अलमारी के पुराने कपड़े निकालते और ड्रॉवर साफ करते हुए मालती के हाथ अचानक ठिठक गए। उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी, जिसमें उसके पति शेखर और उनका छोटा भाई वैभव मुस्कुराते हुए खड़े थे। तस्वीर पर जमी धूल को मालती ने अपनी साड़ी के पल्लू से साफ किया, लेकिन उसके दिल पर जमी वो कड़वाहट की धूल आज भी वैसी ही थी, जो तीन साल पहले वैभव के उन तीखे शब्दों से उड़ी थी। मालती का सिर भारी हो रहा था। उसके कानों में आज भी वैभव की वो चीखती हुई आवाज गूंज रही थी, जब पुश्तैनी मकान के बंटवारे को लेकर उसने शेखर की सारी उम्र की तपस्या को एक झटके में नकार दिया था।
"आज से आपका और मेरा कोई रिश्ता नहीं है भैया! आप लोगों ने हमेशा मुझे दबा कर रखा है। आज के बाद कभी मुझे अपना मुंह भी मत दिखाना, और न ही मेरे दरवाजे पर कभी कदम रखना!" वैभव के उन शब्दों ने शेखर को अंदर तक तोड़ दिया था। जिस छोटे भाई को शेखर ने पिता की तरह उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, उसकी पढ़ाई के लिए अपनी जवानी की सारी इच्छाएं मार दी थीं, उसी भाई ने भरी पंचायत में उन्हें पराया कर दिया था। मालती उस दिन बहुत रोई थी। उसने तय कर लिया था कि जिस देवर के लिए उसने सगी माँ की तरह अपनी ममता लुटाई, अब वह कभी उसकी शक्ल नहीं देखेगी।
लेकिन आज, हालात बिल्कुल बदल चुके थे। सुबह-सुबह शहर के बड़े अस्पताल से फोन आया था। वही बड़बोला और अहंकारी वैभव आज एक भयानक सड़क हादसे का शिकार होकर आईसीयू में मौत से लड़ रहा था। उसकी हालत बहुत नाजुक थी और शहर में उसका कोई अपना नहीं था जो इस असहाय अवस्था में उसके सिरहाने खड़ा हो सके।
मालती के मन में एक अजीब सा युद्ध चल रहा था। उसका एक मन चीख-चीख कर कह रहा था— 'जाने दो! जब उसने खुद ही मुंह तक देखने से मना कर दिया था, जब उसने हमारी इज्जत सरेआम नीलाम कर दी थी, तो हमें भी क्या पड़ी है? जो बोया है, वही काट रहा है।' मालती को शेखर का वो उतरा हुआ चेहरा याद आ रहा था, जब वैभव के जाने के बाद वे कई रातों तक सो नहीं पाए थे।
लेकिन उसी पल, मालती का दूसरा मन बुरी तरह छटपटा उठता। 'क्या हुआ अगर वो छोटा है? इंसान ही तो है, और गलती तो सबसे हो जाती है। माना कि उसने जवानी और पैसे के गुरूर में आकर रिश्ते तोड़ दिए, लेकिन आज वो दर्द में तड़प रहा है। दुख-दर्द और मौत के मुहाने पर तो अपने ही काम आते हैं। अगर उसे कुछ हो गया, तो क्या मैं और शेखर कभी खुद को माफ कर पाएंगे?'
पिछले दो दिनों से, जब से वैभव के एक्सीडेंट की खबर मिली थी, मालती इसी उधेड़बुन में थी। शेखर तो जैसे पत्थर के हो गए थे। वे बाहर दालान में गुमसुम बैठे रहते, न कुछ खाते, न किसी से बात करते। उनका भी वही हाल था— अंदर से भाई का मोह खींच रहा था, और बाहर से उस तिरस्कार का घाव उन्हें रोक रहा था।
संयोग से कल शाम मालती की सबसे पुरानी और समझदार सहेली, नीरजा उससे मिलने आ गई। नीरजा मालती के घर के हर हालात और वैभव की उस बदतमीजी से पूरी तरह वाकिफ थी। जब मालती ने अपने मन की यह भारी उलझन और छटपटाहट नीरजा के सामने रखी, तो नीरजा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत गहरी बात कही थी। "मालती, अहंकार की उम्र बहुत छोटी होती है, लेकिन खून के रिश्ते ताउम्र साथ चलते हैं। वैभव ने जो किया, वो उसका लड़कपन और अहंकार था। लेकिन तुम और शेखर तो बड़े हो। बड़ों का दिल तो समंदर जैसा होना चाहिए, जिसमें छोटों की हजार गालियां भी समा जाएं। जब एक बच्चा अपनी माँ को गुस्से में धक्का दे देता है, तो क्या माँ उसे गिरता हुआ देखकर छोड़ देती है? नहीं न! आज वैभव को तुम्हारी उसी ममता की जरूरत है। अगर आज तुम नहीं गईं, तो तुम्हारे और वैभव के अहंकार में क्या फर्क रह जाएगा?"
नीरजा की वो बातें आज ड्रॉवर साफ करते हुए मालती के दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बज रही थीं। अचानक मालती ने वो पुरानी तस्वीर सीने से लगा ली और उसकी आँखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी। सारी कड़वाहट, सारा गुस्सा जैसे उन आंसुओं के साथ बह गया। उसने जल्दी से एक बैग निकाला, उसमें शेखर और अपने कुछ कपड़े रखे और सीधे दालान में गई।
शेखर अभी भी उसी शून्य में घूर रहे थे। मालती ने जाकर उनका हाथ पकड़ लिया। "चलिए," मालती ने रुंधे हुए गले से कहा।
शेखर ने हैरानी से मालती की तरफ देखा। "कहाँ?"
"अस्पताल। अपने वैभव के पास। वो हमारा बच्चा है शेखर। उसने रिश्ते तोड़े होंगे, हमने नहीं। आज उसे हमारी जरूरत है, और हम उसे इस तरह अकेले मरने के लिए नहीं छोड़ सकते।" मालती के इन शब्दों ने शेखर के अंदर जमे हुए बर्फ को पिघला दिया। शेखर भी बच्चों की तरह फफक कर रो पड़े।
एक घंटे बाद दोनों अस्पताल के आईसीयू वॉर्ड के बाहर खड़े थे। शीशे के उस पार, वैभव पट्टियों में लिपटा हुआ, तरह-तरह की मशीनों के बीच बेसुध पड़ा था। उसका वो सारा गुरूर, वो बड़बोलापन आज उन सफेद चादरों में कहीं गुम हो चुका था। शेखर ने कांपते हाथों से आईसीयू का दरवाजा खोला और अंदर गए। मालती भी उनके पीछे थी।
शेखर ने जाकर वैभव के सिर पर हाथ फेरा। जैसे ही उनके हाथ का स्पर्श वैभव के माथे पर पड़ा, बेहोशी की हालत में भी वैभव की बंद आँखों के किनारों से आंसू बह निकले। शायद उसकी आत्मा ने अपने बड़े भाई के उस स्पर्श को पहचान लिया था। मालती ने आगे बढ़कर वैभव के आंसू पोछे और उसके बालों को सहलाया। उस एक पल में, पिछले तीन सालों की सारी नफरत, सारी शिकायतें और सारा अहंकार उस अस्पताल के कमरे में हमेशा के लिए खत्म हो गया। वहां सिर्फ तीन लोग थे— एक पिता समान बड़ा भाई, एक माँ जैसी भाभी, और एक गलती कर चुका पछताता हुआ छोटा भाई। रिश्तों की असली जीत उस दिन हुई थी।
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