खामोश मोहब्बत की चादर

 आकाश अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर उंगलियाँ चला रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार बाहर बरामदे में बैठे अपने बड़े भाई, माधव की ओर जा रहा था। माधव पिछले दस सालों से इस घर की धुरी बने हुए थे। जब आकाश छोटा था, तब पिता का साया सिर से उठ गया था। उस वक्त माधव की उम्र मात्र बाइस साल थी और उनकी आँखों में भी बड़े-बड़े सपने थे, एक अच्छी नौकरी और अपनी पसंद की लड़की से शादी करने की चाहत थी। लेकिन पिता के जाते ही उन्होंने रातों-रात अपने सारे अरमान एक पुराने संदूक में बंद कर दिए।


आकाश अक्सर माधव को देखकर चिढ़ जाता था। माधव बहुत कम बोलते थे। घर में कोई उत्सव हो या कोई परेशानी, उनके चेहरे पर एक अजीब सी तटस्थता रहती थी। न वो ज्यादा हंसते थे, न कभी गुस्सा करते थे। यहाँ तक कि जब आकाश की शादी तय हुई और घर में खुशियों का माहौल था, तब भी माधव बस चुपचाप काम निपटाते रहे। आकाश को लगता था कि बड़े भाई थोड़े पत्थर दिल और नीरस हो गए हैं। उन्हें सिर्फ पैसों और जिम्मेदारियों से मतलब है, भावनाओं से नहीं।


"भाई साहब, आप कभी थकते नहीं क्या?" एक शाम आकाश ने चिढ़कर पूछा। "माँ बीमार हैं, मेरी शादी की तैयारियाँ हैं, ऑफिस का काम है, और आप बस एक मशीन की तरह लगे रहते हैं। कम से कम अपनी खुशी के बारे में तो कभी कुछ कहिए।"


माधव ने अखबार से नजरें उठाईं, एक फीकी सी मुस्कान दी और बस इतना कहा, "सब ठीक तो है आकाश, तुम अपनी तैयारी पर ध्यान दो।"


आकाश ने झिझक कर अपनी पत्नी, मीरा से कहा, "पता नहीं भाई साहब को क्या हो गया है। कभी-कभी लगता है कि उन्हें हम लोगों की खुशी से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बस एक रोबोट की तरह फर्ज निभा रहे हैं।" मीरा ने उसे समझाया, "आकाश, हर किसी का प्यार जताने का तरीका अलग होता है। शायद उनके जज़्बात गहरे हैं, इसलिए बाहर नहीं आते।"


आकाश की शादी के कुछ दिनों बाद, एक रात अचानक माँ की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टरों ने कहा कि एक बड़ा ऑपरेशन करना होगा और उसका खर्चा बहुत ज्यादा था। आकाश घबरा गया। उसकी नई-नई नौकरी थी और शादी में काफी पैसे खर्च हो चुके थे। वह अपनी सुध-बुध खो बैठा और अस्पताल के गलियारे में सिर पकड़कर बैठ गया।


तभी उसने देखा कि माधव डॉक्टर के केबिन से बाहर निकल रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी खामोशी थी। उन्होंने आकाश के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "घबराओ मत, मैंने अस्पताल का सारा एडवांस जमा कर दिया है और दवाइयाँ भी आ गई हैं। माँ ठीक हो जाएंगी।"


आकाश हैरान था। "भाई साहब, इतने पैसे? आपके पास तो अपनी कोई सेविंग नहीं थी। आपने तो कहा था कि आपने सारे पैसे मेरी शादी और पढ़ाई के लोन में लगा दिए हैं।"


माधव ने कोई जवाब नहीं दिया और माँ के कमरे की ओर चले गए। अगले दिन, जब माँ खतरे से बाहर थीं, आकाश घर पर कुछ कपड़े लेने आया। अलमारी में कुछ ढूंढते वक्त उसे एक पुरानी डायरी और कुछ कागज़ात मिले। वो कागज़ात माधव की उस पुश्तैनी ज़मीन के थे जो उन्होंने अपने नाम करवाई थी, लेकिन अब उस पर 'बिक्री' की मुहर लगी थी। डायरी के पन्नों में माधव ने लिखा था— "आज आकाश की शादी बहुत धूमधाम से हुई। वह बहुत खुश था। रिया (माधव की प्रेमिका) का फोन आया था, वह अब और इंतजार नहीं कर सकती। मैंने उसे जाने को कह दिया। मैं अपनी खुशियों के लिए आकाश का भविष्य और माँ की शांति दांव पर नहीं लगा सकता। शायद लोग मुझे रुखा समझें, पर मेरा परिवार सलामत रहे, यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।"


आकाश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिसे वह 'पत्थर दिल' समझता था, वह इंसान तो अंगारों पर चलकर उनके लिए फूल बिछा रहा था। माधव ने अपनी मोहब्बत कुर्बान कर दी, अपनी ज़मीन बेच दी और कभी एक उफ़ तक नहीं की ताकि छोटे भाई के चेहरे की मुस्कान न छीने।


आकाश भागता हुआ अस्पताल पहुँचा। माधव माँ के सिरहाने बैठे उनके पैर दबा रहे थे। आकाश उनके गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगा। "मुझे माफ कर दीजिए भाई साहब! मैं समझ ही नहीं पाया कि आपकी खामोशी के पीछे कितना बड़ा त्याग था। आप कुछ बोलते क्यों नहीं?"


माधव ने उसे गले लगाया और पहली बार उनकी आँखों से एक आँसू टपका। उन्होंने कहा, "आकाश, जो लोग जज़्बात छुपाने वाले होते हैं, वो असल में दुनिया का सबसे ज़्यादा ख्याल करने वाले होते हैं। अगर मैं टूट जाता, तो तुम सबको कौन संभालता?"


उस दिन आकाश ने सीखा कि शोर मचाने वाला प्यार अक्सर छोटा पड़ जाता है, लेकिन जो प्यार खामोशी से अपना सब कुछ लुटा देता है, वही सबसे महान होता है।


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