दिया जा रहा था और बाकी का पूरा घर दोनों भाइयों ने आपस में बांट लिया था। 


"ये क्या है सुमित?" राघवेन्द्र के हाथ कांप रहे थे। 


"भैया, आप तो टूट चुके हैं। आप कुछ कर नहीं सकते। कल को आपके कर्जदार घर पर आकर हंगामा करेंगे तो हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। इसलिए हमने घर का बंटवारा कर लिया है," अमित ने बड़ी बेरहमी से कहा।


उस दिन राघवेन्द्र को अपनी सबसे बड़ी गलती का एहसास हुआ। वह अपने अंधेरे कमरे में गया और सुभद्रा के कंधे पर सिर रखकर बहुत रोया। सुभद्रा ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा, "दुनिया में सबसे बड़ी गलती है अपनी कमजोरी किसी को दिखाना। जब लोगों को पता चल जाता है कि कोई इमारत अंदर से दरक चुकी है, तो लोग उसे सहारा देने के बजाय उसकी ईंटें चुराने लगते हैं। आपके भाइयों ने भी वही किया। उन्होंने आपके आंसुओं में अपना फायदा देखा।"


सुभद्रा की इस बात ने राघवेन्द्र के अंदर के सोए हुए स्वाभिमान को झकझोर दिया। उसे समझ आ गया कि इस दिखावे के ज़माने में कमज़ोर दिखना सबसे बड़ा गुनाह है। उसने अपने आँसू पोंछे, अपनी डायरी निकाली और एक नई शुरुआत की योजना बनाई। 


अगली सुबह, जब राघवेन्द्र कमरे से बाहर आया, तो वह कल वाला लाचार और टूटा हुआ राघवेन्द्र नहीं था। उसने सलीके से कपड़े पहने थे, उसकी आँखों में एक तेज था और चेहरे पर एक कठोर दृढ़ता। उसने बंटवारे के कागजात फाड़ कर भाइयों के मुंह पर फेंक दिए और अपनी कड़क आवाज़ में कहा, "मैं अभी मरा नहीं हूँ। यह मकान मैंने अपने खून-पसीने से बनाया है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इसका एक तिनका भी यहाँ से वहाँ नहीं होगा। जिसको रहना है मेरी शर्तों पर रहे, वरना अपना रास्ता नापे।"


राघवेन्द्र का यह पुराना रौद्र रूप देखकर दोनों भाइयों के पसीने छूट गए। राघवेन्द्र ने किसी से कोई मदद नहीं मांगी। उसने अपनी बची हुई साख का इस्तेमाल किया, अपने पुराने परिचितों से बात की और एक छोटी सी नौकरी से फिर से शुरुआत की। उसने यह ठान लिया था कि चाहे अंदर से वह कितना भी संघर्ष कर रहा हो, लेकिन अब दुनिया और इन स्वार्थी रिश्तेदारों के सामने वह कभी अपनी पीड़ा जाहिर नहीं करेगा। उसने अपने स्वाभिमान की ईंटों से अपने जीवन के मकान को फिर से चुनना शुरू कर दिया, लेकिन इस बार उसने इस मकान में किसी को अपनी कमजोरी झांकने की कोई खिड़की नहीं छोड़ी।


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